तुम्हें मुस्कुराना आता है
यानी मेरी आँखें चमकेंगीं
तुम्हें गले लगाना आता है
यानी मेरे ग़म बंट जाएंगें
तुम बात समझती हो सारी
सो मुझको सुकूँ मिल पायेगा
तुम सूरत में भी सीरत में भी
मेरे ख़्वाबों के जैसे हो
होंठ तुम्हारे सुर्ख गुलाबी
और आँखें हैं कजरारी सी
चूम लूँ मैं और खो जाऊँ
ये भी तो इक हसरत है
सबसे अव्वल ये कहना है
झुमके तुम पर जँचते हैं
साड़ी बिंदी हँसता चेहरा
बस इतनी तमन्ना है मेरी
हुस्न तुम्हारा सोने जैसा
आँखें हीरे जैसी हैं
हर इक नक्श तराशा यूँ है
जैसे नदी मुड़े कोई
इक दिन ये सारा कुछ भी
मेरे नाम करोगी तुम
हाए, ये भी तो इक दुनिया है
और उस में तुम अधिकारी हो।
हमें प्रयास करते रहना चाहिए ज्ञान और प्रेम बाँटने का, जिससे एक सभ्य समाज का निर्माण किया जा सके।
कुल पेज दृश्य
बुधवार, 27 सितंबर 2023
नज़्म ~ जब ख़्वाब हक़ीक़त हो जाये
शनिवार, 11 फ़रवरी 2023
नज़्म – तुम्हें अब भूल जाना है
तुम्हें ग़र भूल जाऊँ तो
मुझे कुछ चैन आ जाये
वो ही सब बात मुझको याद
अभी तक आ रही हैं पर
मुझे क्या भूल जाना है
ये सब भी याद रखना है
यही सब याद रहने में
नहीं कुछ भूल पाता हूँ
मगर अब भी गुज़ारिश है
ख़ुदा मुझ पर रहम कर दे
कि उसको भूल जाने में
ज़रा मेरी मदद कर दे
ये मेरी साँस ले ले तू
ये मेरा होश भी ले लो
मेरी आँखें मिरा ये दिल
मेरा साया मेरा ये नाम
तुम्हें जो भी ज़रूरत हो
मेरे मौला तू सब ले ले
मगर दर्दे-निहाँ से अब
रिहाई भी अता कर दे
~ अश्विनी यादव
शनिवार, 30 अप्रैल 2022
नज़्म ~ फिर युद्ध नहीं होंगे
कोई भी दीवार
नहीं रोक सकती
प्रेम, परिंदे, गीत
कोई भी युद्ध
नहीं ला सकता
शांति, सुकूँ, मुस्कान
हम ज़्यादा से ज़्यादा
बात करें
और प्रेम करें
तब यक़ीनन सदियों तक
कोई युद्ध नहीं होंगे।
~ अश्विनी यादव
शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2022
नज़्म ~ ऐ तख़्तनशीं लोगों तुमने
ऐ तख़्तनशीं लोगों तुमने
ये कैसा मुल्क़ बना डाला
हर हिस्से में है जख़्म बहुत
हर शक़्ल पे मातम छाया है
कतरा कतरा खूँ बहता है
रेज़ा-रेज़ा सब मरते हैं
हर लम्हा इक डर रहता है
कोई साया जाने कहाँ से
आ धमके फिर खा ही जाए
हम डरते हैं सब डरते हैं
सबका डरना लाज़िम भी है
इन कमरों में चीख़ रही है
सच कहने वाली ख़ामोशी
सच सुन ने वाली इक आदत
सच लिखने वाले कुछ पागल
हैं ज़ब्त कहीं पर लोग यहाँ
कोई ख़ोजे आख़िर इनको
हाँ! इन लोगों में हिम्मत है
तोपों के आगे रख देंगें
कुछ गीत, कहानी, नज़्म, कलम
कुछ दीवारें पोती जायेंगीं
कुछ वादे लिक्खे जाएंगें
वो दहशत तोड़ी जाएगी
कुछ पुतले फूँके जाएँगें
ढपली पे राग बनेगी फिर
तब एक मशाल जलेगी फिर
जंजीरें, तलवारें, तोपें
ये सब गायब हो जायेंगीं
हम फिर से तब मुस्काएंगें
हम फिर से सच कह पायेंगें..
