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मंगलवार, 17 जून 2025

नई ग़ज़ल

सुकून-ओ-सब्र तुम तोड़ा करोगे
मिरी जां सच में तुम ऐसा करोगे

तुम्हारे साथ मेरा नाम लेगें
भला कितनों से तुम उलझा करोगे

भले हम लाख तेरा ध्यान रक्खें
नई रंजिश ही तुम पैदा करोगे

तिरी परछाई समझा था मैं ख़ुद को
कि अब ग़ैरों को हमसाया करोगे

सुनों जब हम यहाँ होगें नहीं तो
मुझे हर दर पे तुम ढूँढा करोगे

सुनहरी शाम हम रेतों पे बैठे
वो हर इक बात तुम सोचा करोगे

बहुत रोओगी तुम भी जान उस दिन
अगर मैं मर गया तो क्या करोगे

     ~ अश्विनी यादव

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2021

नज़्म ~ तुम्हें ये हक़ दिया किसने


तुम्हें ये हक़ दिया किसने
किसी को मार देने का
घरौंदे तोड़ देने का
तुम्हें ये हक़ दिया किसने

बनाकर लाश उनको
कर रहे ज़ुल्म-ओ-सितम
निशाँ कोई नहीं बाक़ी
है उनकी बेगुनाही का
उन्हें बर्बाद करने का
तुम्हें ये हक़ दिया किसने

किसी की लाश पर चढ़कर
पैरों से कुचलने का
किसी हैवान के जैसे
शज़र वीरान करने का
तुम्हें ये हक़ दिया किसने


  ~ अश्विनी यादव

ज़िन्दगी को बढ़ते रहने का नज़रिया दीजिये


"हमेशा टूटने का मतलब ख़त्म होना नहीं होता 

कभी-कभी टूटने से जिंदगी की शुरुआत होती है,,


इन दोनों पंक्तियों को मैंने ट्विटर पर पढ़ा साथ ही ये तस्वीर भी संलग्न थी, पहले तो बस पढ़ा देखा पोस्ट अच्छी लगी....चूँकि जान पहचान वाले मित्र की थी इसलिए रीट्वीट करके बढ़ चला... लेकिन ये बात एक दिन के बाद तक याद रही मुझे और अब इसका एक छोटा सा निष्कर्ष मिला है मुझे।


"टूटिये लेकिन फिर से बनना और उठ खड़े होना...फिर से बिखर सकने के क़ाबिल हो जाने की हिम्मत ले आना, ये आप पर निर्भर करता है। एक ही तो ज़िन्दगी है और इसमें भी थोड़ा बहुत परेशानियाँ न आईं तो फिर आप लज़्ज़त-ए-ग़म से चूक जाएँगें। 


मुझे मेरा एक शे'र याद आ गया....


रंज-ओ-ग़म सारे भुला रहा हूँ,

मैं दुबारा ख़ुद को बना रहा हूँ,


हाँ ये सच है कि सब भुला कर आगे बढ़ने की तमन्ना आपके ख़ुद के ऊपर निर्भर करती है। यदि आप चाहते हैं कि भुलाकर आगे बढ़ा जाए नई जिंदगी की शुरुआत की जाए तो यक़ीन मानिए ये दुनिया ये प्रकृति इतना बड़ा दिल रखती है कि आपको फिर से एक मौका दे देगी। बिखरने में भी ज़िन्दगी खोजिए यारों...


        ~ अश्विनी यादव 


बुधवार, 6 अक्टूबर 2021

आज कल मैं

       आज कल मैं बस लोगों को देखता हूँ फिर उनको सोचता हूँ कि वो कितना बदले, कैसे बदले और कहाँ से बदले फिर इन सबको मिलाकर ये जानने की नाकाम कोशिश करता हूँ कि आख़िर वो क्यों बदले..?

आज कल मैं बस अपने मोबाइल में व्हाट्सएप ओपन करता हूँ तो स्टेटस पर जाकर दुनिया को दुनियादारी देखता हूँ और कभी कभी तो हँसता भी हूँ। सच कहूँ तो मुझे नुसरत साहब की एक कव्वाली में से एक शे'र याद आता है कि

"मेरे हाथों से तराशे हुए पत्थर के सनम,
  मेरे ही सामने भगवान बने बैठे हैं,,

फिर सोचता हूँ कि किसी भी आदमी को ज़रा सा ख़ुदा ने नवाज़ क्या दिया, वो ज़ाहिल अपनी ही औकात भूल बैठा है। अपने अपनों को भूल गया जो उसके बुरे दिनों में उसकी सबसे ज़ियादह मदद किये थे। लेकिन मैं भी तो ग़लत ही कह रहा है कि "अपने अपनों" अरे जब कोई अपना समझता होता तो दूर जाता है क्यों भला? सच कहूँ तो वो सब मतलब थे या फिर थोड़ी सी शोहरत देख ज़ाहिल हो गए। पर मैंने सीखा है कि चीज़ों को आसान बनाइये, उलझाइये नहीं...

