तुम्हें मुस्कुराना आता है
यानी मेरी आँखें चमकेंगीं
तुम्हें गले लगाना आता है
यानी मेरे ग़म बंट जाएंगें
तुम बात समझती हो सारी
सो मुझको सुकूँ मिल पायेगा
तुम सूरत में भी सीरत में भी
मेरे ख़्वाबों के जैसे हो
होंठ तुम्हारे सुर्ख गुलाबी
और आँखें हैं कजरारी सी
चूम लूँ मैं और खो जाऊँ
ये भी तो इक हसरत है
सबसे अव्वल ये कहना है
झुमके तुम पर जँचते हैं
साड़ी बिंदी हँसता चेहरा
बस इतनी तमन्ना है मेरी
हुस्न तुम्हारा सोने जैसा
आँखें हीरे जैसी हैं
हर इक नक्श तराशा यूँ है
जैसे नदी मुड़े कोई
इक दिन ये सारा कुछ भी
मेरे नाम करोगी तुम
हाए, ये भी तो इक दुनिया है
और उस में तुम अधिकारी हो।
हमें प्रयास करते रहना चाहिए ज्ञान और प्रेम बाँटने का, जिससे एक सभ्य समाज का निर्माण किया जा सके।
कुल पेज दृश्य
बुधवार, 27 सितंबर 2023
नज़्म ~ जब ख़्वाब हक़ीक़त हो जाये
रविवार, 20 अगस्त 2023
एक पत्र तुम्हारे नाम का
तुम्हारे नाम,
मैं चाहता था कि एक ख़त लिखूँ तुम्हारे नाम पर और तुम्हें भेजूँ। मुझे पता है कि अगर वो ख़त तुम्हारे हाथ में होगा तो यक़ीनन तुम उस ख़त को भिगो दोगी। तुम्हारी आँखें मेरे शब्दों का बोझ नहीं सहन कर पाएंगीं और पूरे ख़त को पढ़ते पढ़ते भिगो दोगी। लेकिन फिर भी लिख रहा हूँ मैं चाहता हूँ कि आख़िरी बार ही सही कम से कम इस ज़िन्दगी में तुमसे बता तो सकूँ कि क्या चाहता था मैं, क्या ख़्वाहिशें हैं जो मेरे अंदर ही घुट घुट कर मरी जा रही हैं.. तमाम ख़्वाब तो कतरा कतरा करके बह गए। ये ख़्वाब इतने नुकीले थे कि मानों काँच से किसी ने मेरी आँख की पुतलियों के किनारे काट दिये हों। चलो तो मैं तुम्हें बता दूँ कुछ...
तुम्हारा आना किसी मन्नत की तरह था मेरे लिये, अचानक से आई और न मैं चाहता था कि कोई ऐसे आये लेकिन आरज़ू भी थी कहीं न कहीं दबी हुई। धीरे धीरे तुम आदत ही बन गए... तुम्हें पता नहीं होगा लेकिन फिर भी बताना फ़र्ज़ है मेरा.. हर रोज़ सुबह सुबह तुम्हारी आवाज मुझे सुनाई पड़ती है। मोबाइल के कोरे स्क्रीन पर भी मिस्डकॉल दिखाई पड़ते हैं, लगता है कि दस मैसेज पड़े हैं और तुम कल रात के मैसेज के रिप्लाई न मिलने पर गुस्सा भी हो। लेकिन हमेशा की तरह तुम्हारे सुबह के पहले मैसेज में लिखा हुआ है “ राधे-राधे ,,।
तुम्हें मालूम नहीं है कि मैं किस हद तक जा सकता था, मैं ख़ून के रिश्तों के बराबर की अहमियत में रखता था। ख़ून के रिश्ते का मतलब समझती हो.? माँ-पिता, भाई-बहन के बराबर ही यानी ज़रूरत पड़ने पर जिनके लिए आप बिना झिझक किसी भी समय जान दे और ले सकते हो। तुमसे आख़िरी बार न मिल पाने का मलाल तो रह ही जाता है पर अच्छा ही हुआ कि नहीं मिल पाए हैं नहीं तो ये कलेजा और न जाने कितने टुकड़ों में बिखर जाता। जितने टुकड़े उतना ज़्यादा चुभन.. जितना चुभन उतने आँसू। दिमाग काम तो बहुत कर रहा है पर बस पुरानी बातें ही घुमाकर महसूस करवा रहा है और आँखों के आगे वो किसी वीडियो को auto play पर लगा रखा है।
एक तुम्हारे दूर चले जाने से ही मुझ में तमाम बुराई आ रही है, तमाम बुरी लत मेरा हाथ पकड़ने को आतुर हैं पर मेरे हाथ में आज भी कोई एक हाथ महसूस होता है.. वो तुम्हारा है..! ओह्ह नहीं तुम चले गए हो न.. अब वो हाथ मेरे दोस्त/परम् पिता/भाई/यार/भगवान श्रीकृष्ण का है। जैसे मैं तुम्हारे सीने पर सर रखकर धड़कनें महसूस करने आतुर रहता था न अब वैसे ही श्रीजी यानी हमारी राधा रानी जी के चरणों में अपने सर को रखकर उनके वात्सल्यमयी करुणा में दर्द का आनन्द ले रहा हूँ।
