कोई भी दीवार
नहीं रोक सकती
प्रेम, परिंदे, गीत
कोई भी युद्ध
नहीं ला सकता
शांति, सुकूँ, मुस्कान
हम ज़्यादा से ज़्यादा
बात करें
और प्रेम करें
तब यक़ीनन सदियों तक
कोई युद्ध नहीं होंगे।
~ अश्विनी यादव
हमें प्रयास करते रहना चाहिए ज्ञान और प्रेम बाँटने का, जिससे एक सभ्य समाज का निर्माण किया जा सके।
कोई भी दीवार
नहीं रोक सकती
प्रेम, परिंदे, गीत
कोई भी युद्ध
नहीं ला सकता
शांति, सुकूँ, मुस्कान
हम ज़्यादा से ज़्यादा
बात करें
और प्रेम करें
तब यक़ीनन सदियों तक
कोई युद्ध नहीं होंगे।
~ अश्विनी यादव
वो दिन भी जल्दी आएगा
हम इंतज़ार में हैं
इंतज़ार में हैं
हाँ उस दिन भी हम बोलेंगें
हम लड़कर सज़ा दिलवाएंगें
हिसाब हमारा बाक़ी है
हम बेकरार से हैं
इंतज़ार में हैं
आवाज उठेगी हक़ की जब
हर ज़िन्दा बुत से पूछेंगें
क्यों होने दिया ये ज़ुल्मों सितम
हम गुस्से के इज़हार में हैं
हम इंतज़ार में हैं
हर इक तमाशा ये जो है
किसने तराशा है इसको
हर उसका नक़ाब उतरेगा
ज़ब्त-ए-नफ़रत-ओ-दीवार में हैं
हम इंतज़ार में हैं
~ अश्विनी यादव
वैसे तो ये कहना ग़लत ही होगा
लेकिन फिर भी यक़ीन करना
हम दोनों की तकदीरों में
नहीं लिखा इस जनम में मिलना...
बहुत जतन कर चुका हूँ मैं भी
बहुत जतन कर चुकी हो तुम भी
हम दोनों से ख़फ़ा है दुनिया
सच से एकदम जुदा है दुनिया
इस दुनिया को नहीं पता है
क्या मुहब्बत, क्या चाहत है ?
हम दोनों को बतलाना था
सबको मुहब्बत तक लाना था
लेकिन ये होने से रहा अब
तुम भी सब कुछ भूल ही जाना
मत बतलाना किसी को कुछ भी
हम भी ऐसे जीते रहेंगें
दिल की कोई बात न सुनना
हरदम हँसकर बातें करना
हम दोनों को ख़ुश रहना है
मिलो कभी तो ध्यान रखना..
हम दोनों की तक़दीरों में
नहीं लिखा इस जनम में मिलना....
_________________
अश्विनी यादव
देखिये कैसे गिनाई जा रही लाशें हमारी,
आज पानी में बहाई जा रही लाशें हमारी,
अब नहीं सुनता है कोई रो लें कितना चीख़ लें हम,
चील कौवों को खिलाई जा रही लाशें हमारी,
वो कि ज़िम्मेदार आदम सो रहा है जागकर भी,
सच कहो तो बस लुटाई जा रही लाशें हमारी,
मन की बातें कर रहें हैं आज कल सुनते नहीं हैं,
जग हँसाई में दिखाई जा रही लाशें हमारी,
मर रहें हैं लोग साहब अब तो गद्दी छोड़ दो तुम,
तेरे महलों में दबाई जा रही लाशें हमारी,
___________________
अश्विनी यादव
_________________
जिस दिन कोई आगे बढ़कर आएगा,
तेरे मन में ख़ुद से ही डर आएगा,
तूने ये सब पहले से ही लिक्खा है,
जो आएगा लाश पे चढ़कर आएगा,
अंदर वाले अपने बाहर जाएगें,
बाहर वाला काफ़िर अंदर आएगा,
वो हँसकर सीने से लगाएगा पहले,
उसके बाद पुराना ख़ंजर आएगा,
आख़िर किसको जन्नत मिलने वाली है,
पहले इक वीराना मंजर आएगा,
सबसे पहले तुम अपना कागज लाओ,
उसके बाद हमारा नम्बर आएगा,
इक दिन संसद नाम तिरे हो जाएगा,
मेरे हिस्से जंतर -मंतर आएगा,
___________________
@अश्विनी यादव
आख़िर तू क्या कर लेगा अब,
कितने दिन बन्द रखेगा अब ,
कैद किया वो हर इक पंछी,
लेकर के जाल उड़ेगा अब,
एक न इक दिन तेरा फेंका,
पत्थर ही माथ लगेगा अब,
हम इस जंगल से परिचित हैं,
वीराना हमसे डरेगा अब,
कल शहर भरा था बातों से,
हाकिम भी ज़ुल्म करेगा अब,
हमको लड़वा कर बाँट दिया,
यानी कुछ भी न बचेगा अब,
_________________
अश्विनी यादव
यूँ ज़हर सदा उगलेगा क्या..?