~ अश्विनी यादव
शनिवार, 12 फ़रवरी 2022
नज़्म
मैंने हर सम्त उसे चाहा है
बड़ी शिद्दत से
मुझको लगता है
वो मिल जाएगी
सच कहूँ तो
बड़ी तलब है मुझको
जाने किस रोज़ को
वो पास मेरे आएगी
उसे इस तरह से
चाह रहा हूँ अब तक
उस तक ख़बर ये आख़िर
कैसे जाएगी
~ अश्विनी यादव
शनिवार, 20 नवंबर 2021
नज़्म ~ दम्भी का दम्भ
दम्भी का दम्भ है टूट गया
सच पर से कालिख़ छूट गया
बलिदान हुए हैं जो अपने
“आज़ाद ,, बने हैं वो अपने
हर इक आँसू का बदला है
कुछ पिछला है कुछ अगला है
लाशें, मातम, बेचैनी सब
याद करो उसकी करनी सब
हर लाठी पर ज़ख़्म पे अपने
ख़ून बहाए सींचे सपने
ज़ुल्मी से तो लड़ना ही था
आख़िर लड़कर मरना ही था
मरने का जब ख़ौफ़ नहीं है
अस्ल कहूँ तो जीत वहीं है
सब ने मिलकर जीता है ये
साथ लड़ेंगें वादा है ये
हर इक ज़ुल्मी झुक जाएगा
जो भी हमसे टकराएगा
हाँ! ख़ून समेटो मुस्काओ
अब सारे आँसू पी जाओ
हम माटी के लाल हैं प्यारे
दिल्ली हैं बंगाल हैं प्यारे
खेत हमीं से देश है हमसे
गाँव, गली परदेश है हमसे
~ अश्विनी यादव
रविवार, 24 अक्टूबर 2021
नज़्म ~ करवाचौथ
मेरे लाख मना करने पर
रख लेती है व्रत तू अक्सर
उफ़्फ़ ये तेरे जैसे पागल
प्यार मुझे कितना करते हैं
तू बात मेरी भी माना कर
अपनी सेहत को देखा कर
लेकिन तुझको ये जँचता है
जो जँचता है सब अच्छा है
तू ख़ुश है तो मैं भी ख़ुश हूँ
चौथ मना ग़र यार ख़ुशी है
~ अश्विनी यादव
शनिवार, 16 अक्टूबर 2021
नज़्म - “ तुम अछूत हो ,,
तुम नीच जाति के हो
तुम्हें पता तो होगा ही
क्या काम है तुम्हारा
क्या नाम है तुम्हारा
क्यों ग़ैर जाति के लोग
महज़ गाली समझते हैं
तुम्हारे हिस्से है गाली
तुम्हारी क़िस्मत है ठोकर
महज़ तुम्हारे छूने से
ये मन्दिर ये किताबें
ये कुएं, तालाब सब
यहाँ तलक कि मिट्टी भी
हो जाती है अछूत
तुम समझते क्यों नहीं
तुम अछूत हो, अछूत!
तुम्हें खेत जोतने है
घरों की नींव खोदनी है
नाले साफ करने हैं
सीवरों में उतरना है
यही सब करते हुए पागल
तुम्हें इक रोज़ मरना है
न ईश्वर तुम्हारा है
न ये लोग तुम्हारे हैं
ग़र तुम्हें अपना समझते तो
तुमसे प्यार भी करते
तुम्हारा मान भी रखते
अरे पगलों ज़रा जागो
झूठी नींदों को तोड़ो
अपने चारों तरफ़ देखो
इक इंसान बनने को
तुम कितने तंज़ सहते हो
घोड़ियाँ छीनी जाती हैं
मूँछे कटवाई जाती हैं
बेटियाँ नोंची जाती हैं
बोटियाँ फेंकी जाती हैं
करोगे क्या भला तुम भी
ये आदत हो चुकी अपनी
उन महलों की फ़सीलों पर
माथा टेकने से ग़र
तुम्हें फुर्सत मिले तो फिर
ज़रा सोचो इन सब के सबब
क्यों हड्डियाँ तोड़ी जाती हैं
क्यों तुम्हारी जानें जाती है
~ अश्विनी यादव
शुक्रवार, 20 अगस्त 2021
नज़्म – तानाशाह
सुनो ग़ौर से सब दरबारी
आओ सब कोई बारी बारी
जूते बाहर उतरे सबके
अंदर केवल मैं पहनूँगा
ऐसे बनते हैं राजा बाबू
सोना मिट्टी से तोलूँगा
सब से ऊपर मैं ही हूँ बस
सबके सीने पर चढ़ लूँगा
ग़र सोच रहे बाग़ी बनने को
जीना मुश्किल मैं कर दूँगा
~ अश्विनी यादव
सोमवार, 24 मई 2021
नज़्म
वैसे तो ये कहना ग़लत ही होगा
लेकिन फिर भी यक़ीन करना
हम दोनों की तकदीरों में
नहीं लिखा इस जनम में मिलना...
