कुल पेज दृश्य

hindi-urdu Poet लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
hindi-urdu Poet लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

ग़ज़ल

हँसते, रोते, सुनते, गाते ज़िन्दा ऐसे रहते हैं

थे जिस मिट्टी के मीर-ओ-ग़ालिब हम उस मिट्टी के हैं


सच कहने से ज़ियादह मुश्किल होता है ख़ुद पर सुनना

मुँह पर अच्छा रहने से ही रिश्ते अच्छे रहते हैं


ना उम्मीदी कुफ़्र कहे हो लेकिन ऐ दुनिया वालों

जिसके साथ नही है कोई फिर कैसी उम्मीदे हैं


ग़ज़लें सुनने की आदत थी उससे मिलने से पहले

और उसी के ग़म-ए-हिज्राँ में अब हम ग़ज़लें कहते हैं


मेरे जैसा बनने की तुम ये जो चाहत रखते हो

लेकिन इसकी भरपाई में सारे सुख जा सकते हैं


          ~ अश्विनी यादव

बुधवार, 27 सितंबर 2023

नज़्म ~ जब ख़्वाब हक़ीक़त हो जाये

तुम्हें मुस्कुराना आता है
यानी मेरी आँखें चमकेंगीं
तुम्हें गले लगाना आता है
यानी मेरे ग़म बंट जाएंगें
तुम बात समझती हो सारी
सो मुझको सुकूँ मिल पायेगा
तुम सूरत में भी सीरत में भी
मेरे ख़्वाबों के जैसे हो
होंठ तुम्हारे सुर्ख गुलाबी
और आँखें हैं कजरारी सी
चूम लूँ मैं और खो जाऊँ
ये भी तो इक हसरत है
सबसे अव्वल ये कहना है
झुमके तुम पर जँचते हैं
साड़ी बिंदी हँसता चेहरा
बस इतनी तमन्ना है मेरी
हुस्न तुम्हारा सोने जैसा
आँखें हीरे जैसी हैं
हर इक नक्श तराशा यूँ है
जैसे नदी मुड़े कोई
इक दिन ये सारा कुछ भी
मेरे नाम करोगी तुम
हाए, ये भी तो इक दुनिया है
और उस में तुम अधिकारी हो।

शनिवार, 11 फ़रवरी 2023

नज़्म – तुम्हें अब भूल जाना है

तुम्हें ग़र भूल जाऊँ तो
मुझे कुछ चैन आ जाये
वो ही सब बात मुझको याद
अभी तक आ रही हैं पर
मुझे क्या भूल जाना है
ये सब भी याद रखना है
यही सब याद रहने में
नहीं कुछ भूल पाता हूँ
मगर अब भी गुज़ारिश है
ख़ुदा मुझ पर रहम कर दे
कि उसको भूल जाने में
ज़रा मेरी मदद कर दे
ये मेरी साँस ले ले तू
ये मेरा होश भी ले लो
मेरी आँखें मिरा ये दिल
मेरा साया मेरा ये नाम
तुम्हें जो भी ज़रूरत हो
मेरे मौला तू सब ले ले
मगर दर्दे-निहाँ से अब
रिहाई भी अता कर दे

  ~ अश्विनी यादव

सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल

तुम्हारे दिल में भी तूफ़ाँ उठा है
हमें भी प्यार तुमसे हो चला है

किसी अय्यार जैसे हो गए हो
तुम्हारा नाम मुझको रट गया है

तुम्हारी बात भी अब टालने में
मुझे अब ख़ुद से लड़ना पड़ रहा है

अजब सी कश्मकश है ज़िन्दगी में
कि मेरा मैं ही मुझसे जा रहा है

अभी तक मैं यहाँ पर सो रहा हूँ
मगर पिंजड़े का पंछी उड़ गया है

     ~ अश्विनी यादव

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

भारत भूषण पंत

भारत भूषण पंत ( जन्म 3 जून 1958 - मृत्यु 11 नवम्बर 2019 ) उर्दू भाषा के साहित्यकार थे। वो लखनऊ में रहते थे। उन्होंने फ़िल्म धोखा (2007) में गीत लिखे हैं। [1]