अब राह नही बदलेगा क्या..?
गिरने से पहले जनता का,
तू हाथ कभी पकड़ेगा क्या..?
तू बनता है मज़लूम सदा,
सो दर्द मिरा समझेगा क्या..?
तुझसे कोई उम्मीद नही,
तू झूठा है झूठों का क्या..?
जब तू इंसान नहीं है तब,
डर ईश्वर का रक्खेगा क्या..?
चन्दन वन से इस भारत को,
तू विषधर है छोड़ेगा क्या..?
वादा झूठा, बातें झूठी,
गंगा की लाज रखेगा क्या..?
रोहित और नज़ीब कहाँ हैं ?
चीख़- पुकार सुनेगा क्या,
हिन्दू -हिन्दू रटता है तू,
कमलेश के घर पे कहेगा क्या..?
भात बिना इक मरती बिटिया,
लाशों से देश बनेगा क्या..?
तुझको क्या लगता है ज़ालिम,
सदियों तक राज चलेगा क्या..?
देश बँटा है लोग बँटे हैं,
पागलपन ही चाहेगा क्या..?
तू दुनिया से ऊपर का है,
सब लम्बी ही फेंकेगा क्या..?
इक दिन मोहब्बत का पौधा,
बाग-ए-नफ़रत में उगेगा क्या..?
_______________
अश्विनी यादव
एक कुँआ था
सड़क के इस पार
एक बस्ती थी
सड़क के उस पार
कुँआ पक्का था
सड़क कच्ची थी
बस्ती में हंसी-ख़ुशी
दोनों बहुत सस्ती थी
कुँआ और बस्ती दोनों
इक-दूजे के साथी थे
पर कब तलक
ऐसा समर्पण रहता
एक दिन कुँआ
ख़ा गया आधी बस्ती को
सड़क के उस पार
लाशों पर गिरते आँसू
चीख़ों का मातम
लाचारी, बेबसी फ़ैली थी
सड़क के इस पर
कुँआ जाने क्यूँ चुप था
बेहाल रोने वालों को
किसी ने पानी पिला दिया
कुछ चीख़ें कम हो गयी
कुछ लाशें और बढ़ गयी
तब ये बात उठी
शायद कुँए में ज़हर है
इत्तला करने से पहले
थाने से आए कुछ लोग
सुनी -सुनाई कुछ भी नही
बस बचऊ को घसीट ले गए
शायद वो आये थे इसीलिए
बस्ती की आवाज़ ले जाने
बचऊ को दोषी कहा
जीभ पर लात रखकर मारा
ताकि कोई आवाज़
फिर उठ न सके
कोई "जमींदार" के ख़िलाफ़
कुछ कह न सके
अच्छा! ये माज़रा था सब
कुछ दिन पहले ही जब
जमींदार के लड़के ने
बस्ती की बच्ची नोंची थी
इन ठण्डे ख़ून वालों ने
कुछ दो चार थप्पड़ मारे थे
आज़ उसी का नतीज़ा है
लाशें, आँसू, लात, लाठी,
मातम के साथ वापस हुआ
अब इसका बदला भी
ले पाना ही मुश्किल है
ख़ून ठंडा था, है और रहेगा
काश! कोई उठ पाता
इतनी हिम्मत लेकर
छाती चीर देता जमींदार की
और लिख देता
"गर्म ख़ून की कहानी,,
पुलिस लाठी मार रही
ज़हर से ज़मीदार
बस्ती श्मसान हो गयी
सोती है सरकार....।।
― अश्विनी यादव
( घर के बच्चों के लिए दुआएँ )
नज़्म
_______________
ओ मेरी नन्ही हथेली
तुम मेरी उँगली पकड़ो
कोशिश करो चलने की
अपने कदम आधे कर लूँगा
लेकिन तुम्हारे साथ चलूँगा
तुम बिना भय के चलो
मैं तुम्हें सम्हाल लूँगा
तुम्हारे छोटे छोटे होंठ
जब मुझे बुलाते हैं
बड़े प्यार से
सच कहूँ तो लगता है
ज़िन्दगी बस यहीं रुकी रहे
हम साथ चलते रहें
तुम बोलो बिना रुके
मैं सुनता रहूँ, बस सुनता रहूँ....