तुम्हारी याद आती है और लौट आने की उम्मीद लगे तो जैसे लगता है कि सफ़ेद बर्फ़ की चादर से ढके हुए हल्के से दिखते हुई पहाड़ के पीछे से सूरज उग रहा है और पूरी बर्फ़ चमक उठी है। जब आवाज सुनाई पड़ती है तो मुझे लगता कि किसी बहती हुई नदी के किनारे बैठा हूँ आस पास पड़े हैं और बहता हुआ पानी पत्थरों से टकराकर एक हल्का प्यारा सा शोर कर रहा है.. चिड़ियाँ बीच बीच में आकर अपनी बातें सुना रही हैं कि तुम्हें उससे बात करनी चाहिए थी, उसको ऐसे तो नहीं जाने देना चाहिए था पर अफ़सोस मुझे बहुत देर बाद इन चिड़ियों की भाषा समझ आई। तब तलक मेरे हाथों में रखी हुई सिगरेट ने मेरा हाथ जला दिया था यानी किसी ने झटके से मुझे जगा होता है.. मेरा ख़्वाब वहीं चकनाचूर हो जाता है। बची रहती है तो एक मायूसी और बेबस सी मुस्कान, ख़्वाब के बग़ैर जी रही इन सूनी आँखों में थोड़े आँसू। और फिर लग जाता हूँ इधर उधर.. बस ज़िन्दा रह पाऊँ।
तुम्हें बताया था न कि जब मैं तुम्हें अपनी दुल्हन के जोड़े में देख लूँगा तो हम वृंदावन चलेंगें, और राधा रानी का शुक्रिया करेंगें कि आपकी इच्छा थी और मेरी चाहत थी.. हम साथ हुए हैं सो आपके चरणों की रज को हम दोनों के माथे पर लगाकर जीवन को प्यार के सभी रंगों से भर देंगें। हम नई नई तस्वीरें बनायेंगें अपने जीवन की.. ऐसी तस्वीरें जिसमें आपकी कृपा से हम कुछ नए सदस्य भी बढ़ा लेते। फिर हम दोनों वृंदावन की सड़क पर बाक़ी परिवार वालों से आगे चलते या फिर बात करते करते पीछे चलते रहते.. तुम इधर उधर दिखाकर कहती देखो कितने प्यारे झुमके बिक रहे हैं न उधर चलो ले लेते हैं.. वैसे भी आपको मैं झुमके में बड़ी प्यारी लगती हूँ न। तुम्हें झुमके पसन्द भी नहीं हैं लेकिन तुम मेरी पसन्द को अपनी पसन्द बना ली थी... बहाना बनाती कि एक दो अपने लिए , बहन के लिये और मम्मी के लिये ले लेते हैं.. और आख़िरी में दस से बीस झुमके उठा लेती वहाँ से। तुम्हारे पास पैसे होते फिर भी तुम मुझे कहती कि देकर के आइये मैं जा रही हूँ आगे मम्मी और बहन के साथ साथ। और मैं तुम्हारा हाथ पकड़ कर रोक लेता.. रुको! बड़ी आई हैं आगे आगे जाने वाली... और हँसकर दोनों साथ चलने लगते। जब परिवार वाले पीछे की तरफ़ देखते तो तुम जिद करती कि हाथ तो छोड़ दो.. अच्छा नहीं लगता है ऐसे घरवालों के आगे।
हाए! मेरी बदनसीबी... ये ख़ुशनुमा पल आया क्यों नहीं.. मैं इसे जी क्यों नहीं पाया। अफ़्सोस तो तमाम बातों का ताउम्र रहेगा। तमाम चीज़ों का... न तुम्हारा नाम कभी लिया गया न लिया जाएगा। मेरे दफ़्न होने के बाद ये सब दर्द, ये ख़्वाब और ये हमारे प्यार की कहानियाँ भी सो जायेंगीं। हाँ तुम भी इन्हें सो जाने देना.. नए जख्म मत लेना तुम नाज़ुक हो इस मामले में। टूटे तो बराबर हैं लेकिन मेरी टूटन मेरी आवाज में झलकती है, वो शायद इसलिए क्योंकि एक शायर की प्रेमिका होना तुम्हें और इस प्यार को अमर कर देगा।
तुम्हारी बदनसीबी ये है कि हम नहीं मिले और ख़ुशनसीबी ये है कि इतना ज़्यादा चाहने वाला मिला। मुझे याद आता है कि “ हर किसी को मुक़म्मल जहां नहीं मिलता ,,
याद रखना.. अब शायद लौटने के रास्ते तो लगभग बन्द ही हो चुके हैं। लेकिन मेरे शब्द में तुम्हारी एक ख़ास जगह रहेगी।
मेरे “ तब ,, का जवाब “फिर ,, या “ तब क्या ,, से जाने कौन देगा अब...