उनकी ज़िन्दगी दर्द से भरी हुई थी, जब वे बड़े हो रहे थे तो उन्होंने अपने पिता को लम्बी बीमारी के बाद खो दिया। बाद में उनकी पत्नी उनका सहारा बनीं लेकिन उन्हें भी कैंसर हो गया और 2014 में वे भी इस दुनिया से विदा हो गयीं। पत्नी के देहांत के बाद पंत जी बिल्कुल अकेले रह गए।काॅपरेटिव की नौकरी से स्वैच्छिक सेवनिवृत्ति उन्होंने पहले ही ले ली थी। उनकी जिंदगी अकेलेपन का शिकार हो गयी। और बीमारी के कारण 11 नवम्बर 2019 को विवेकानंद हॉस्पिटल, लखनऊ में अंतिम साँस ली।

मुनव्वर राना,ख़ुशबीर शाद और भारत भूषण पंत तीनों ही वाली आसी साहब के शागिर्द थे।

कृतियाँ

तन्हाइयाँ कहती हैं

यूँ ही चुपचाप गुज़र जा (1995)

कोशिश (1988)

बेचेहरगी

मुझ पर मेरा साया पड़ गया (2021)

अन्य संकलित पुस्तकें:

हिंदुस्तानी तनाज़ुर

शुमार

अन्य :

फ़िल्म धोखा ( 2007 ) में गीत लिखे हैं। [2] [3]

मशहूर गायिका कविता सेठ के प्राइवेट अल्बम के लिए भी गीत लिखे हैं। [4]



अन्य कड़ियाँ

रेख़्ता बेवसाइट पर भारत भूषण पंत [5]Edit

कविता कोश पर भारत भूषण पंत [6]


मंगलवार, 7 सितंबर 2021

ग़ज़ल ( अल्लमा इक़बाल को समर्पित )

आदम के खूँ का प्यासा ये कारवाँ हमारा
है नफ़रतों में डूबा सारा जहाँ हमारा

मर्ज़ी का हैं वो मालिक सुनता नहीं किसी की
सौदागरी में खोया है निगहबाँ हमारा

सर फोडकर हमारा कहता है देंगे चारा
क़ातिल ही अब बना है फिर पासबाँ हमारा

गंगा हो या कि यमुना रोती है दर्द अपना
बाक़ी कहाँ बचा है विरसे निशाँ हमारा

बस आपने दिल ही दिल में रोते हैं आज हम सब
मालूम क्या किसी को दर्द- ए -निहाँ हमारा

अहले वतन के लोगो करियेगा शुक्र उनका
जिनके लहू ने सींचा है सायबाँ हमारा

वो हैं मिटाने को अब जो नक्श थे ख़ुशी के
आओ बचाने ख़ातिर ये कहकशाँ हमारा

अहले-वतन के लोगों है जश्न भी ज़रूरी
लाखों की क़ब्र से बना ये गुलसिताँ हमारा

     ~ अश्विनी यादव

[ अल्लमा इक़बाल को सादर समर्पित ]

सोमवार, 24 मई 2021

नज़्म

वैसे तो ये कहना ग़लत ही होगा
लेकिन फिर भी यक़ीन करना
हम दोनों की तकदीरों में
नहीं लिखा इस जनम में मिलना...

बहुत जतन कर चुका हूँ मैं भी
बहुत जतन कर चुकी हो तुम भी
हम दोनों से ख़फ़ा है दुनिया
सच से एकदम जुदा है दुनिया
इस दुनिया को नहीं पता है
क्या मुहब्बत, क्या चाहत है ?

हम दोनों को बतलाना था
सबको मुहब्बत तक लाना था
लेकिन ये होने से रहा अब
तुम भी सब कुछ भूल ही जाना
मत बतलाना किसी को कुछ भी
हम भी ऐसे जीते रहेंगें
दिल की कोई बात न सुनना
हरदम हँसकर बातें करना

हम दोनों को ख़ुश रहना है
मिलो कभी तो ध्यान रखना..
हम दोनों की तक़दीरों में
नहीं लिखा इस जनम में मिलना....
_________________
अश्विनी यादव

बुधवार, 12 मई 2021

ग़ज़ल

देखिये कैसे गिनाई जा रही लाशें हमारी,
आज पानी में बहाई जा रही लाशें हमारी,

अब नहीं सुनता है कोई रो लें कितना चीख़ लें हम,
चील कौवों को खिलाई जा रही लाशें हमारी,

वो कि ज़िम्मेदार आदम सो रहा है जागकर भी,
सच कहो तो बस लुटाई जा रही लाशें हमारी,

मन की बातें कर रहें हैं आज कल सुनते नहीं हैं,
जग हँसाई में दिखाई जा रही लाशें हमारी,