_______________
अश्विनी यादव
___________
वो इक चेहरा था जो
वो जो नाम था उसका
हाँ सब याद है मुझको
कुछ भूला नही हूँ मैं
तब हर शख़्स अच्छा था
जो हमशक़्ल थे तेरे
जो हमनाम थे तेरे
यार तमाम लोग मुझे
अब पसन्द नही बिल्कुल
जिनसे शक़्ल मिलती है
या आवाज़ मिलती है
जिनके नाम तुझ से है
नफरत है मुझे सबसे
जिन्हें प्यार करता था
जिनकी बात करता था
नफरत है मुझे सबसे...
नफरत है मुझे तुमसे...
____________
अश्विनी यादव
इश्क़ में ख़ुद को ज़रा झूठा किया,
तुम नही मानी तभी रूठा किया,
यार ये यारी भला है कौन सी,
दूर से मरता हुआ देखा किया,
जो कबूतर शहर के क़ाबिल न थे,
भेजकर जंगल बहुत अच्छा किया,
नोंचकर फेंको मुझे पागल करो,
और कह दो इश्क में धोखा किया,
पंख पाकर याद रखनी थी ज़मीं,
नींद में भी इक तुझे सोचा किया,
एक चाहत थी मुझे इज़हार की,
हर गली जाकर तभी पीछा किया,
वो अभी कल रात को बेवा हुई,
सुब्ह सबने जिस्म पर दावा किया,
इक क़फ़स में कैद थी राहत मिरी,
रूह ख़ातिर साँस का सौदा किया,
तालियाँ बजती रहीं कुछ देर तक,
आख़िरी के सीन में ऐसा किया,
__________________
अश्विनी यादव
नज़्म
___________
हम लड़के भी न
कहीं पर रह लेते हैं
कुछ भी सुन लेते हैं
कुछ भी सह लेते हैं
हम लड़के भी न....
लड़कियाँ एक से दूसरे
घर को तो जाती हैं
लेकिन लड़के बाहर
किराए पर जीते हैं,
कभी -कभी थके हों तो
भूखे ही सो जाते हैं,
हम लड़के भी न....
घर पर जैसे ही
ज़रूरतों की बारिश होती है
तो हम लड़के ही
टीन शेड की तरह
छप्पर बना दिए जाते हैं
इन सबसे उबरने को
तरसा दिए जाते हैं,
हम लड़के भी न....
जब मन था आईएएस का
तो इंजीनियरिंग किया
पापा के कहने पर ही
नौकरी भी किया
लेकिन फिर नकारा कहकर
दुत्कार दिए जाते हैं
हम लड़के भी न....
उनके मन का ही पढ़ा
उनके मन का ही जिया
उन्होंने जब जो कहा
सब चुपचाप ही किया
ईज़्ज़त की बात थी सो
मुहब्बत भी मार दिया
जो उन्हें पसन्द थी
उसे ही स्वीकार लिया,
उनकी ख़ुशियों की ख़ातिर
हम क्या कर जाते हैं,
हम लड़के भी न....
रोज़ ही मरते हैं
रोज़ जी जाते हैं
डाँट खाते खाते
हम बड़े हो जाते हैं
लड़कियाँ चांदी सी
हम लोहे हो जाते हैं
हम लड़के भी न
बस ऐसे रह जाते हैं....