बहुत जतन कर चुका हूँ मैं भी
बहुत जतन कर चुकी हो तुम भी
हम दोनों से ख़फ़ा है दुनिया
सच से एकदम जुदा है दुनिया
इस दुनिया को नहीं पता है
क्या मुहब्बत, क्या चाहत है ?
हम दोनों को बतलाना था
सबको मुहब्बत तक लाना था
लेकिन ये होने से रहा अब
तुम भी सब कुछ भूल ही जाना
मत बतलाना किसी को कुछ भी
हम भी ऐसे जीते रहेंगें
दिल की कोई बात न सुनना
हरदम हँसकर बातें करना
हम दोनों को ख़ुश रहना है
मिलो कभी तो ध्यान रखना..
हम दोनों की तक़दीरों में
नहीं लिखा इस जनम में मिलना....
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अश्विनी यादव
शुक्रवार, 14 मई 2021
ग़ज़ल
सोच रहे हैं मदद को निकलें लेकिन उनका भी डर है
इस डर से मर जाने दें ? हद है क्या इतना भी डर है
डर डर कर जीने से अच्छा लड़कर ही मर जाएं हम
बेसुध, सहमा, पागल, बंदी ऐसे रहना भी डर है
घर में सर दीवारों से टकराने से क्या हासिल है
खिड़की खोलो बाहर जाओ घर में छिपना भी डर है
बन्दूकों से सत्ता हासिल कर सकते हो तुम लेकिन
रोज़ कोई आवाज दबाना चीख़ दबाना भी डर है
चारासाज़ों के मरने पर बागी लोग बढ़ेंगे ही
उजलत में यूँ जेल बनाना, टैक्स बढ़ाना भी डर है
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अश्विनी यादव
बुधवार, 12 मई 2021
ग़ज़ल
देखिये कैसे गिनाई जा रही लाशें हमारी,
आज पानी में बहाई जा रही लाशें हमारी,
अब नहीं सुनता है कोई रो लें कितना चीख़ लें हम,
चील कौवों को खिलाई जा रही लाशें हमारी,
वो कि ज़िम्मेदार आदम सो रहा है जागकर भी,
सच कहो तो बस लुटाई जा रही लाशें हमारी,
मन की बातें कर रहें हैं आज कल सुनते नहीं हैं,
जग हँसाई में दिखाई जा रही लाशें हमारी,
मर रहें हैं लोग साहब अब तो गद्दी छोड़ दो तुम,
तेरे महलों में दबाई जा रही लाशें हमारी,
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अश्विनी यादव
गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020
नज़्म
तुम्हारा चेहरा ही बदला है
मेरी आँखें वही हैं
अब न तुम अच्छी लगती हो
न ही तुम्हारी आँखें
तुम्हारी ही आवाज बदली है
मेरे कान वही हैं
अब न तुम्हें सुनना अच्छा है
न ही तुम्हारी बातें
कुल मिलाकर ये समझो
मैं वैसा ही हूँ
लेकिन अब न तुम अच्छी हो
न ही तुम्हारा साथ।
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अश्विनी यादव
बुधवार, 25 सितंबर 2019
नज़्म (दुआएँ )
( घर के बच्चों के लिए दुआएँ )
नज़्म
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ओ मेरी नन्ही हथेली
तुम मेरी उँगली पकड़ो
कोशिश करो चलने की
अपने कदम आधे कर लूँगा
लेकिन तुम्हारे साथ चलूँगा
तुम बिना भय के चलो
मैं तुम्हें सम्हाल लूँगा
तुम्हारे छोटे छोटे होंठ
जब मुझे बुलाते हैं
बड़े प्यार से
सच कहूँ तो लगता है
ज़िन्दगी बस यहीं रुकी रहे
हम साथ चलते रहें
तुम बोलो बिना रुके
मैं सुनता रहूँ, बस सुनता रहूँ....
