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मंगलवार, 17 जून 2025

नई ग़ज़ल

सुकून-ओ-सब्र तुम तोड़ा करोगे
मिरी जां सच में तुम ऐसा करोगे

तुम्हारे साथ मेरा नाम लेगें
भला कितनों से तुम उलझा करोगे

भले हम लाख तेरा ध्यान रक्खें
नई रंजिश ही तुम पैदा करोगे

तिरी परछाई समझा था मैं ख़ुद को
कि अब ग़ैरों को हमसाया करोगे

सुनों जब हम यहाँ होगें नहीं तो
मुझे हर दर पे तुम ढूँढा करोगे

सुनहरी शाम हम रेतों पे बैठे
वो हर इक बात तुम सोचा करोगे

बहुत रोओगी तुम भी जान उस दिन
अगर मैं मर गया तो क्या करोगे

     ~ अश्विनी यादव

बुधवार, 27 सितंबर 2023

नज़्म ~ जब ख़्वाब हक़ीक़त हो जाये

तुम्हें मुस्कुराना आता है
यानी मेरी आँखें चमकेंगीं
तुम्हें गले लगाना आता है
यानी मेरे ग़म बंट जाएंगें
तुम बात समझती हो सारी
सो मुझको सुकूँ मिल पायेगा
तुम सूरत में भी सीरत में भी
मेरे ख़्वाबों के जैसे हो
होंठ तुम्हारे सुर्ख गुलाबी
और आँखें हैं कजरारी सी
चूम लूँ मैं और खो जाऊँ
ये भी तो इक हसरत है
सबसे अव्वल ये कहना है
झुमके तुम पर जँचते हैं
साड़ी बिंदी हँसता चेहरा
बस इतनी तमन्ना है मेरी
हुस्न तुम्हारा सोने जैसा
आँखें हीरे जैसी हैं
हर इक नक्श तराशा यूँ है
जैसे नदी मुड़े कोई
इक दिन ये सारा कुछ भी
मेरे नाम करोगी तुम
हाए, ये भी तो इक दुनिया है
और उस में तुम अधिकारी हो।

शनिवार, 11 फ़रवरी 2023

नज़्म – तुम्हें अब भूल जाना है

तुम्हें ग़र भूल जाऊँ तो
मुझे कुछ चैन आ जाये
वो ही सब बात मुझको याद
अभी तक आ रही हैं पर
मुझे क्या भूल जाना है
ये सब भी याद रखना है
यही सब याद रहने में
नहीं कुछ भूल पाता हूँ
मगर अब भी गुज़ारिश है
ख़ुदा मुझ पर रहम कर दे
कि उसको भूल जाने में
ज़रा मेरी मदद कर दे
ये मेरी साँस ले ले तू
ये मेरा होश भी ले लो
मेरी आँखें मिरा ये दिल
मेरा साया मेरा ये नाम
तुम्हें जो भी ज़रूरत हो
मेरे मौला तू सब ले ले
मगर दर्दे-निहाँ से अब
रिहाई भी अता कर दे

  ~ अश्विनी यादव

मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

जौन एलिया


“ जो गुज़ारी जा सकी हम से

हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है ,,


जाने कौन सी ज़िन्दगी होगी वो जिसे गुज़ारने वाला ये दावा
करता है कि ये गुज़ारी नहीं जा सकती थी फिर भी मैंने वो ज़िन्दगी गुज़ार दी है।
लहू को थूकने की बात कहने वाला एक मात्र शायर जिसे दर्द की कलम, दर्द का दीवाना, मुहब्बत का शायर, जानी, हज़रत जौन... 

ऐसे न जाने कितने नामों से हम याद करते हैं नाम है जौन एलिया... बहुत जगह पर जान तो कहीं पर जॉन लिखा मिल सकता है, अब जब नाम की बात आ ही गयी है तो एक शे'र याद आता है उनका...

“ मैं जो हूँ 'जौन-एलिया' हूँ जनाब

इस का बेहद लिहाज़ कीजिएगा ,,

ऐसे ही तमाम ऐसे शे'र हैं हर किसी की ज़बान पर जैसे बस ही गए हैं।

जौन एलिया के बारे में एक दो चार नहीं बल्कि सैकड़ों की तादात में ब्लॉग्स मिल जाएँगें पढ़ने को, लेकिन सच कहूँ तो जौन को जानना है , महसूस करना है तो जौन की नज़्मों को पढ़िए सब समझ आने लगेगा।

नज़्म ( रम्ज़ )

तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे
मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं

मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें
मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं

इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर 
इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन

मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता
ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता


नज़्म  ( सज़ा  )


हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम 

हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं


तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम 

मैं कौन हूँ ये ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं 


तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में

और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं


तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं

पस सर-ब-सर अज़िय्यत ओ आज़ार ही रहो


बेज़ार हो गई हो बहुत ज़िंदगी से तुम 

जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो


तुम को यहाँ के साया ओ परतव से क्या ग़रज़

तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो


मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बे-मेहर ही रहा 

तुम इंतिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो


तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई 

इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो


मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात 

मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो


अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मिरे लिए

बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो


जब मैं तुम्हें नशात-ए-मोहब्बत न दे सका 

ग़म में कभी सुकून-ए-रिफ़ाक़त न दे सका


जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं

जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बेवफ़ा के हैं


फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं 


नज़्म ( नकारा  )


कौन आया है

कोई नहीं आया है पागल

तेज़ हवा के झोंके से दरवाज़ा खुला है

अच्छा यूँ है

बेकारी में ज़ात के ज़ख़्मों की सोज़िश को और बढ़ाने

तेज़-रवी की राहगुज़र से

मेहनत-कोश और काम के दिन की

धूल आई है धूप आई है

जाने ये किस ध्यान में था मैं

आता तो अच्छा कौन आता

किस को आना था कौन आता




  जौन एलिया को महसूस कीजिये❤️

 



शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

भारत भूषण पंत

भारत भूषण पंत ( जन्म 3 जून 1958 - मृत्यु 11 नवम्बर 2019 ) उर्दू भाषा के साहित्यकार थे। वो लखनऊ में रहते थे। उन्होंने फ़िल्म धोखा (2007) में गीत लिखे हैं। [1]



उनकी ज़िन्दगी दर्द से भरी हुई थी, जब वे बड़े हो रहे थे तो उन्होंने अपने पिता को लम्बी बीमारी के बाद खो दिया। बाद में उनकी पत्नी उनका सहारा बनीं लेकिन उन्हें भी कैंसर हो गया और 2014 में वे भी इस दुनिया से विदा हो गयीं। पत्नी के देहांत के बाद पंत जी बिल्कुल अकेले रह गए।काॅपरेटिव की नौकरी से स्वैच्छिक सेवनिवृत्ति उन्होंने पहले ही ले ली थी। उनकी जिंदगी अकेलेपन का शिकार हो गयी। और बीमारी के कारण 11 नवम्बर 2019 को विवेकानंद हॉस्पिटल, लखनऊ में अंतिम साँस ली।

मुनव्वर राना,ख़ुशबीर शाद और भारत भूषण पंत तीनों ही वाली आसी साहब के शागिर्द थे।

कृतियाँ

तन्हाइयाँ कहती हैं

यूँ ही चुपचाप गुज़र जा (1995)

कोशिश (1988)

बेचेहरगी

मुझ पर मेरा साया पड़ गया (2021)

अन्य संकलित पुस्तकें:

हिंदुस्तानी तनाज़ुर

शुमार

अन्य :

फ़िल्म धोखा ( 2007 ) में गीत लिखे हैं। [2] [3]

मशहूर गायिका कविता सेठ के प्राइवेट अल्बम के लिए भी गीत लिखे हैं। [4]



अन्य कड़ियाँ

रेख़्ता बेवसाइट पर भारत भूषण पंत [5]Edit

कविता कोश पर भारत भूषण पंत [6]


शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

नज़्म - “ तुम अछूत हो ,,

तुम नीच जाति के हो
तुम्हें पता तो होगा ही
क्या काम है तुम्हारा
क्या नाम है तुम्हारा
क्यों ग़ैर जाति के लोग
महज़ गाली समझते हैं

तुम्हारे हिस्से है गाली
तुम्हारी क़िस्मत है ठोकर
महज़ तुम्हारे छूने से
ये मन्दिर ये किताबें
ये कुएं, तालाब सब
यहाँ तलक कि मिट्टी भी
हो जाती है अछूत
तुम समझते क्यों नहीं
तुम अछूत हो, अछूत!

तुम्हें खेत जोतने है
घरों की नींव खोदनी है
नाले साफ करने हैं
सीवरों में उतरना है
यही सब करते हुए पागल
तुम्हें इक रोज़ मरना है
न ईश्वर तुम्हारा है
न ये लोग तुम्हारे हैं

ग़र तुम्हें अपना समझते तो
तुमसे प्यार भी करते
तुम्हारा मान भी रखते
अरे पगलों ज़रा जागो
झूठी नींदों को तोड़ो
अपने चारों तरफ़ देखो
इक इंसान बनने को
तुम कितने तंज़ सहते हो

