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बुधवार, 27 सितंबर 2023

नज़्म ~ जब ख़्वाब हक़ीक़त हो जाये

तुम्हें मुस्कुराना आता है
यानी मेरी आँखें चमकेंगीं
तुम्हें गले लगाना आता है
यानी मेरे ग़म बंट जाएंगें
तुम बात समझती हो सारी
सो मुझको सुकूँ मिल पायेगा
तुम सूरत में भी सीरत में भी
मेरे ख़्वाबों के जैसे हो
होंठ तुम्हारे सुर्ख गुलाबी
और आँखें हैं कजरारी सी
चूम लूँ मैं और खो जाऊँ
ये भी तो इक हसरत है
सबसे अव्वल ये कहना है
झुमके तुम पर जँचते हैं
साड़ी बिंदी हँसता चेहरा
बस इतनी तमन्ना है मेरी
हुस्न तुम्हारा सोने जैसा
आँखें हीरे जैसी हैं
हर इक नक्श तराशा यूँ है
जैसे नदी मुड़े कोई
इक दिन ये सारा कुछ भी
मेरे नाम करोगी तुम
हाए, ये भी तो इक दुनिया है
और उस में तुम अधिकारी हो।

सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल

तुम्हारे दिल में भी तूफ़ाँ उठा है
हमें भी प्यार तुमसे हो चला है

किसी अय्यार जैसे हो गए हो
तुम्हारा नाम मुझको रट गया है

तुम्हारी बात भी अब टालने में
मुझे अब ख़ुद से लड़ना पड़ रहा है

अजब सी कश्मकश है ज़िन्दगी में
कि मेरा मैं ही मुझसे जा रहा है

अभी तक मैं यहाँ पर सो रहा हूँ
मगर पिंजड़े का पंछी उड़ गया है

     ~ अश्विनी यादव

रविवार, 21 अक्टूबर 2018

मुहब्बत हासिल नही की जाती

हासिल करने के नाम पर सिर्फ़ ज़िस्म किया जा सकता है, रूह मुहब्बत में पाई जाती है। और मुहब्बत वो है जिसमें अपने महबूब की मात्र एक झलक पाने के लिए लाख जतन करने को मजबूर कर दे। उसका दीदार आपके दिल को तर कर दे.....वो है मुहब्बत।

     लोग कहते हैं कि ये सब तकियानूसी बातें हैं हक़ीक़त में इन सब से राब्ता होना मुश्किल है...लेकिन जाने क्यूँ आज़ भी मुझे ऐसी आशिकी पसन्द है, और मेरा विश्वास है।   काफ़ी हद तक मैंने लोंगों को देखा है कि "दो ज़िस्म अपनी आग देते हुए एक दूसरे को बर्फ़ कर देते हैं,, बस कुछ दिन बाद उन चलते फिरते दिलों की जगह कोई बुत ले लेता है क्योंकि वो दोनों एक दूसरे को छोड़ आगे बढ़ जाते हैं......
   लेकिन मैं उन दिलों में से हूँ जो बुत तो बनते हैं लेकिन उस संगदिल के इंतजार में, जिस जगह पर उसने छोड़ दिया था।  ज़िस्म तो उसकी रज़ामन्दी पर इजहार-ए-इश्क मात्र होता है, वाक़ई में अपने हमकदम को महसूस करना हो तो ज़िस्म से पहले रूह तक उतरने की कोशिश होनी चाहिए...।
उसकी बोलती आँखों से दर्द, चेहरे के खिलेपन से ख़ुशी, और ख़ामुशी से उलझन को महसूस करना, ख़ुद बेपरवाह होते हुए भी उसका ख़याल रखना ही मुहब्बत है......।
वो आपकी विस्मृता होकर भी आपके साथ रहेगी, आपको याद रहेगी।

_________________
    अश्विनी यादव

रविवार, 7 जनवरी 2018

एक छाता और थोड़ी बारिश

शुरू कहाँ से करूँ
मैं ये छोटी सी कहानी
वो-मैं साथ ही थे
और थोड़ी सी जवानी,
बस मैं तकता रहा
आ जाये अब आ जाये
थोड़ी सी बारिश
औ क़िस्मत जगा जाये,
आसमां में घटाएं
जरा सा ही रहम कर दें
कुछ बूंदे बरसे औ
हमें इक छाते में कर दें,
बस इत्ती सी ही
इक ही तो ख़्वाहिश है
आज वो पास है
यूँ फुंकी की नुमाइश है,
जरा बरस देगा
तेरा क्या चला जाएगा
सोच इस लम्हें में
सदियों आराम आएगा,
      
