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मंगलवार, 17 जून 2025

नई ग़ज़ल

सुकून-ओ-सब्र तुम तोड़ा करोगे
मिरी जां सच में तुम ऐसा करोगे

तुम्हारे साथ मेरा नाम लेगें
भला कितनों से तुम उलझा करोगे

भले हम लाख तेरा ध्यान रक्खें
नई रंजिश ही तुम पैदा करोगे

तिरी परछाई समझा था मैं ख़ुद को
कि अब ग़ैरों को हमसाया करोगे

सुनों जब हम यहाँ होगें नहीं तो
मुझे हर दर पे तुम ढूँढा करोगे

सुनहरी शाम हम रेतों पे बैठे
वो हर इक बात तुम सोचा करोगे

बहुत रोओगी तुम भी जान उस दिन
अगर मैं मर गया तो क्या करोगे

     ~ अश्विनी यादव

सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल

तुम्हारे दिल में भी तूफ़ाँ उठा है
हमें भी प्यार तुमसे हो चला है

किसी अय्यार जैसे हो गए हो
तुम्हारा नाम मुझको रट गया है

तुम्हारी बात भी अब टालने में
मुझे अब ख़ुद से लड़ना पड़ रहा है

अजब सी कश्मकश है ज़िन्दगी में
कि मेरा मैं ही मुझसे जा रहा है

अभी तक मैं यहाँ पर सो रहा हूँ
मगर पिंजड़े का पंछी उड़ गया है

     ~ अश्विनी यादव

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2022

नज़्म ~ ऐ तख़्तनशीं लोगों तुमने

ऐ तख़्तनशीं लोगों तुमने
ये कैसा मुल्क़ बना डाला
हर हिस्से में है जख़्म बहुत
हर शक़्ल पे मातम छाया है
कतरा कतरा खूँ बहता है
रेज़ा-रेज़ा सब मरते हैं
हर लम्हा इक डर रहता है
कोई साया जाने कहाँ से
आ धमके फिर खा ही जाए
हम डरते हैं सब डरते हैं
सबका डरना लाज़िम भी है
इन कमरों में चीख़ रही है
सच कहने वाली ख़ामोशी
सच सुन ने वाली इक आदत
सच लिखने वाले कुछ पागल
हैं ज़ब्त कहीं पर लोग यहाँ
कोई ख़ोजे आख़िर इनको
हाँ! इन लोगों में हिम्मत है
तोपों के आगे रख देंगें
कुछ गीत, कहानी, नज़्म, कलम
कुछ दीवारें पोती जायेंगीं
कुछ वादे लिक्खे जाएंगें
वो दहशत तोड़ी जाएगी
कुछ पुतले फूँके जाएँगें
ढपली पे राग बनेगी फिर
तब एक मशाल जलेगी फिर
जंजीरें, तलवारें, तोपें
ये सब गायब हो जायेंगीं
हम फिर से तब मुस्काएंगें
हम फिर से सच कह पायेंगें..

  ~ अश्विनी यादव

शनिवार, 12 फ़रवरी 2022

नज़्म

मैंने हर सम्त उसे चाहा है
बड़ी शिद्दत से
मुझको लगता है
वो मिल जाएगी
सच कहूँ तो
बड़ी तलब है मुझको
जाने किस रोज़ को
वो पास मेरे आएगी
उसे इस तरह से
चाह रहा हूँ अब तक
उस तक ख़बर ये आख़िर
कैसे जाएगी

~ अश्विनी यादव

शनिवार, 13 नवंबर 2021

ग़ज़ल

बंदगी रखिये भला क्या हर किसी से
सारे चेहरे लग रहे हैं मतलबी से

कब तलक नाराज़गी पर हम मनाएँ
आज रिश्ता तोड़ लो अपनी ख़ुशी से

आदमी ही आदमी का यार कब था
मिल रहे हैं लोग सबसे ज़्यादती से

ख़ुदकुशी बेहद बुरी है चीज़ प्यारे
शाइरी को भी मिलाओ ज़िन्दगी से

हो मुबारक तुमको ये रंगीन दुनिया
हमको लम्हें काटने हैं सादगी से
________________

  अश्विनी यादव

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2021

नज़्म ~ तुम्हें ये हक़ दिया किसने


तुम्हें ये हक़ दिया किसने
किसी को मार देने का
घरौंदे तोड़ देने का
तुम्हें ये हक़ दिया किसने