घोड़ियाँ छीनी जाती हैं
मूँछे कटवाई जाती हैं
बेटियाँ नोंची जाती हैं
बोटियाँ फेंकी जाती हैं
करोगे क्या भला तुम भी
ये आदत हो चुकी अपनी
उन महलों की फ़सीलों पर
माथा टेकने से ग़र
तुम्हें फुर्सत मिले तो फिर
ज़रा सोचो इन सब के सबब
क्यों हड्डियाँ तोड़ी जाती हैं
क्यों तुम्हारी जानें जाती है

  
   ~ अश्विनी यादव



गुरुवार, 7 अक्टूबर 2021

ज़िन्दगी को बढ़ते रहने का नज़रिया दीजिये


"हमेशा टूटने का मतलब ख़त्म होना नहीं होता 

कभी-कभी टूटने से जिंदगी की शुरुआत होती है,,


इन दोनों पंक्तियों को मैंने ट्विटर पर पढ़ा साथ ही ये तस्वीर भी संलग्न थी, पहले तो बस पढ़ा देखा पोस्ट अच्छी लगी....चूँकि जान पहचान वाले मित्र की थी इसलिए रीट्वीट करके बढ़ चला... लेकिन ये बात एक दिन के बाद तक याद रही मुझे और अब इसका एक छोटा सा निष्कर्ष मिला है मुझे।


"टूटिये लेकिन फिर से बनना और उठ खड़े होना...फिर से बिखर सकने के क़ाबिल हो जाने की हिम्मत ले आना, ये आप पर निर्भर करता है। एक ही तो ज़िन्दगी है और इसमें भी थोड़ा बहुत परेशानियाँ न आईं तो फिर आप लज़्ज़त-ए-ग़म से चूक जाएँगें। 


मुझे मेरा एक शे'र याद आ गया....


रंज-ओ-ग़म सारे भुला रहा हूँ,

मैं दुबारा ख़ुद को बना रहा हूँ,


हाँ ये सच है कि सब भुला कर आगे बढ़ने की तमन्ना आपके ख़ुद के ऊपर निर्भर करती है। यदि आप चाहते हैं कि भुलाकर आगे बढ़ा जाए नई जिंदगी की शुरुआत की जाए तो यक़ीन मानिए ये दुनिया ये प्रकृति इतना बड़ा दिल रखती है कि आपको फिर से एक मौका दे देगी। बिखरने में भी ज़िन्दगी खोजिए यारों...


        ~ अश्विनी यादव 


बुधवार, 6 अक्टूबर 2021

आज कल मैं

       आज कल मैं बस लोगों को देखता हूँ फिर उनको सोचता हूँ कि वो कितना बदले, कैसे बदले और कहाँ से बदले फिर इन सबको मिलाकर ये जानने की नाकाम कोशिश करता हूँ कि आख़िर वो क्यों बदले..?

आज कल मैं बस अपने मोबाइल में व्हाट्सएप ओपन करता हूँ तो स्टेटस पर जाकर दुनिया को दुनियादारी देखता हूँ और कभी कभी तो हँसता भी हूँ। सच कहूँ तो मुझे नुसरत साहब की एक कव्वाली में से एक शे'र याद आता है कि

"मेरे हाथों से तराशे हुए पत्थर के सनम,
  मेरे ही सामने भगवान बने बैठे हैं,,

फिर सोचता हूँ कि किसी भी आदमी को ज़रा सा ख़ुदा ने नवाज़ क्या दिया, वो ज़ाहिल अपनी ही औकात भूल बैठा है। अपने अपनों को भूल गया जो उसके बुरे दिनों में उसकी सबसे ज़ियादह मदद किये थे। लेकिन मैं भी तो ग़लत ही कह रहा है कि "अपने अपनों" अरे जब कोई अपना समझता होता तो दूर जाता है क्यों भला? सच कहूँ तो वो सब मतलब थे या फिर थोड़ी सी शोहरत देख ज़ाहिल हो गए। पर मैंने सीखा है कि चीज़ों को आसान बनाइये, उलझाइये नहीं...

वो लोग ये न समझ पायेंगें कि उन्होंने क्या खो दिया है आज, चूँकि सच कहूँ मैं तो आज भी जिस बात पर जिस ओहदे का गुमां करते हैं वो.... मैंने उनसे दोस्ती से पहले ही उससे बड़ी बड़ी चीज़ों को ठोकर मारकर आगे बढ़ जाता रहा हूँ लगभग हर एक महीने में। पर क्या है कि दुनिया उगते सूरज को सलाम करती है, सो मैं भले ही अँधेरों का इकलौता चराग़ रहा हूँ पर क्या है कि जुगनू अक्सर ही लोगों का ध्यान खींच लेते हैं और उसी जुगनू के पीछे चलते चलते उस चराग़ को कहीं पर भूल जाते हैं फिर क्या...... फिर वही होना है जो होता है आया है कि भटकने वाला जाकर किसी खाईं में गिर जाता है तब उस दीपक/चराग़ की याद आती है,,,,, लेकिन दुःखद कि वो चराग़ अब किसी और को रास्ता दिखा रहा है किसी और के हिस्से में उसकी रौशनी आ रही है।