तुम जानती हो कि मैं तुम्हारा क्या था अभी तक... चलो सब छोड़ो और बताओ कैसी हो.? अच्छी हो न.. तो मुस्कुरा दो अब। हो सकता है इस ख़त में कुछ ग़लतियाँ भी हों लेकिन मेरी हिम्मत नहीं पड़ रही है कि मैं दुबारा पड़ सकूँ इसे.. इसलिये पहले की उन तमाम छोटी छोटी ग़लतियाँ जिन पर तुम मुँह फुलाकर बैठ जाती थी और चले जाने की बात करती थी.. बाद में मेरे मनाने के बाद माफ़ भी कर देती थी उन्हीं के साथ में इसे भी जोड़ लेना और माफ़ कर देना।
तेरी ख़्वाहिश थी कोई तारा टूटे
देखो टूटा तारा कैसे दिखता है 💔🤗
~ अश्विनी यादव
[ note ~ ये पत्र, मेरी लिखी जा रही नॉवेल का एक हिस्सा है, इसे मेरी पर्सनल लाइफ न जोड़ें। ख़ैर! जोड़ भी लेंगें तो क्या फ़र्क़ पड़ता है मुझे। मैं कई सालों से ऐसा ही कुछ लिखना चाहता था पर इत्तेफ़ाक़ देखिये आज लिख भी लिया। आपका शुक्रिया जो आपने पूरा पढ़ा🙏🏻💝 ]
गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020
नज़्म
तुम्हारा चेहरा ही बदला है
मेरी आँखें वही हैं
अब न तुम अच्छी लगती हो
न ही तुम्हारी आँखें
तुम्हारी ही आवाज बदली है
मेरे कान वही हैं
अब न तुम्हें सुनना अच्छा है
न ही तुम्हारी बातें
कुल मिलाकर ये समझो
मैं वैसा ही हूँ
लेकिन अब न तुम अच्छी हो
न ही तुम्हारा साथ।
___________________
अश्विनी यादव
शुक्रवार, 13 सितंबर 2019
नज़्म
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वो इक चेहरा था जो
वो जो नाम था उसका
हाँ सब याद है मुझको
कुछ भूला नही हूँ मैं
तब हर शख़्स अच्छा था
जो हमशक़्ल थे तेरे
जो हमनाम थे तेरे
यार तमाम लोग मुझे
अब पसन्द नही बिल्कुल
जिनसे शक़्ल मिलती है
या आवाज़ मिलती है
जिनके नाम तुझ से है
नफरत है मुझे सबसे
जिन्हें प्यार करता था
जिनकी बात करता था
नफरत है मुझे सबसे...
नफरत है मुझे तुमसे...