_______________
अश्विनी यादव
नज़्म
______________
उसे तुम कहूँ
या आप से शुरुआत करूँ
पता नही क्या अच्छा लगे
मैं कल से बस
फ़िक्र में हूँ
उसके कानों से लटकती बाली
जिसको उसकी आंवारा ज़ुल्फ़ें
बार बार चूम रही थीं
वो कल से मुझे
बेतहाशा याद आ रही हैं
गर्दन की ढाल से पहले तक
आँख से लेकर कान तक
हर तरफ ज़ुल्फ़ों का ही
पहरा है
जो मेरी नज़रों को
रोकती हैं उसे
चूम लेने से....…
फिर भी मैं
महसूस करता हूँ
चूम लेता हूँ......
वो जो इक तिल है न
उसी से मज़बूर हूँ
कि देखता रहूँ
अपनी आँख जाने तक
तुम से दूर जाने तक
_________________
अश्विनी यादव
यही वो वक्त है
ज़िन्दा होने का एहसास करो
अगर हाथ है तो
उठाने का प्रयत्न करो
कलम में स्याही नही
बारूद भरो
बेशक तुम्हारा ख़ून बहेगा
लेकिन नस्लें महफूज़ रहेंगीं..…
अगर पाँव है तो
दौड़कर आगे बढ़ो
ज़ुल्म के मुँह तमाचा जड़ने
जो कर सकते हो
करने की कोशिश करो
नही तो किसी रोज़
औरों की तरह
वो तुम्हें भी खा जाएगा
फिर तुम्हारी कायरता
नई नस्ल में भी उतर जाएगी....
ये भूख तुम्हारी है
ये मिट्टी भी तुम्हारी है
छिली हुई पीठ, घिठ्ठे वाले हाथ
सब कुछ तुम्हारा है
ये तय है कि ऐसे ही
मरना है तुम्हें
तो क्यूँ न लड़कर मरा जाए
बचेंगें तो भी हम ही
नही तो हमारे अपने बचेंगें.....
जी चाहे सब प्यार लुटा दूँ
जान तुम्हारे बड्डे पर,
ख़ुशियों का संसार मैं ला दूँ
जान तुम्हारे बड्डे पर,
हाथी, घोड़ा, गुड्डा, गुड़िया
जान तुम्हारे बड्डे पर,
तू कह दे तो चाँद भी ला दूँ
जान तुम्हारे बड्डे पर,
तुमको अपनी आँख बना लूँ
जान तुम्हारे बड्डे पर,
और मैं सारे नाज़ उठा लूँ
जान तुम्हारे बड्डे पर,
अगली बार तेरी चाची होगी
जान तुम्हारे बड्डे पर,
वो श्रृंगार करेगी हजार मिरी
जान तुम्हारे बड्डे पर,
भतीजी भूमि को दूसरे जन्मोत्सव पर शुभाशीष के साथ ढ़ेर सारा प्यार, मेरी जान तुम ऐसे ही मुस्कुराती रहो हंसती रहो ख़ुश रहो।
_________________
अश्विनी यादव
अज़ब होता कि तुम आती हमारे घर,
ग़ज़ब होता हमें पाती हमारे घर,
किवाड़े से ज़रा सा झाँक लेती तुम,
हमें ही देख शर्माती हमारे घर,
हमारे पूछने पर भी मना करती,
छुपाके चाय पे आती हमारे घर,
निगाहों के सहारे रोज़ तुम अपने,
सभी पैग़ाम भिजवाती हमारे घर,
कभी चीनी कभी आती नमक लेने,
वो पायल और छनकाती हमारे घर,
__________________
अश्विनी यादव
तुम कैनवास लेकर बैठो
मैं तुम्हारे इर्द-गिर्द
खोया खोया सा मिलूँगा
अपनी सांसों में भिगोकर
चाहतों के रंग से
इक तस्वीर बना देना
जिसमें मेरी मुहब्बत
तुम्हारे लिए पागलपन
और हमारी कहानी
झलकती हो
हाँ जान बना देना...
― अश्विनी यादव
दो बहुत बड़े शाइरों के बड़े शानदार शे'र जो आज के लिए है.......