वो लोग ये न समझ पायेंगें कि उन्होंने क्या खो दिया है आज, चूँकि सच कहूँ मैं तो आज भी जिस बात पर जिस ओहदे का गुमां करते हैं वो.... मैंने उनसे दोस्ती से पहले ही उससे बड़ी बड़ी चीज़ों को ठोकर मारकर आगे बढ़ जाता रहा हूँ लगभग हर एक महीने में। पर क्या है कि दुनिया उगते सूरज को सलाम करती है, सो मैं भले ही अँधेरों का इकलौता चराग़ रहा हूँ पर क्या है कि जुगनू अक्सर ही लोगों का ध्यान खींच लेते हैं और उसी जुगनू के पीछे चलते चलते उस चराग़ को कहीं पर भूल जाते हैं फिर क्या...... फिर वही होना है जो होता है आया है कि भटकने वाला जाकर किसी खाईं में गिर जाता है तब उस दीपक/चराग़ की याद आती है,,,,, लेकिन दुःखद कि वो चराग़ अब किसी और को रास्ता दिखा रहा है किसी और के हिस्से में उसकी रौशनी आ रही है।

ज़ाहिल लोग ज़हनी तौर पर तीरगी से लबरेज़ रहते हैं, इनको जब तलक ठोकर नहीं लगती है तब तलक ये अपनी बीनाई की क़ीमत समझ नहीं पाते हैं।

ऐसे लोग बस मिलते जाएँगें, इन पर थोड़ा सा ध्यान दीजिए और सबक लीजिये कि इनसे कितना दूरी रखी जाए कि बस काम भी हो जाये नाम भी हो जाये और रिश्ता  भी महज़ कहने भर को ज़िन्दा भी रह सके। हमारा काम है चलते जाना सो चलते ही चलेंगें। ज़िन्दगी में रुक जाना ही सबसे बड़ी मूर्खता है शायद..... इसलिए कहा जाता है कि ज़िन्दगी हर इक रोज़ नया सबक देती है।

आज कल मैं हर रोज़ नया सबक सीख रहा हूँ यानी ज़िन्दगी जीने का लुत्फ़ ले रहा हूँ।

    
         ~ अश्विनी यादव

शुक्रवार, 29 मई 2020

शख़्सियत ( आदित्य आदि )

तस्वीर देखकर शायद न जान पाओगे कि ये पोस्ट क्यों हैं और शख़्सियत के नए अंक में ये कौन हैं...

एक लड़का जिस पर शुरुआत में बहुत सारे साथ के लोग ही हँसते थे कि क्या उलूल जुलूल कर रहे हो यार, लेकिन आज उसी लड़के से ही वो लोग मार्गदर्शन चाहते हैं कि भाई बता कैसे आगे बढ़ा जाए... पोस्ट पूरी पढ़ियेगा आप, विश्वास रखिये निराश नहीं होंगे आप।

     नाम है आदित्य आदि इन्हें नाम से कम जानते हैं लोग बल्कि इनके काम से लगभग भारत की वो हिंदी भाषी जनता जो इंटरनेट का इस्तेमाल करती है वो लगभग पूरी जनता रू-ब-रू हो चुकी है।

      आपने नाम सुना होगा "डायरी की शायरी" पेज जो करीब 1 करोड़ 13 लाख यानी 11 मिलियन से ज़ियादः लोग सीधे जुड़ा हुआ है। "शायरी संग्रह'' फेसबुक पेज जो कि 2 मिलियन से ज़ियादः लोगों से सीधे जुड़ा हुआ है। इनके id से 1 लाख 20 हजार के करीब लोग सीधे जुड़े हुए हैं.... ये तो सीधे जुड़ने की बात हुई लेकिन बड़े से बड़े और छोटे से छोटे लोग कोई भी हो लगभग सबने इनके पेज पर पोस्ट की हुई फोटोज को कहीं न कहीं शेयर जरूर की ही होगी, ख़ासकर व्हाट्सएप स्टेटस में।

         ये तो हुआ हासिल, लेकिन अब जानते हैं आदित्य भाई के बारे में.....