____________
अश्विनी यादव
रविवार, 9 दिसंबर 2018
सब पहले जैसा है
सुबह वैसी ही हुई है
जैसे पहले भी होती आई है
आज भी उसी कप में चाय मिली
वही अख़बार, चहल- पहल
सब के सब एक जैसे थे
बस बदला था कुछ तो
मेरे अंदर का आदमी
मेरे दिल के अंदर की जगह
ये वो जगह है
जहाँ मुहब्बत, वफ़ा, ईमानदारी,
विश्वास, कामना और करुणा
रखने की तिजोरी बनी थी
लेकिन धोके नाम के डाकू ने
डाका डाल दिया
अब वहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़
खालीपन है,
जहाँ सब एकदम वीरान है,
और कुछ नहीं बदला
सब पहले जैसा ही है
__________________
अश्विनी यादव
बुधवार, 3 जनवरी 2018
ये वादा रहा तुमसे
हम ये वादा नहीं करते,
तुझे जमाने की सारी खुशियां देंगे,
पर ये वादा है तुमसे,
अपने हिस्से की सारी खुशियां देंगें,
मंजिल दूर होगी गम नही,
साथ रहो सारी दूरी तय कर लेंगें,
लड़ना हुआ जहां से भी,
तुम्हारा हाथ पकड़ ये भी कर लेंगें,
पर वादा है तुमसे.............।।
हर साज़िश हर दर्द हमसे,
होकर ही गुजरेगा ये वादा रहा,
प्यार न बदलेगा कसम से,
हर दिन ही बढेगा ये वादा रहा,
आंसू न मिल पायेगा तुमसे,
ऐ सनम हम ऐसा जतन कर देंगें,
पर यह वादा रहा तुमसे,
अपने हिस्से की सारी खुशियां देंगे,
पर ये वादा रहा तुमसे.........।।
― गुड्डू यादव
गुरुवार, 21 दिसंबर 2017
भोर हो गयी कैसे मान लूँ
भोर हो गयी कैसे मान लूँ,
अभी तक न तुम
बाथरूम में गुनगुनाई हो,
न ही गीले बाल
झटकते हुए आयी हो,
न ही ठंडी चाय पर
तुम जोंरों से चिल्लाई हो,
न रजाई खेंचकर तुम
अपना मुखड़ा दिखाई हो,
भोर हो गयी कैसे मान लूँ,
अभी तक न तुम
आईने से मुलाकात की हो,
न ही घर की चीजों से
अकेले में कोई बात की हो,
न पेपर फेंककर तुम
घर के हालात सुनाई हो,
न ही तुलसी पौधे पर
लोटे से सौगात चढ़ाई हो,
भोर हो गयी कैसे मान लूँ,
अभी तक न तुम
तुम्हारी बिंदी से मिल पायी हो,
न ही सिंदूरदान को
खाली सी मांग दिखाई हो,
न झील सी आंखों को
काजल का पहरा दिलाई हो,
न ही मोगरा फूल का
तुम गजरा आज लगाई हो,
भोर हो गयी कैसे मान लूँ,
अभी तक न तुम
अच्छा छोड़ो मैं मान लेता हूं
की भोर हो गयी,
तुम नहाते नहाते गुनगुना भी ली,
बाल झटक दिए, पेपर फेंक दिया,
चाय दे दिया, चिल्ला भी लिया,
तुम सज संवर भी ली,
किचन से भी मिल ली,
अगरबत्ती की महक भी आ गयी,
तुलसी में जल भी दे दिया,
पर अब भी कुछ अधूरा है,
तुमने बात तो सपनो में कर ली,
पर अपनी सूरत कहाँ दिखाई हो,
काश की तुम सामने होती
और वो हरकतें करती तुम
जैसा पहले करती आयी हो,
तब मान लेता भोर हो गयी
तुम आकर मुझको जगाई हो,
भोर हो गया कैसे मान लूँ.....
― अश्विनी यादव
गुरुवार, 7 दिसंबर 2017
काश की तुम मिलने आती
कोहरे की पहरेदारी थी
काश की तुम मिलने आती,
सर्द रातों की दुश्वारी थी
काश की तुम समझ पाती,
भेज ही देती किसी तरह
यादों का गर्म बिछौना तुम,
प्रेम पाश के कम्बल को
ओढ़ा दी होती मुझपर तुम,
दिन चमकना भूल गया है
क्या इसकी भी साझेदारी थी,
काश की तुम मिलने आती
फिर कोहरे की पहरेदारी थी,
शिकायत भी न है कोई
गिला न हमसे रखना तुम,
हवाओ से कहा अकेले में
वो मुझसे कभी कहना तुम,
इन सड़कों पे दीद मेरी ये
ढूंढ रहीं हैं इक पहचाने को,
वो रस्ते बदल रहा देखो
अरे मिले न मुझ दीवाने को,
कतरा कतरा रात कटी
फ़ना होने की जिम्मेवारी थी,
कोहरे की पहरेदारी थी
काश की तुम मिलने आती,
( पंक्तियाँ :― अश्विनी यादव )
बुधवार, 2 अगस्त 2017
सब तुम्हारी कारस्तानी है
आखिर बात क्या है जरा बता दो न तुम,
नई बाग लगी है शहर में या आये हो तुम,
आखिर बात क्या.......
इतनी जमालियत हमने पहले देखी नहीं,
चांद पूरा है की चांदी में नहा आये हो तुम,
आखिर बात क्या.......
कोई पता तो करो ये शज़र ठहरा है क्यूं,
यकीं है महफ़िल में मुस्कुरा आये हो तुम,
आखिर बात क्या.......
जिस डगर पे गया करीब-ए-मर ही दिखे,
उस शहर में बेपर्दा घूम कर आये हो तुम,
आखिर बात क्या......
पुजारी मन्दिर नहीं मियां मस्ज़िद न गया,
जब से उनके हाल पूंछ कर आये हो तुम,
आखिर बात क्या......
― अश्विनी यादव