वो दर्द भरी चीख़ मैं भूला नहीं अब तक,
कहता था कोई बुत मुझे पत्थर से निकालो,
_____________
भारत भूषण पन्त
इश्क़ महज़ दो लोगों में हो जाता 'है'
बीच में लेकिन पूरी दुनिया होती 'है'
عشق محض دو لوگوں میں ہو جاتا ہے
بیچ میں لیکن پوری دنیا ہوتی ہے
___________
फ़ैयाज़ فیاض
एक दफ़ा तो ऐसा लगा की साँस ही रुक जाएगी,
दिल में अदबो―ख़ुशी इससे कम न होनी चाहिए,
लबों की कंपकंपी से लगा जीभ ही कट जाएगी,
ये प्यार का बरसात कभी खतम न होनी चाहिए,
बादल से आसमां में लगा चांदनी भी छुप जाएगी,
बस फिजाओं में अना कभी कम न होनी चाहिए,
ख़जाना लूटने में लगा की उमर ही लग जाएगी,
ऐ ख़ुदा कोहिनूरे-चमक भी कम न होनी चाहिए,
......मैं जब से जुड़ा बस पढ़ता रहा हूँ और इतना सीख रहा हूँ की कदमों के निशाँ मिटने न पाये इससे पहले ही उस पथ पर अग्रसर हो जाया जाये....
बैंक जैसी जोड़-गुणा-गणित वाली जगह से मैनेजर रहते हुए शायरी करना वाकई बहुत ही अलग अंदाज रहा है.....कई किताबें, ढेर सारे सम्मान, अवार्ड....और हल्की सी वो सफ़ेद दाढ़ी। गोल्डन चश्मा, बिल्कुल सफ़ेद कुर्ता-पैजामा.....समझाते हुए वो आवाज.....जो मुझे टोंक नही रही थी और अपनी बात भी कर रही थी। ये दादा श्री भारत भूषण पंत जी की आवाज है....ये सलीका उन्ही पर जंच रहा था।
मैनें एक पत्रकार की तरह दादा से सब पूंछा....एक बच्चे की उत्सुकतावश अपने लिए सारी बात की....साहित्य के बारे में जानकारी ली...अपने कैरियर के बारे में सलाह ली हमने। अपने नये कार्यों के शुभारम्भ के लिए आशीर्वाद भी बटोर लिया।
बेहद शालीन शांत सौम्य व्यक्तित्व के धनी इस दौर के बेहतरीन शायरों में से एक श्री भरत भूषण जी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.....मैं अश्विनी, और साथ में भाई निलेश शर्मा जी "मि0 इरिटेटिंग" को सुअवसर मिला।
हम दोनों की ये कई दिनों से ये लालसा थी की इस छत्ते से शहद निकाल लिया जाये.....यकीन मानिये हम और भी
''शहद चुरा लेते आपके मधुकोष से,
पर व्यस्तता की मक्खी का डंक लग गया,,
बेवसाइट विस्मृता 'vismtrita' के लिए मार्गदर्शन और शुभाशीष भी लिया,
― अश्विनी यादव
मेरे एहसास जब भी कभी
लफ़्ज का लिबास ओढ़े
यहाँ वहां की बातों को
दौड़ती भागती सी सड़के
और रुकी हुई सी भीड़
ठंडी सी आग की लपटें
और झुलसाते हुए बर्फों को
आवाज देती है, तो
वहीं से कविता होती है,,,,,
किलकारी नवजात की
या रोते हुए परिवार
हंसते हुए पागलों से
मौन लिए संतो को
पिघलते पहाड़ों से
बरसते बादल की फुहारों से
चीरती रात के सन्नाटो को
आवाज आती है, तो
वहीं से कविता होती है,,,,
कविता कलम की बोल है
कविता समाज की खोल है
अंगार, आगाज औ इश्क
कविता इंकलाब की बोल है
कविता है तो जोश है
संघर्ष का अंजाम है
कविता आजादी का नाम है
कविता है तो हम है
और हमसे जुड़े जज्बातों की
बगावत होती है, तो
वहीं कविता होती है.....
वहीं कविता होती है......।।
― अश्विनी यादव