बनाकर लाश उनको
कर रहे ज़ुल्म-ओ-सितम
निशाँ कोई नहीं बाक़ी
है उनकी बेगुनाही का
उन्हें बर्बाद करने का
तुम्हें ये हक़ दिया किसने

किसी की लाश पर चढ़कर
पैरों से कुचलने का
किसी हैवान के जैसे
शज़र वीरान करने का
तुम्हें ये हक़ दिया किसने


  ~ अश्विनी यादव

ज़िन्दगी को बढ़ते रहने का नज़रिया दीजिये


"हमेशा टूटने का मतलब ख़त्म होना नहीं होता 

कभी-कभी टूटने से जिंदगी की शुरुआत होती है,,


इन दोनों पंक्तियों को मैंने ट्विटर पर पढ़ा साथ ही ये तस्वीर भी संलग्न थी, पहले तो बस पढ़ा देखा पोस्ट अच्छी लगी....चूँकि जान पहचान वाले मित्र की थी इसलिए रीट्वीट करके बढ़ चला... लेकिन ये बात एक दिन के बाद तक याद रही मुझे और अब इसका एक छोटा सा निष्कर्ष मिला है मुझे।


"टूटिये लेकिन फिर से बनना और उठ खड़े होना...फिर से बिखर सकने के क़ाबिल हो जाने की हिम्मत ले आना, ये आप पर निर्भर करता है। एक ही तो ज़िन्दगी है और इसमें भी थोड़ा बहुत परेशानियाँ न आईं तो फिर आप लज़्ज़त-ए-ग़म से चूक जाएँगें। 


मुझे मेरा एक शे'र याद आ गया....


रंज-ओ-ग़म सारे भुला रहा हूँ,

मैं दुबारा ख़ुद को बना रहा हूँ,


हाँ ये सच है कि सब भुला कर आगे बढ़ने की तमन्ना आपके ख़ुद के ऊपर निर्भर करती है। यदि आप चाहते हैं कि भुलाकर आगे बढ़ा जाए नई जिंदगी की शुरुआत की जाए तो यक़ीन मानिए ये दुनिया ये प्रकृति इतना बड़ा दिल रखती है कि आपको फिर से एक मौका दे देगी। बिखरने में भी ज़िन्दगी खोजिए यारों...


        ~ अश्विनी यादव 


मंगलवार, 28 सितंबर 2021

और अलविदा कह न सका


 उससे बिछड़ते वक़्त मुझे ऐसा लगा कि कम से कम अलविदा तो बोल दूँ पर मेरे कंपकँपाते होंठो ने मेरा साथ न दिया.... मैं बस चुप बिल्कुल चुप मानो किसी बुत की तरह बस देखता रह गया।


उस लम्हे के साथ साथ हमेशा ही मुझे वसीम बरेलवी का एक शे'र याद आता है...


वो मेरे सामने ही गया और मैं

रास्ते की तरह देखता रह गया 


      किसी को भी ज़िन्दगी में इस ग़म की अमानत अगर मिली हो तो यक़ीन मानो वो बहुत सारे ग़मों को अपने अंदर समेटे हुए मुस्कुराते हुए जी सकता है। सच कहूँ तो ऐसे वेशकीमती ख़ज़ाने का भरपूर लुत्फ़ लेना चाहिए,,,, इस नश्तर से दुःख को पिरोने का हुनर आपको मिल जाये बस समझिये कि बर्बादी की खाक़ से एक और नायाब शायर पैदा हो जाएगा।


दुआ है दर्द को पिरोने का हुनर मिले सबको🙏❤️


     ~ अश्विनी यादव


( लिखी जा रही नॉवल में से इक छोटा सा हिस्सा )


शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

नज़्म – तानाशाह

सुनो ग़ौर से सब दरबारी
आओ सब कोई बारी बारी

जूते बाहर उतरे सबके
अंदर केवल मैं पहनूँगा

ऐसे बनते हैं राजा बाबू
सोना मिट्टी से तोलूँगा

सब से ऊपर मैं ही हूँ बस
सबके सीने पर चढ़ लूँगा

ग़र सोच रहे बाग़ी बनने को
जीना मुश्किल मैं कर दूँगा

 
   ~ अश्विनी यादव

मंगलवार, 22 जून 2021

ग़ज़ल

उसने गंगा से धुलवाया था गोकुल,
कुछ यूँ उसने शुद्ध कराया था गोकुल,

कोई उसको समझाओ कि माधव ने
आँख बनाकर ख़ुद पे सजाया था गोकुल

गोकुलधाम भले ही छूटा हो लेकिन
कान्हा जी ने कब बिसराया था गोकुल

प्रियतम सह जाते हैं सारे रंज-ओ-ग़म
सबसे सच्ची प्रीत निभाया था गोकुल

प्रेम बिना है दुनिया सूनी सच मानो
चाहत में घर बार लुटाया था गोकुल

     
     ~ अश्विनी यादव

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

ग़ज़ल ( political)

आज तुम्हारी हरक़त पर मैं थूक रहा
या'नी समझो आदत पर मैं थूक रहा

तुझ मक्कार पे दुनिया सारी थूकी थी
ओ झूठे तिरी फ़ितरत पर मैं थूक रहा

अँधियारे में ज़बरन चीज़ जली कोई
हद है ऐसी उजलत पर मैं थूक रहा

चीख़ें, मातम, आँसू, लाठी, बेचैनी
ज़ुल्मी तेरी चाहत पर मैं थूक रहा

सर कुचलोगे तो क्या चुप हो जाऊँ मैं
हिटलर तेरी बरक़त पर मैं थूक रहा

      ~ अश्विनी यादव

बुधवार, 26 अगस्त 2020

नज़्म ( साहब की तैयारी )

साहब ने सारी तैयारी कर रक्खी,
हर इक घर पर पहरेदारी कर रक्खी,

जो बोलेगा उसको पीटा जाएगा,
कोर्ट -कचहरी रोज़ घसीटा जाएगा,

पहले तुमको थाने में बुलवाएंगें,
फिर वर्दी से मनमर्ज़ी करवाएंगें,

लेकिन साहब तुमको इतना ध्यान रहे,
कर्म सभी का हासिल है ये ज्ञान रहे,

जैसे तुम यूँ सबको आज रुलाते हो,
तुम भी रोये थे क्यों भूले जाते हो,

हाँ मा'लूम हमें हैं तुम ही दाता हो,
जेल नहीं तो मौत के भाग्य विधाता हो,

ईश्वर जाने कब तक का ये खेला है,
जाने कैसे हम सब ने ये झेला है,

रोजी रोटी का उनका इक वादा था,
पर लगता है ये सब शोर सराबा था,

जंगल में हम रहते हैं ये बोले थे,
भाषण में वो अंगारे ही घोले थे,

जात बिरादर का डंका भी पीटे थे,
यूँ समझो बस ये सब कर ही जीते थे,

इक वादे पर सौ वादा कर ऐंठे थे,
हाथों का ये खेल समझ कर बैठे थे,

उस दिन तक तो पैरों में गिर जाते थे,
हरक़त ये चमचों से भी करवाते थे,

उस मालिक को जैसे ही सत्ता सौंपी,
मझधारे में हमने थी नौका सौंपी,

उस दिन से फिर रोज़ हमें दुत्कारा है,
अब आख़िर के हक़ में वोट हमारा है,

बढ़कर आगे आओ फिर टकराने को,
उस ज़ुल्मी के मुँह पर सच कह जाने को,

देखो कितनी आग रखे हो सीने में,
बाहर ला के शामिल कर लो जीने में,

वोट से पहले गुरूर-ए-हाकिम तोड़ो जी,
बिन तोड़े यूँ कॉलर तो मत छोड़ो जी,

     ~ अश्विनी यादव

मंगलवार, 2 जून 2020

जन्मोत्सव भारत भूषण पन्त दादा का

जन्मदिन की बधाई दादा
______________________
        हाँ मैंने अपनी पढ़ाई -लिखाई के समय में से थोड़ा सा कीमती समय एक जगह पर ख़र्च किया था वो भी किसी शायर के सानिध्य के लिये, वैसे तो जुड़ाव शायर होने की वजह से हुआ था लेकिन बाद मुझे दादा और बच्चे जैसी मुहब्बत का एहसास होने लगा सो समय बीच बीच में ख़र्च होता गया। मैं इस दावे से कह सकता हूँ आज यानी 3 जून 2020 से पहले के क़रीब 3 साल मैंने केवल पढ़ाई पर दिए लेकिन इसी बीच में एक ऐसे महान शख़्सियत का इतने क़रीब आना और रिश्ते में जुड़ जाना नाम देना और फिर चले जाना...... वाक़ई में मेरी ज़िन्दगी के बदलाव का सबसे शानदार तथा दुःखद पलों का मेला था।
      