ज़ाहिल लोग ज़हनी तौर पर तीरगी से लबरेज़ रहते हैं, इनको जब तलक ठोकर नहीं लगती है तब तलक ये अपनी बीनाई की क़ीमत समझ नहीं पाते हैं।

ऐसे लोग बस मिलते जाएँगें, इन पर थोड़ा सा ध्यान दीजिए और सबक लीजिये कि इनसे कितना दूरी रखी जाए कि बस काम भी हो जाये नाम भी हो जाये और रिश्ता  भी महज़ कहने भर को ज़िन्दा भी रह सके। हमारा काम है चलते जाना सो चलते ही चलेंगें। ज़िन्दगी में रुक जाना ही सबसे बड़ी मूर्खता है शायद..... इसलिए कहा जाता है कि ज़िन्दगी हर इक रोज़ नया सबक देती है।

आज कल मैं हर रोज़ नया सबक सीख रहा हूँ यानी ज़िन्दगी जीने का लुत्फ़ ले रहा हूँ।

    
         ~ अश्विनी यादव

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

ग़ज़ल ( political)

आज तुम्हारी हरक़त पर मैं थूक रहा
या'नी समझो आदत पर मैं थूक रहा

तुझ मक्कार पे दुनिया सारी थूकी थी
ओ झूठे तिरी फ़ितरत पर मैं थूक रहा

अँधियारे में ज़बरन चीज़ जली कोई
हद है ऐसी उजलत पर मैं थूक रहा

चीख़ें, मातम, आँसू, लाठी, बेचैनी
ज़ुल्मी तेरी चाहत पर मैं थूक रहा

सर कुचलोगे तो क्या चुप हो जाऊँ मैं
हिटलर तेरी बरक़त पर मैं थूक रहा

      ~ अश्विनी यादव

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

नज़्म

तुम्हारा चेहरा ही बदला है
मेरी आँखें वही हैं
अब न तुम अच्छी लगती हो
न ही तुम्हारी आँखें
तुम्हारी ही आवाज बदली है
मेरे कान वही हैं
अब न तुम्हें सुनना अच्छा है
न ही तुम्हारी बातें
कुल मिलाकर ये समझो
मैं वैसा ही हूँ
लेकिन अब न तुम अच्छी हो
न ही तुम्हारा साथ।
___________________
  अश्विनी यादव

शनिवार, 11 जुलाई 2020

ग़ज़ल ( इलाहाबाद )

रिश्ता इलाहाबाद है वादा इलाहाबाद
दिल का सुकूँ है बन चुका पूरा इलाहाबाद।

हर वक़्त का अच्छा भला सिक्का इलाहाबाद
इस वक़्त हमको है मिला शाना इलाहाबाद।

ग़मगीन होते ही मेरे छपटा लिया है यार
यूँ चाहता है मुझको ये मेरा इलाहाबाद।

इक मुख़्तसर सी याद या दिल में दबाए प्यार
हर एक शय में है मेरे ज़िन्दा इलाहाबाद।

हैं इल्म इसके पास इतना सब्त-ए-शहकार
पहली नज़र में शह्र था भाया इलाहाबाद।

जब भी कभी आँखें खुली देरी लिए अल-सुब्ह
इस बात से ही हो गया गुस्सा इलाहाबाद।

इक चाय का कुल्हड़ ज़रा सी हो जलेबी साथ
इक है इसी आदत का अब हिस्सा इलाहाबाद।

दिन भर लिखा दिन भर पढ़ा करता रहा है शाम
फिर रात में भी जागता रहता इलाहाबाद।

ये दिल कहाँ टूटा करे किससे ज़िग़र की बात
हाँ - हाँ वहीं  तो है जहाँ हारा इलाहाबाद।

लो आज मेरे पास है हासिल सभी की रात
बस इक उसी की याद में तन्हा इलाहाबाद।

इक मैं इलाहाबाद हूँ इक तुम इलाहाबाद
फिर भी अधूरा रह गया क़िस्सा इलाहाबाद।

इक फ़िक्र हमने देख ली लेकर हसीं सौग़ात,
आमद हमारी जीत का लाया इलाहाबाद।

कुछ दौर अपने ख़ुद छिपाया कुछ छिपाये दौर,
इक जज़्बनामा लिख रहा तन्हा इलाहाबाद।
_____________________
   अश्विनी यादव