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सोमवार, 24 मई 2021

नज़्म

वैसे तो ये कहना ग़लत ही होगा
लेकिन फिर भी यक़ीन करना
हम दोनों की तकदीरों में
नहीं लिखा इस जनम में मिलना...

बहुत जतन कर चुका हूँ मैं भी
बहुत जतन कर चुकी हो तुम भी
हम दोनों से ख़फ़ा है दुनिया
सच से एकदम जुदा है दुनिया
इस दुनिया को नहीं पता है
क्या मुहब्बत, क्या चाहत है ?

हम दोनों को बतलाना था
सबको मुहब्बत तक लाना था
लेकिन ये होने से रहा अब
तुम भी सब कुछ भूल ही जाना
मत बतलाना किसी को कुछ भी
हम भी ऐसे जीते रहेंगें
दिल की कोई बात न सुनना
हरदम हँसकर बातें करना

हम दोनों को ख़ुश रहना है
मिलो कभी तो ध्यान रखना..
हम दोनों की तक़दीरों में
नहीं लिखा इस जनम में मिलना....
_________________
अश्विनी यादव

शुक्रवार, 14 मई 2021

ग़ज़ल

सोच रहे हैं मदद को निकलें लेकिन उनका भी डर है
इस डर से मर जाने दें ? हद है क्या इतना भी डर है

डर डर कर जीने से अच्छा लड़कर ही मर जाएं हम
बेसुध, सहमा, पागल, बंदी ऐसे रहना भी डर है

घर में सर दीवारों से टकराने से क्या हासिल है
खिड़की खोलो बाहर जाओ घर में छिपना भी डर है

बन्दूकों से सत्ता हासिल कर सकते हो तुम लेकिन
रोज़ कोई आवाज दबाना चीख़ दबाना भी डर है

चारासाज़ों के मरने पर बागी लोग बढ़ेंगे ही
उजलत में यूँ जेल बनाना, टैक्स बढ़ाना भी डर है
_____________________
अश्विनी यादव

बुधवार, 12 मई 2021

ग़ज़ल

देखिये कैसे गिनाई जा रही लाशें हमारी,
आज पानी में बहाई जा रही लाशें हमारी,

अब नहीं सुनता है कोई रो लें कितना चीख़ लें हम,
चील कौवों को खिलाई जा रही लाशें हमारी,

वो कि ज़िम्मेदार आदम सो रहा है जागकर भी,
सच कहो तो बस लुटाई जा रही लाशें हमारी,

मन की बातें कर रहें हैं आज कल सुनते नहीं हैं,
जग हँसाई में दिखाई जा रही लाशें हमारी,

मर रहें हैं लोग साहब अब तो गद्दी छोड़ दो तुम,
तेरे महलों में दबाई जा रही लाशें हमारी,
___________________
    अश्विनी यादव

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

नज़्म

तुम्हारा चेहरा ही बदला है
मेरी आँखें वही हैं
अब न तुम अच्छी लगती हो
न ही तुम्हारी आँखें
तुम्हारी ही आवाज बदली है
मेरे कान वही हैं
अब न तुम्हें सुनना अच्छा है
न ही तुम्हारी बातें
कुल मिलाकर ये समझो
मैं वैसा ही हूँ
लेकिन अब न तुम अच्छी हो
न ही तुम्हारा साथ।
___________________
  अश्विनी यादव

मंगलवार, 31 मार्च 2020

ग़ज़ल

वो मंजिल दूर लगती जा रही है,
भले गाड़ी ये चलती जा रही है,

हँसा हूँ जोर से लज़्ज़त-ए-ग़म पर,
मिरी उम्मीद बढ़ती जा रही है,

किसी की भूख बढ़ती देखकर ही,
हमारी आँख मुँदती जा रही है,

मिरे आगे ये दुनिया रो रही है,
मिरी भी उम्र घटती जा रही है।

अभी तक मौत से झगड़ा रहा है,
वही महबूब बनती जा रही है ।

जहाँ सारा यहीं श्मशान होगा,
ये जो तलवार खिंचती जा रही है।

कि खाली हाथ से मैं क्या करूँगा,
ये ही मुझको खटकती जा रही है,

सभी त्यौहार अब मातम लगेंगें,
नई दीवार बनती जा रही है,

कहो तो क़ब्र मेरी खोद आएँ,
मिरी भी नब्ज़ रुकती जा रही है.....
____________________
 