मर रहें हैं लोग साहब अब तो गद्दी छोड़ दो तुम,
तेरे महलों में दबाई जा रही लाशें हमारी,
___________________
    अश्विनी यादव

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

ग़ज़ल ( political)

आज तुम्हारी हरक़त पर मैं थूक रहा
या'नी समझो आदत पर मैं थूक रहा

तुझ मक्कार पे दुनिया सारी थूकी थी
ओ झूठे तिरी फ़ितरत पर मैं थूक रहा

अँधियारे में ज़बरन चीज़ जली कोई
हद है ऐसी उजलत पर मैं थूक रहा

चीख़ें, मातम, आँसू, लाठी, बेचैनी
ज़ुल्मी तेरी चाहत पर मैं थूक रहा

सर कुचलोगे तो क्या चुप हो जाऊँ मैं
हिटलर तेरी बरक़त पर मैं थूक रहा

      ~ अश्विनी यादव

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

नज़्म

तुम्हारा चेहरा ही बदला है
मेरी आँखें वही हैं
अब न तुम अच्छी लगती हो
न ही तुम्हारी आँखें
तुम्हारी ही आवाज बदली है
मेरे कान वही हैं
अब न तुम्हें सुनना अच्छा है
न ही तुम्हारी बातें
कुल मिलाकर ये समझो
मैं वैसा ही हूँ
लेकिन अब न तुम अच्छी हो
न ही तुम्हारा साथ।
___________________
  अश्विनी यादव

शनिवार, 11 जुलाई 2020

ग़ज़ल ( इलाहाबाद )

रिश्ता इलाहाबाद है वादा इलाहाबाद
दिल का सुकूँ है बन चुका पूरा इलाहाबाद।

हर वक़्त का अच्छा भला सिक्का इलाहाबाद
इस वक़्त हमको है मिला शाना इलाहाबाद।

ग़मगीन होते ही मेरे छपटा लिया है यार
यूँ चाहता है मुझको ये मेरा इलाहाबाद।

इक मुख़्तसर सी याद या दिल में दबाए प्यार
हर एक शय में है मेरे ज़िन्दा इलाहाबाद।

हैं इल्म इसके पास इतना सब्त-ए-शहकार
पहली नज़र में शह्र था भाया इलाहाबाद।

जब भी कभी आँखें खुली देरी लिए अल-सुब्ह
इस बात से ही हो गया गुस्सा इलाहाबाद।

इक चाय का कुल्हड़ ज़रा सी हो जलेबी साथ
इक है इसी आदत का अब हिस्सा इलाहाबाद।

दिन भर लिखा दिन भर पढ़ा करता रहा है शाम
फिर रात में भी जागता रहता इलाहाबाद।

ये दिल कहाँ टूटा करे किससे ज़िग़र की बात
हाँ - हाँ वहीं  तो है जहाँ हारा इलाहाबाद।

लो आज मेरे पास है हासिल सभी की रात
बस इक उसी की याद में तन्हा इलाहाबाद।

इक मैं इलाहाबाद हूँ इक तुम इलाहाबाद
फिर भी अधूरा रह गया क़िस्सा इलाहाबाद।

इक फ़िक्र हमने देख ली लेकर हसीं सौग़ात,
आमद हमारी जीत का लाया इलाहाबाद।

कुछ दौर अपने ख़ुद छिपाया कुछ छिपाये दौर,
इक जज़्बनामा लिख रहा तन्हा इलाहाबाद।
_____________________
   अश्विनी यादव

शुक्रवार, 5 जून 2020

नज़्म ( ख़ुशनसीब कलम )

तुम आगे की सीट पर बैठी
क़िताब में उलझी हुई थी
और मैं तुम्हारे बगल से
दो सीट पीछे बैठा
तुम्हारे बालों में उलझा था
जिनसे छनकर
तुम्हारे चेहरे की रौशनी
मुझ तक आ रही थी
तुम्हारे उंगलियों के बीच फँसी
वो ख़ुशनसीब कलम
जिसे लगातार अपने होठों से
छुए जा रही थी
और इधर मैं ख़ुद को
कलम सा महसूस
कर रहा था.....
__________________
   अश्विनी यादव

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

नज़्म

कभी कभी यह लगता है 
मैं किसी नाव के जैसा हूँ
इस बेहद बड़े समंदर में 
है इक छोटा-सा वजूद मेरा
और वजूद भी है बस इतना
कि जिस टापू से गुज़रा हूँ
हर इक पर मेरा नाम हुआ

