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गुरुवार, 17 जून 2021

नज़्म ~ इंतज़ार में हैं

वो दिन भी जल्दी आएगा
हम इंतज़ार में हैं
इंतज़ार में हैं

हाँ उस दिन भी हम बोलेंगें
हम लड़कर सज़ा दिलवाएंगें
हिसाब हमारा बाक़ी है
हम बेकरार से हैं
इंतज़ार में हैं

आवाज उठेगी हक़ की जब
हर ज़िन्दा बुत से पूछेंगें
क्यों होने दिया ये ज़ुल्मों सितम
हम गुस्से के इज़हार में हैं
हम इंतज़ार में हैं

हर इक तमाशा ये जो है
किसने तराशा है इसको
हर उसका नक़ाब उतरेगा
ज़ब्त-ए-नफ़रत-ओ-दीवार में हैं
हम इंतज़ार में हैं

~ अश्विनी यादव

गुरुवार, 18 जून 2020

कविता ( हम काले लोग )

हम मज़दूर हैं, हम काले हैं
गिरने की, जलने की, मेहनत की
आदत है हमारी,
लेकिन तुम नाज़ुक हो चुके हो
हमारा ख़ून पीते पीते..

हमारे ये हाथ तेरे
इन हथौड़ों से ज़ियादः
इन पत्थरों से ज़ियादः
मजबूत हो गए हैं
खदाने बदल गईं
कुदालें बदल गईं
लेकिन ये हमारे हाथ
नही बदले तो नही बदले....

हम जानवर तो नही थे
जो यूँ हमें तुमने बेंचा
फिर से ख़रीदा फिर से बेंचा
मैं पूछता हूँ के आख़िर क्यों..?
मेरे रंग के कारण ?
मेरी जात के कारण ?
या मेरे भाषा के कारण ?

चलो मैं फिर से पूछता हूँ
अधिकार किसने दिया ?
ऊँचा किसने बनाया ?
मैं उसी से जंग चाहता हूँ
तुम बीच में मत आना
नाज़ुक हो टूट जाओगे
जब पहाड़ तोड़ दिया
तो तुम कुछ भी नही हो....

~ अश्विनी यादव

रविवार, 22 दिसंबर 2019

तू झूठा है झूठों का क्या

यूँ ज़हर सदा उगलेगा क्या..?
अब राह नही बदलेगा क्या..?

गिरने से पहले जनता का,
तू हाथ कभी पकड़ेगा क्या..?

तू बनता है मज़लूम सदा,
सो दर्द मिरा समझेगा क्या..?

तुझसे कोई उम्मीद नही,
तू झूठा है झूठों का क्या..?

जब तू इंसान नहीं है तब,
डर ईश्वर का रक्खेगा क्या..?

चन्दन वन से इस भारत को,
तू विषधर है छोड़ेगा क्या..?

वादा झूठा, बातें झूठी,
गंगा की लाज रखेगा क्या..?

रोहित और नज़ीब कहाँ हैं ?
चीख़- पुकार सुनेगा क्या,

हिन्दू -हिन्दू रटता है तू,
कमलेश के घर पे कहेगा क्या..?

भात बिना इक मरती बिटिया,
लाशों से देश बनेगा क्या..?

तुझको क्या लगता है ज़ालिम,
सदियों तक राज चलेगा क्या..?

देश बँटा है लोग बँटे हैं,
पागलपन ही चाहेगा क्या..?

तू दुनिया से ऊपर का है,
सब लम्बी ही फेंकेगा क्या..?

इक दिन मोहब्बत का पौधा,
बाग-ए-नफ़रत में उगेगा क्या..?
_______________
अश्विनी यादव

शनिवार, 7 दिसंबर 2019

नई ग़ज़ल

ज़िन्दा रहते दिल का दर्द सुनाने वाले
कितने अच्छे होते हैं मर जाने वाले

मर जाते ही दुनिया को खूबी दिखती है
बदल रहें हैं किस्से भी बतलाने वाले

एक शजर ने वीराने में उम्र गुजारी
सूख गया तो आए उसे गिराने वाले

अंगारों को पार किया तब मर्कज़ आया
 कितने हैं मुझ ऐसे पैर जलाने वाले

इक दरिया सैलाब बना तो आफत आई
अब तक जाने कहां थे बांध बनाने वाले

ये दुनिया केवल मतलब से ही साथ रही
देखो फूँक रहे हैं प्यार जताने वाले

सब कहते हैं तू वापिस आ जा घर अपने
कब आयें हैं राह-ए-जन्नत जाने वाले

हाँ! मैं पागल हूँ, शायर हूँ, दूर रहो तुम
थक कर मुझसे हार गए समझाने वाले

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  अश्विनी यादव