          एकदम ग़ज़ब का मेला था शुरुआत में सारी दुकानें एकदम बेहतरीन लगीं, फिर चलते चलते एक साथी कहीं खो गया अब मुझे पूरे मेले को पार करना होगा और फिर मेले के दूसरे छोर पर हम दोनों मिलेंगें जहाँ पर मिलने का वादा किया गया है। मुझे यक़ीन हैं कि आप मेरे काम की बहुत सारी चीज़ें सँजोये होगे उस पार। लेकिन तब तक मैं पूरे मेले में आपके क़िस्से सुनाता रहूँगा🙏
  
          स्वर्गीय श्री भारत भूषण पन्त जी का जन्मदिन यानी मेरी शाइरी के लिए भी एक अहम दिन, वैसे आपने मुझे शाइरी तो नहीं सिखाई लेकिन जो तजुर्बा दिया है मुहब्बत दिया है और जाने का ग़म दिया है न वो मेरी शाइरी की जान है। वो दर्द, मुहब्बत और तन्हाई को महसूस करने का रंग ही मेरी शाइरी को वजूद देता है। आपको पढ़ने के बाद दुनिया को देखने का नज़रिया बदल जाता है......एक अलग ही बात है आप में।
वैसे तो आप ग़ालिब के दीवाने थे, उन्हीं की ज़मीन पर बहुत ग़ज़लें कही है आपने लेकिन मैं आपके ग़ैरमौजूदगी में भी कहता हूँ कि मेरे ख़ातिर आप 'ग़ालिब से पहले हो'। मैंने बहुत ज़ियादः तो नहीं पढ़ा है लोगों को लेकिन जितना भी पढ़ा है कोई भी आप जितना महसूस नही हुआ है।

        आपने मुझे धीरेन्द्र सिंह 'फ़ैयाज़' जैसे बड़े शायर को भाई के रूप में भेंट किया। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पूछने पर आपने कहा कि मेरा बच्चा है, बड़ा प्यारा बच्चा है, शाइरी सीख रहा है...एक दिन नाम करेगा...अच्छा लिखता है अभी भी। अब क्या ही कहूँ दादा कि आपने क्या क्या नही दिया क्या क्या दे दिया...बहुत कुछ है।

       मैं विस्मृता लेकर आ रहा हूँ जल्द ही और उस दिन जो आपके सामने कहा था वो ही मेरा मक़सद रहेगा, आप वहाँ जन्नत से देखिएगा कि आपका बच्चा इस देश भर में कैसे नाम रौशन करता है🙏

सब कहते हैं तू वापिस आ जा घर अपने,
कब आये हैं राह-ए-जन्नत जाने वाले....

दादा आपको जन्मदिन की दिल से मुबारकबाद, आप शाइरी में ज़िन्दा हो बस ये ही आपके इस दुनिया में होने का निशाँ है।
________________________
  अश्विनी यादव​​ 

मंगलवार, 31 मार्च 2020

ग़ज़ल

वो मंजिल दूर लगती जा रही है,
भले गाड़ी ये चलती जा रही है,

हँसा हूँ जोर से लज़्ज़त-ए-ग़म पर,
मिरी उम्मीद बढ़ती जा रही है,

किसी की भूख बढ़ती देखकर ही,
हमारी आँख मुँदती जा रही है,

मिरे आगे ये दुनिया रो रही है,
मिरी भी उम्र घटती जा रही है।

अभी तक मौत से झगड़ा रहा है,
वही महबूब बनती जा रही है ।

जहाँ सारा यहीं श्मशान होगा,
ये जो तलवार खिंचती जा रही है।

कि खाली हाथ से मैं क्या करूँगा,
ये ही मुझको खटकती जा रही है,

सभी त्यौहार अब मातम लगेंगें,
नई दीवार बनती जा रही है,

कहो तो क़ब्र मेरी खोद आएँ,
मिरी भी नब्ज़ रुकती जा रही है.....
____________________
 
   अश्विनी यादव