जब कुछ लहरों को पार किया
मुझको, मेरी पहचान मिली 
बहुत सारी नावों के बीच
इक साथी सी नाव मिली
मेरे किस्से फिर ख़ूब चले
लेकिन ये बस मुझे पता था

जब मैं उन लहरों में फँसा था
कितना डूबा कितना उबरा
कितनी बार मरा भी था
मगर सुनो! पागल लहरों
वो सब मेरा अंत नहीं
पर कभी कभी लगता है कि 
मैं मर जाता तो क्या होता।
___________________
     अश्विनी यादव

रविवार, 22 दिसंबर 2019

तू झूठा है झूठों का क्या

यूँ ज़हर सदा उगलेगा क्या..?
अब राह नही बदलेगा क्या..?

गिरने से पहले जनता का,
तू हाथ कभी पकड़ेगा क्या..?

तू बनता है मज़लूम सदा,
सो दर्द मिरा समझेगा क्या..?

तुझसे कोई उम्मीद नही,
तू झूठा है झूठों का क्या..?

जब तू इंसान नहीं है तब,
डर ईश्वर का रक्खेगा क्या..?

चन्दन वन से इस भारत को,
तू विषधर है छोड़ेगा क्या..?

वादा झूठा, बातें झूठी,
गंगा की लाज रखेगा क्या..?

रोहित और नज़ीब कहाँ हैं ?
चीख़- पुकार सुनेगा क्या,

हिन्दू -हिन्दू रटता है तू,
कमलेश के घर पे कहेगा क्या..?

भात बिना इक मरती बिटिया,
लाशों से देश बनेगा क्या..?

तुझको क्या लगता है ज़ालिम,
सदियों तक राज चलेगा क्या..?

देश बँटा है लोग बँटे हैं,
पागलपन ही चाहेगा क्या..?

तू दुनिया से ऊपर का है,
सब लम्बी ही फेंकेगा क्या..?

इक दिन मोहब्बत का पौधा,
बाग-ए-नफ़रत में उगेगा क्या..?
_______________
अश्विनी यादव

शनिवार, 7 दिसंबर 2019

नई ग़ज़ल

ज़िन्दा रहते दिल का दर्द सुनाने वाले
कितने अच्छे होते हैं मर जाने वाले

मर जाते ही दुनिया को खूबी दिखती है
बदल रहें हैं किस्से भी बतलाने वाले

एक शजर ने वीराने में उम्र गुजारी
सूख गया तो आए उसे गिराने वाले

अंगारों को पार किया तब मर्कज़ आया
 कितने हैं मुझ ऐसे पैर जलाने वाले

इक दरिया सैलाब बना तो आफत आई
अब तक जाने कहां थे बांध बनाने वाले

ये दुनिया केवल मतलब से ही साथ रही
देखो फूँक रहे हैं प्यार जताने वाले

सब कहते हैं तू वापिस आ जा घर अपने
कब आयें हैं राह-ए-जन्नत जाने वाले

हाँ! मैं पागल हूँ, शायर हूँ, दूर रहो तुम
थक कर मुझसे हार गए समझाने वाले

_____________________
  अश्विनी यादव


शनिवार, 21 सितंबर 2019

ग़ज़ल

सब कहते हैं ऐसा होता आया है
यार कहानी में राँझा भी मरता है

हीर कहाँ बचने वाली ही थी पहले
दर्द भरा इतिहास हमारा कहता है

उस पत्थर को आख़िर कैसे बतलाऊँ
इक दरिया मेरी आँखों में रहता है

दिल के अरमां टुकड़ों में बँट जाते हैं
तब जाकर आँसू का रस्ता बनता है

दुनिया कहती ज़िन्दा रहते मौत जिसे
हम भी देखें इसमें क्या -क्या दुखता है

चाहत, राहत, धोखा, मातम, बेचैनी
मेरे हिस्से में आख़िर क्या मिलता है

हुस्न भला क्या चीज़ मुहब्बत के आगे
दिन बदले तो ये भी रोज़ बदलता है

__________________
  अश्विनी यादव

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

नज़्म

___________
वो इक चेहरा था जो
वो जो नाम था उसका
हाँ सब याद है मुझको
कुछ भूला नही हूँ मैं
तब हर शख़्स अच्छा था
जो हमशक़्ल थे तेरे
जो हमनाम थे तेरे
यार तमाम लोग मुझे
अब पसन्द नही बिल्कुल
जिनसे शक़्ल मिलती है
या आवाज़ मिलती है
जिनके नाम तुझ से है
नफरत है मुझे सबसे
जिन्हें प्यार करता था
जिनकी बात करता था
नफरत है मुझे सबसे...
नफरत है मुझे तुमसे...
____________
अश्विनी यादव