   अश्विनी यादव

बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल

ज़ुल्म के नाख़ून पैने हो गए हैं,
यार अब तो जान की बाज़ी लगी है,

चुन रहें हैं बलि दिया जाए कहाँ पर,
और अब सरकार भी राजी लगी है,

हम भला आदम समझ बैठे थे जिसको,
जात भी उसकी वहीं दागी लगी है,
____________________
  अश्विनी यादव​​ 

शनिवार, 21 सितंबर 2019

ग़ज़ल

सब कहते हैं ऐसा होता आया है
यार कहानी में राँझा भी मरता है

हीर कहाँ बचने वाली ही थी पहले
दर्द भरा इतिहास हमारा कहता है

उस पत्थर को आख़िर कैसे बतलाऊँ
इक दरिया मेरी आँखों में रहता है

दिल के अरमां टुकड़ों में बँट जाते हैं
तब जाकर आँसू का रस्ता बनता है

दुनिया कहती ज़िन्दा रहते मौत जिसे
हम भी देखें इसमें क्या -क्या दुखता है

चाहत, राहत, धोखा, मातम, बेचैनी
मेरे हिस्से में आख़िर क्या मिलता है

हुस्न भला क्या चीज़ मुहब्बत के आगे
दिन बदले तो ये भी रोज़ बदलता है

__________________
  अश्विनी यादव

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

नज़्म

___________
वो इक चेहरा था जो
वो जो नाम था उसका
हाँ सब याद है मुझको
कुछ भूला नही हूँ मैं
तब हर शख़्स अच्छा था
जो हमशक़्ल थे तेरे
जो हमनाम थे तेरे
यार तमाम लोग मुझे
अब पसन्द नही बिल्कुल
जिनसे शक़्ल मिलती है
या आवाज़ मिलती है
जिनके नाम तुझ से है
नफरत है मुझे सबसे
जिन्हें प्यार करता था
जिनकी बात करता था
नफरत है मुझे सबसे...
नफरत है मुझे तुमसे...
____________
अश्विनी यादव

सोमवार, 4 जून 2018

नज़्म ( हम बैठे है )

रेलगाड़ी के गुजरने से
वो पुल थरथराने लगा
जिसके नीचे 'हम' बैठे हैं,

गंगा का पानी भी न
अठखेलियां करने लगा
इसके बगल 'हम' बैठें हैं,

उसकी उंगलियां बेझिझक
मेंरी उँगलियों से लिपटी हैं
इतने पास 'हम' बैठें हैं,

रेत से हो पानी चूमता हुआ
झोंका हवा का झूमने लगा
ऐसे होश खोकर 'हम' बैठें हैं,

उसका सर मेरे कांधे पे
पूरा का पूरा टिकने लगा
रुकती सांस लिए 'हम' बैठें हैं,

अभी रंगीनियों में डूबे थे
याद आया समाज हमको
जिससे छुप के यहां 'हम' बैठें हैं,

जाने कैसी जाति की लाज की
ये बेंडियां बनाई गई हैं
जिनसे डरकर आज 'हम' बैठें हैं,

वो जिसके साथ जीना मरना है
उसको चुन लेना भी गुनाह है
ऐसी इंसानियत लिये 'हम' बैठे हैं,

खाप का है फैसला मार देंगें
हमारी भी ज़िद है जी लेंगें
ये एहसास में डूबे 'हम' बैठे हैं,

एक दफा जी करता है मर जाये
सदियों की बेड़ियों कैसे तोड़ेंगें
इश्क़-खौफ़ द्वंद में 'हम' बैठें है,

बुधवार, 23 मई 2018

दो शाइर

दो बहुत बड़े शाइरों के बड़े शानदार शे'र जो आज के लिए है.......

वो दर्द भरी   चीख़  मैं भूला नहीं अब तक,
कहता था कोई बुत मुझे पत्थर से निकालो,
_____________
भारत भूषण पन्त

इश्क़ महज़ दो लोगों में हो जाता 'है'
बीच में लेकिन पूरी दुनिया होती 'है'
عشق محض دو لوگوں میں ہو جاتا ہے
بیچ میں لیکن پوری دنیا ہوتی ہے
___________
फ़ैयाज़ فیاض

शनिवार, 17 मार्च 2018

vismrita हमारे बीच में

नव रात्रि के पावन पर्व एवम हिंदू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं....अत्यंत हर्षित हूँ ये सूचित करने के लिए की हमारी 'टीम विस्मृता' की मेहनत से हमारी बेवसाइट (पोर्टल) का लगभग सारा कार्य पूरा हो चुका है.....
आपकी रचनाओं और शुभकामनाओं की प्रतीक्षा है। हमारी टीम में आपका हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन है।
           ― अश्विनी यादव
              ( टीम विस्मृता )