      ― अश्विनी यादव​​

बुधवार, 3 जनवरी 2018

ये वादा रहा तुमसे

हम ये वादा नहीं करते,
तुझे जमाने की सारी खुशियां देंगे,
पर ये वादा है तुमसे,
अपने हिस्से की सारी खुशियां देंगें,

मंजिल दूर होगी गम नही,
साथ रहो सारी दूरी तय कर लेंगें,
लड़ना हुआ जहां से भी,
तुम्हारा हाथ पकड़ ये भी कर लेंगें,

पर वादा है तुमसे.............।।

हर साज़िश हर दर्द हमसे,
होकर ही गुजरेगा ये वादा रहा,
प्यार न बदलेगा कसम से,
हर दिन ही बढेगा ये वादा रहा,

आंसू न मिल पायेगा तुमसे,
ऐ सनम हम ऐसा जतन कर देंगें,
पर यह वादा रहा तुमसे,
अपने हिस्से की सारी खुशियां देंगे,

पर ये वादा रहा तुमसे.........।।

     ― गुड्डू यादव

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

काश की तुम मिलने आती

कोहरे की पहरेदारी थी
काश की तुम मिलने आती,

सर्द रातों की दुश्वारी थी
काश की तुम समझ पाती,

भेज ही देती किसी तरह
यादों का गर्म बिछौना तुम,

प्रेम पाश के कम्बल को
ओढ़ा दी होती मुझपर तुम,

दिन चमकना भूल गया है
क्या इसकी भी साझेदारी थी,

काश की तुम मिलने आती
फिर कोहरे की पहरेदारी थी,

शिकायत भी न है कोई
गिला न हमसे रखना तुम,

हवाओ से कहा अकेले में
वो मुझसे कभी कहना तुम,

इन सड़कों पे दीद मेरी ये
ढूंढ रहीं हैं इक पहचाने को,

वो रस्ते बदल रहा देखो
अरे मिले न मुझ दीवाने को,

कतरा कतरा रात कटी
फ़ना होने की जिम्मेवारी थी,

कोहरे की पहरेदारी थी
काश की तुम मिलने आती,

( पंक्तियाँ :― अश्विनी यादव )


रविवार, 13 अगस्त 2017

कहते है तुम मेरे हो

यह एहसास ही कितना प्यारा है,
जब सब कहते हैं तुम मेरे हो।
उनसे पूछो कि क्यों कहते हैं,
हम तेरे हैं, तुम मेरे हो,
बेशक यह सच नहीं है फिर भी,
सब के सब तो झूठे होंगे नहीं,
कोई साजिश कर हमें बदनाम करें,
इतने याद भी रुठे होंगे नहीं,
भूले से भी कभी न नाम लिया,
ना ही गजलों में गया है,
तुम खामोश रहे न वाह किया,
ना ही आह लबों पर आया है,
बेचैन बहुत हूं क्या बोलूं,
आखिर सब को कैसे खबर हुई,
वो बुत बनकर हैं आज मिले,
जिनसे ये यह बात न सबर हुई,

        ― अश्विनी यादव

बुधवार, 2 अगस्त 2017

सब तुम्हारी कारस्तानी है

आखिर बात क्या है जरा बता दो न तुम,
नई बाग लगी है शहर में या आये हो तुम,
आखिर बात क्या.......

इतनी जमालियत हमने पहले देखी नहीं,
चांद पूरा है की चांदी में नहा आये हो तुम,
आखिर बात क्या.......

कोई पता तो करो ये शज़र ठहरा है क्यूं,
यकीं है महफ़िल में मुस्कुरा आये हो तुम,
आखिर बात क्या.......

जिस डगर पे गया करीब-ए-मर ही दिखे,
उस शहर में बेपर्दा घूम कर आये हो तुम,
आखिर बात क्या......

पुजारी मन्दिर नहीं मियां मस्ज़िद न गया,
जब से उनके हाल पूंछ कर आये हो तुम,
आखिर बात क्या......

            ― अश्विनी यादव