सोमवार, 5 अगस्त 2019

ग़ज़ल

इश्क़ में ख़ुद को ज़रा झूठा किया,
तुम नही मानी तभी रूठा किया,

यार ये यारी भला है कौन सी,
दूर से मरता हुआ देखा किया,

जो कबूतर शहर के क़ाबिल न थे,
भेजकर जंगल बहुत अच्छा किया,

नोंचकर फेंको मुझे पागल करो,
और कह दो इश्क में धोखा किया,

पंख पाकर याद रखनी थी ज़मीं,
नींद में भी इक तुझे सोचा किया,

एक चाहत थी मुझे इज़हार की,
हर गली जाकर तभी पीछा किया,

वो अभी कल रात को बेवा हुई,
सुब्ह सबने जिस्म पर दावा किया,

इक क़फ़स में कैद थी राहत मिरी,
रूह ख़ातिर साँस का सौदा किया,

तालियाँ बजती रहीं कुछ देर तक,
आख़िरी के सीन में ऐसा किया,

__________________
   अश्विनी यादव

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

नज़्म ( मुहब्बत वजूद दे गई )

________
मेरे अरमां
इतने बोझिल थे
कि लगता है मैं
किसी कब्रगाह सा हूँ
एक दो नहीं
हज़ारों हसरतें
दफ़्न चुकी हो जैसे
पर हर कहानी की तरह
इसमें भी मोड़ आ गया
एक बरसात की तरह
तुम आ गयी
फिर क्या होना था
मैं ज़िन्दा हो गया
तुम्हारी मुहब्बत
मुझे वजूद दे गई
_____________
  अश्विनी यादव

शुक्रवार, 10 मई 2019

'वो लड़की'

न समझ थी
न ही ताक़त थी
न ही शरीर का कोई अंग विकसित था
वो बस चौदह बरस की थी
फ़िर भी उसे
सहना पड़ा ये
पहाड़ बराबर दुःख
ये वो पीड़ा थी
जिसकी बराबरी
सौ बिच्छुओं का डंक,
हर इक हड्डी टूट जाने
नही कर सकता
और सच कहूँ तो कोई अनुमान नही
इतना दर्द उफ़्फ़!
लेकिन फ़िर भी
आदेश था कोर्ट का
जनना था उस बच्चे को
जो पैदा होने से पहले ही
ज़िन्दा लाश बना दिया था
ये अनचाही चीज़
उसे मिली कैसे कोई बतायेगा ?

ये भी इक बच्ची थी
अभी खेल कूद रही थी
इसके बस्तों की किताब भी
अगले कक्षा का
और इसका जन्मदिन अगले बरस का
दोनों इंतज़ार में थे
इक दिन कुछ दरिंदों ने
इस फूल को नोच डाला
इतना नोंचा जितनी ताक़त थी उनमें
पहले तो बात दबी
लेकिन ये बात नही आग थी
जिसने उन जिस्मों को जला दिया
जो छुपाना चाहते थे
फिर भी इस आग को
थाने के तूफ़ान से बढ़कर
कचहरी के बारिश को पार करना था

आज़ बहुत देर हो गयी
मीलार्ड की आँख खुलने में
क्योंकि इन केस के पन्नों में पंख लगे है
पैसों के, तारीखों के,
पेट का आकार बढ़ गया है
जान के अंदर भी इक जान आ गयी है
और कहा गया देर हो गयी है
इसे जनना होगा
वो लगभग मर ही गयी होगी
उस ''अनचाहे'' को जनने में
बच्चा अनाथाश्रम का हुआ
और इस अधमरी को दस लाख का चेक,
ये रुपया इसको आगे के लिए था
या ज़िन्दगी गंवाने का था
या फ़िर बलात्कार सहने
बच्चे पैदा करने का ईनाम था

पर अभी समझ न आया कि
देर हुई कहाँ थी
क्यूँ सहना पड़ा ?
सज़ा में देरी क्यूँ?
सज़ा किसको मिली आख़िर….?

________________________
      अश्विनी यादव
ashwini yadav poetry