घर बरेली है, रहते नोयडा में हैं क्योंकि ऑफिस वही पर है, ऑफिस की बात आई तो प्रोफेशन भी जानना चाहेंगें आप लोग... केमेस्ट्री से पोस्ट ग्रेजुएट होने के बाद इन्होंने भी वही किया जो कि पढ़ने में ठीक ठाक लगभग हर एक लड़का करता है...बाक़ी के मेरे जैसे इंजीनियरिंग कर लेते हैं...हाहाहाहा । मज़ाक़ से हटकर अब जब मैंने पूछा कि फिर तैयारी करना बन्द क्यों किया आपने..? तो आदित्य भाई का बेहद शालीन जवाब आया कि भाई मुझे लगा कि मेरी मेहनत अब एक सही मुक़ाम तक आ गयी है तो पीछे हटना भी थी नही यानी पेज के क़रीब 70k ( सत्तर हज़ार ) लोग गए थे कुछ इनकम भी शुरू हो गयी थी.... इन सभी पेजेस पर काम का बोझ इतना बढ़ गया था कि पढ़ाई कमज़ोर हो रही थी सो मैंने बहुत हिम्मत करके फैसला किया 'अब मैं अपनी मनपसंद नई राह' पर चलूँगा..… ऐसा कहते हुए उन्होंने अपना पूरा फोकस अपने इसी हुनर को कैरियर बना डाला।

अभी कुछ दिनों पहले ही जब एक करोड़ का आँकड़ा पार किया तो भावुक होकर उन सभी संघर्ष वाले दिनों को याद किया आदित्य भाई ने। भाई का कहना है कि एक वो दौर था कि दोस्त हँसते थे और चिढ़ाते थे, नेट रीचार्ज के पैसे न होने पर जो पैसे पॉकेट मनी मिलता था खाने के लिए उसमें कटौती करके रीचार्ज करवाते थे और पोस्ट करते थे शुरुआत में.... लोग इग्नोर मारकर आगे बढ़ जाते थे लेकिन आज वो लोग अपने अपने अलग अलग कामों के लिए सम्पर्क करने की कोशिश करते रहते हैं।

     बेहद शालीन, सौम्य व्यक्तित्व के मालिक आदि भाई से समाज के बारे में बात हुई तो उनका नज़रिया उन्हीं की भाषा में "भाई समाज बदल गया है लोग अजीब सा व्यवहार कर रहे हैं लेकिन ये सब ऑनलाइन यानी सोशल साइट्स पर ही है ज़ियादःतर जबकि ऑफलाइन यानी समाज के बीच मुहब्बत ज़िन्दा है। मैं ख़ुद भी जाति, धर्म आदि से ख़ुद को ऊपर देखता हूँ और अपने दिनचर्या में रोज़ मुहब्बत ही फैलाता हूँ,,
      मुझे अच्छा लगा आदित्य भाई की ये मुहब्बती बातें सुनकर।
 
         एक बात जो मुझे पता है कि इनके यानी आदित्य भाई के पेज पर जो भी शाइरी होती है वो व्याकरण के मानक पर खरी नही है, बह्र वग़ैरह नही है वहाँ लेकिन भावनाओं के अनुसार कोट्स, और तुकबन्दी की गई है.... इसलिए मेरे सभी जानने वालों शायरों से अनुरोध है कि कृपया जज़ बनकर फैसला न देने लगियेगा, मेहनत को देखिए सराहिये और दुआएँ दीजिये।

       मैंने बहुतों को देखा है यहाँ तक कि मैं ख़ुद एक पेज चलाता हूँ @vismrita नाम से लेकिन उसको 15k से ऊपर ले जाने में मेरी हालत ख़राब हो गयी है इस हिसाब से सोचिए कि भाई ने अथाह मेहनत की होगी इस लेवल तक जाने के लिये।

यहाँ तक पहुँचने के बाद इतने शालीन और साधारण रहने वाले आदित्य भाई को भविष्य के लिए शुभकामनाएं। उम्मीद है आप मुहब्बत ज़िन्दा रखेंगें और आगे बढ़ते रहेंगें।

______________________
   अश्विनी यादव

बुधवार, 13 जून 2018

जो तुम लौट आते


हमारे दरमियान यह जो ख़ामोशी है. यही मुहब्बत है. तुम दुनिया में मसरूफ़, मैं दुनिया में मसरूफ़ जब कि हम दोनों ही के पास वैसा कोई काम नहीं है कि हम एक दूसरे में मसरूफ़ न हो सकें. इसके पीछे जो वज्ह है, वो मुहब्बत है.
लौटना इतना मुश्किल नहीं है, कभी होता ही नहीं.
तुम्हें लौट आना चाहिए !

