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सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल

तुम्हारे दिल में भी तूफ़ाँ उठा है
हमें भी प्यार तुमसे हो चला है

किसी अय्यार जैसे हो गए हो
तुम्हारा नाम मुझको रट गया है

तुम्हारी बात भी अब टालने में
मुझे अब ख़ुद से लड़ना पड़ रहा है

अजब सी कश्मकश है ज़िन्दगी में
कि मेरा मैं ही मुझसे जा रहा है

अभी तक मैं यहाँ पर सो रहा हूँ
मगर पिंजड़े का पंछी उड़ गया है

     ~ अश्विनी यादव

रविवार, 22 दिसंबर 2019

तू झूठा है झूठों का क्या

यूँ ज़हर सदा उगलेगा क्या..?
अब राह नही बदलेगा क्या..?

गिरने से पहले जनता का,
तू हाथ कभी पकड़ेगा क्या..?

तू बनता है मज़लूम सदा,
सो दर्द मिरा समझेगा क्या..?

तुझसे कोई उम्मीद नही,
तू झूठा है झूठों का क्या..?

जब तू इंसान नहीं है तब,
डर ईश्वर का रक्खेगा क्या..?

चन्दन वन से इस भारत को,
तू विषधर है छोड़ेगा क्या..?

वादा झूठा, बातें झूठी,
गंगा की लाज रखेगा क्या..?

रोहित और नज़ीब कहाँ हैं ?
चीख़- पुकार सुनेगा क्या,

हिन्दू -हिन्दू रटता है तू,
कमलेश के घर पे कहेगा क्या..?

भात बिना इक मरती बिटिया,
लाशों से देश बनेगा क्या..?

तुझको क्या लगता है ज़ालिम,
सदियों तक राज चलेगा क्या..?

देश बँटा है लोग बँटे हैं,
पागलपन ही चाहेगा क्या..?

तू दुनिया से ऊपर का है,
सब लम्बी ही फेंकेगा क्या..?

इक दिन मोहब्बत का पौधा,
बाग-ए-नफ़रत में उगेगा क्या..?
_______________
अश्विनी यादव

गुरुवार, 29 जून 2017

बूंद हूँ बेटी हूँ

बादलों से छूटी पानी की बूंद हूँ
हरे पत्ते से टपकती हुई बूंद हूँ,
मिलकर और से बड़ी हो  गयी
फिर टूटकर बिखरती हुई बूंद हूँ,

माँ के घड़े से ताकती हुई सी हूँ
या छलकर कमर पे सम्हली हुई,
झरने के आड़े टेढ़े रास्ते की हूँ
हूँ बावली काई पे फिसलती हुई,

मैं बूंद भी हूँ औ तेरी बेटी भी हूँ
       
       ― अश्विनी यादव

सोमवार, 20 मार्च 2017

मैं ही इंकलाब हूँ

गरीबों का छप्पर हूँ, कलम की आवाज हूँ,
दुखियों का रहबर हूँ, बेबसों का सरताज हूँ,

जला दे जुल्मी को, शब्दों में लिपटा आग हूँ,
रक्त रंजिश शमशीर हूँ, हाँ मै ही इन्कलाब हूँ,

पहली उठी बंद मुठ्ठी हूँ, शोषितों के जज्बात हूँ,
रोज गिरती हुई ईमारत सी, सोच-ए-समाज हूँ,

किस्तों में जीना छोड़,निर्माण की शुरुआत हूँ,
'कलम की आवाज हूँ, हाँ मै ही इन्काब हूँ,

           ―  अश्विनी यादव

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

तुम होती तो ऐसा होता

बडा गुमनाम हो गया हूँ बिछड़ कर तुमसे,
हर सुबह का मंजर क्या कहूँ कैसा होता,
शाम सुहानी हो जाती तेरा साथ पाकर के,
तुम होती तो ऐसा होता क्या कहूँ कैसा होता,//

ठंडी आने वाली होती जब जब भी,
तुम्हारे हाथ में ऊन का गोला होता,
हम चाय की चुस्की लेते पास बैठ के,
बगल में गर्म अलाव का शोला होता,
हम टहलते कोहरे में बातें करते करते,
हर लम्हा क्या कहूँ की कैसा होता,
सर्दियाँ इंतजार करवाती हमसे,
तुम होती तो ऐसा होता-वैसा होता,//

गर्मी के दिनों हम छत पर होते,
मै चाँद निहारता तो तुम्हे तराशता,
हाथ-हाथ ले और तुम्हारी बातों में,
मै खोता जाता और तुमको पाता,
भरी दोपहरी में तुम लस्सी बनाती,
तरबूज काटते क्या सोचूं कैसा होता,
धूप में छाँव चहूँ ओर हरियाली होती,
तुम होती तो ऐसा होता-वैसा होता,//

बारिशों में तुम्हारे हाथ के पकौड़े,
तीखी चटनी और करारी काफ़ी होती,
उस रिमझिम में भीगते खेल खेल में,
जरा मै सम्हलता तुम बहकती होती,
न जाने कब में दोनों को सर्दी होती,
काढ़ा बनाते क्या जानू कि कैसा होता,
बड़ी तसल्ली से रूह तक भिगो देता,
तुम होती तो ऐसा होता-वैसा होता,//

पतझड़ में बिखरी पत्तियाँ तुम्हारा,
इंतजार करती कुछ बेकरार होती,
पैरों से लिपटने आस-पास उड़ने को,
शाखों से भी वो तकरार कर लेती,
बागों का सरीखा मौसम ऐसा होता,
तुम होती तो ऐसा होता-वैसा होता,//

         ― अश्विनी यादव