_______________
अश्विनी यादव
शुक्रवार, 19 जुलाई 2019
नज़्म ( मुहब्बत वजूद दे गई )
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मेरे अरमां
इतने बोझिल थे
कि लगता है मैं
किसी कब्रगाह सा हूँ
एक दो नहीं
हज़ारों हसरतें
दफ़्न चुकी हो जैसे
पर हर कहानी की तरह
इसमें भी मोड़ आ गया
एक बरसात की तरह
तुम आ गयी
फिर क्या होना था
मैं ज़िन्दा हो गया
तुम्हारी मुहब्बत
मुझे वजूद दे गई
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अश्विनी यादव
सोमवार, 27 मई 2019
नज़्म (कानों से लटकती बाली )
नज़्म
______________
उसे तुम कहूँ
या आप से शुरुआत करूँ
पता नही क्या अच्छा लगे
मैं कल से बस
फ़िक्र में हूँ
उसके कानों से लटकती बाली
जिसको उसकी आंवारा ज़ुल्फ़ें
बार बार चूम रही थीं
वो कल से मुझे
बेतहाशा याद आ रही हैं
गर्दन की ढाल से पहले तक
आँख से लेकर कान तक
हर तरफ ज़ुल्फ़ों का ही
पहरा है
जो मेरी नज़रों को
रोकती हैं उसे
चूम लेने से....…
फिर भी मैं
महसूस करता हूँ
चूम लेता हूँ......
वो जो इक तिल है न
उसी से मज़बूर हूँ
कि देखता रहूँ
अपनी आँख जाने तक
तुम से दूर जाने तक
_________________
अश्विनी यादव
मंगलवार, 5 मार्च 2019
नज़्म ( ज़िन्दा नज़र आओ )
यही वो वक्त है
ज़िन्दा होने का एहसास करो
अगर हाथ है तो
उठाने का प्रयत्न करो
कलम में स्याही नही
बारूद भरो
बेशक तुम्हारा ख़ून बहेगा
लेकिन नस्लें महफूज़ रहेंगीं..…
अगर पाँव है तो
दौड़कर आगे बढ़ो
ज़ुल्म के मुँह तमाचा जड़ने
जो कर सकते हो
करने की कोशिश करो
नही तो किसी रोज़
औरों की तरह
वो तुम्हें भी खा जाएगा
फिर तुम्हारी कायरता
नई नस्ल में भी उतर जाएगी....
ये भूख तुम्हारी है
ये मिट्टी भी तुम्हारी है
छिली हुई पीठ, घिठ्ठे वाले हाथ
सब कुछ तुम्हारा है
ये तय है कि ऐसे ही
मरना है तुम्हें
तो क्यूँ न लड़कर मरा जाए
बचेंगें तो भी हम ही
नही तो हमारे अपने बचेंगें.....
रविवार, 9 दिसंबर 2018
सब पहले जैसा है
सुबह वैसी ही हुई है
जैसे पहले भी होती आई है
आज भी उसी कप में चाय मिली
वही अख़बार, चहल- पहल
सब के सब एक जैसे थे
बस बदला था कुछ तो
मेरे अंदर का आदमी
मेरे दिल के अंदर की जगह
ये वो जगह है
जहाँ मुहब्बत, वफ़ा, ईमानदारी,
विश्वास, कामना और करुणा
रखने की तिजोरी बनी थी
लेकिन धोके नाम के डाकू ने
डाका डाल दिया
अब वहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़
खालीपन है,
जहाँ सब एकदम वीरान है,
और कुछ नहीं बदला
सब पहले जैसा ही है
__________________
अश्विनी यादव
सोमवार, 4 जून 2018
नज़्म ( हम बैठे है )
रेलगाड़ी के गुजरने से
वो पुल थरथराने लगा
जिसके नीचे 'हम' बैठे हैं,
गंगा का पानी भी न
अठखेलियां करने लगा
इसके बगल 'हम' बैठें हैं,
उसकी उंगलियां बेझिझक
मेंरी उँगलियों से लिपटी हैं
इतने पास 'हम' बैठें हैं,
रेत से हो पानी चूमता हुआ
झोंका हवा का झूमने लगा
ऐसे होश खोकर 'हम' बैठें हैं,
उसका सर मेरे कांधे पे
पूरा का पूरा टिकने लगा
रुकती सांस लिए 'हम' बैठें हैं,
अभी रंगीनियों में डूबे थे
याद आया समाज हमको
जिससे छुप के यहां 'हम' बैठें हैं,
जाने कैसी जाति की लाज की
ये बेंडियां बनाई गई हैं
जिनसे डरकर आज 'हम' बैठें हैं,
वो जिसके साथ जीना मरना है
उसको चुन लेना भी गुनाह है
ऐसी इंसानियत लिये 'हम' बैठे हैं,
खाप का है फैसला मार देंगें
हमारी भी ज़िद है जी लेंगें
ये एहसास में डूबे 'हम' बैठे हैं,
एक दफा जी करता है मर जाये
सदियों की बेड़ियों कैसे तोड़ेंगें
इश्क़-खौफ़ द्वंद में 'हम' बैठें है,