मरज़ ये वो था कि जिस में तो जान जाती है
मैं मर भी जाता जो वो वक़्त पर नहीं आता
ﻣﺮﺽ ﯾﮧ ﻭﮦ ﺗﮭﺎ ﮐﮧ ﺟﺲ ﻣﯿﮟ ﺗﻮ ﺟﺎﻥ ﺟﺎﺗﯽ ﮨﮯ
ﻣﯿﮟ ﻣﺮ ﺑﮭﯽ ﺟﺎﺗﺎ ﺟﻮ ﻭﮦ ﻭﻗﺖ ﭘﺮ ﻧﮩﯽ ﺁﺗﺎ
_________
फ़ैयाज़ ﻓﯿﺎﺽ

रविवार, 5 नवंबर 2017

शख्सियत (आंनद सागर पाण्डेय 'अनन्य देवरिया')

नमस्कार,
     हर बार की तरह फिर मैं हाजिर हूं एक नई शख्सियत, जो कि मेरे अपनों में से एक हैं, के साथ में।
बेहद शालीन और सुलझे हुए पेशे से इंजीनियर तथा अद्भुत कलमकार........ हजारों लाखों दिलों पर अपनी गजल और शायरी से राज करने वाले एक बेहतरीन लेखक, कवि, इंजीनियर, भाई, दोस्त और इन सभी के साथ एक अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी.....
श्री आनंद सागर पांडेय 'अनन्य देवरिया' जी
[संस्थापक, राष्ट्रीय साहित्य चेतना मंच]
[उपाध्यक्ष, अखिल भारतीय साहित्य उत्थान परिषद]
       से रूबरू करवाता हूँ।
आपकीपढ़ाई की सारिणी जरा सा लम्बी है, फिर भी इतना काफी है बताने के लिए की अभी सीनियर प्रोजेक्ट इंजीनियर के तौर पर एक बड़ी कम्पनी मे कार्यरत है। साथ साथ अपने ओजस्वी कलम की ताकत से साहित्य की सेवा में रमे रहते है।
      
बहुत कम उम्र में ही भैया अनन्य जी कई किताबें पब्लिस हो चुकी है। 2011 में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के साहित्यिक मंच की स्थापना के साथ साथ आज एक अन्य साहित्यिक परिषद में बतौर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी के साथ साहित्य के प्रति प्रेम के दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं। इन सबके अतिरिक्त वीडियो म्यूजिक एलबम के प्रोजेक्ट और नए poets के लिए Mic. Session वाले स्टूडियो पर भी काम कर रहें हैं......जो कि जल्द ही सामने होगा आप सभी के।
           अब आते है हम अपने और अनन्य भैया से मुलाकात और रिश्ते पर... तो....
मैं अक्सर पढ़ता रहता था इन्हें, क्योंकि मुझे इतनी ओजस्वी कवितायें और दिल को छू जाने वाली गजलें और कहीं मिलती भी नही थीं किसी अन्य के वाल पर, सो मैं आपका बहुत बड़ा प्रशंसक बन चुका था....फिर कमेंट और कभी कभी हाल चाल होता रहता था..
बारिश का मौसम था, मैंने मोबाईल नम्बर लिया भैया से और बात जब कर रहा था तभी अचानक बारिश शुरू हो गयी और मेरा फोन भीग गया..... खैर बात हुई ।
फिर हर जरूरत पर अक्सर सलाह के लिए, हाल खबर के लिए बात होती रहती है, हाँ एक चीज है कि मेरे राजनीतिक पोस्ट से कभी कभी आहत भी हो जाते है,,,,,लेकिन उन्हें पता है कि यदि मैंने कोई बात कही है तो उसके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य है...बाकी जब भी कोई नई बात होती है हमसे जरूर शेयर करते ही रहते हैं। अभी हाल में ही मुझे उस सम्मानित साहित्यिक मंच का प्रदेश महासचिव नामित किया है जिसके आप संस्थापक हैं, मुझे सच में कभी नही पता था कि एक दिन इस सम्मानित ओहदे का हकदार भी मैं होऊंगा। इसके लिए मैं पुनः आपका और राष्ट्रीय अध्यक्ष  जी आभार प्रकट करता हूँ।
.......लेकिन जब भी मैं पूछता हूँ कि अब "आगे की क्या प्लानिंग हैं...??? तो पहले आप हंसते है फिर....
फ़िलहाल तो अभी इन्ही सब पर काम कर रहा हूँ जिसपे फोकस है, हाँ यदि इसके साथ मे कोई बढ़िया प्रोजेक्ट समझ आता है या दिखाई पड़ता है तो उसे हम जरूर आगे बढाएंगें.......।।
    मैं अश्विनी यादव, आपके ज्वलंत मुद्दों पर सच की आग लिखने वाली कलम और आपके उज्ज्वलम भविष्य की कामना करते हुए.....इस बात का धन्यवाद करता हूँ कि मुझे एक बड़े भाई, परम् मित्र, बेहतरीन कवि मार्गदर्शक और अद्वितीय व्यक्तित्व के रूप में आप का साथ मिला।

         ― अश्विनी यादव