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शुक्रवार, 14 मई 2021

ग़ज़ल

सोच रहे हैं मदद को निकलें लेकिन उनका भी डर है
इस डर से मर जाने दें ? हद है क्या इतना भी डर है

डर डर कर जीने से अच्छा लड़कर ही मर जाएं हम
बेसुध, सहमा, पागल, बंदी ऐसे रहना भी डर है

घर में सर दीवारों से टकराने से क्या हासिल है
खिड़की खोलो बाहर जाओ घर में छिपना भी डर है

बन्दूकों से सत्ता हासिल कर सकते हो तुम लेकिन
रोज़ कोई आवाज दबाना चीख़ दबाना भी डर है

चारासाज़ों के मरने पर बागी लोग बढ़ेंगे ही
उजलत में यूँ जेल बनाना, टैक्स बढ़ाना भी डर है
_____________________
अश्विनी यादव

बुधवार, 12 मई 2021

ग़ज़ल

देखिये कैसे गिनाई जा रही लाशें हमारी,
आज पानी में बहाई जा रही लाशें हमारी,

अब नहीं सुनता है कोई रो लें कितना चीख़ लें हम,
चील कौवों को खिलाई जा रही लाशें हमारी,

वो कि ज़िम्मेदार आदम सो रहा है जागकर भी,
सच कहो तो बस लुटाई जा रही लाशें हमारी,

मन की बातें कर रहें हैं आज कल सुनते नहीं हैं,
जग हँसाई में दिखाई जा रही लाशें हमारी,

मर रहें हैं लोग साहब अब तो गद्दी छोड़ दो तुम,
तेरे महलों में दबाई जा रही लाशें हमारी,
___________________
    अश्विनी यादव

गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

ग़लती नेहरू की (कविता )

हो गई इनको दिक़्क़त भारी नेहरू से,
ये खेल रहें हैं नईकी पारी नेहरू से,

नेहरू इनका हाथ पकड़ के बैठे हैं,
वरना लेते ज़िम्मेदारी नेहरू से,

पता करो ई नेहरू कहँवा चला गया,
अरे छीन के लाओ नींद हमारी नेहरू से,

राम कसम ई आगे-पीछे नेहरू हैं,
चलत नही बा अब होशियारी नेहरू से,

झूठ, फ़रेब औ रोना-धोना कर बइठे
फ़ेल हो गयी सब मक्कारी नेहरू से,

गंगा, गोबर, गाय, दलित सब नाटक है,
तुलना कैसे होगी तुम्हारी नेहरू से,

इसका मतलब नेहरू तुमसे क़ाबिल हैं,
यानी तुमने मान ली हारी नेहरू से,

तुम भी उनकी शासन के ही पैदा हो,
कह दो ग़लती हुई है सारी नेहरू से,
___________________
    अश्विनी यादव

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

विकास पगला गया


पता तो करो कौन  बरगला गया है
सुना है कि विकास  पगला गया है
जो मंच से  खूब  गलगला गया था
वो खुद को  जादूगर  बता गया था
किसानों जवानों की बात करता था
देश न झुकने  दूंगा  दम्भ भरता था
टैक्स वाली समस्या  हल कर दूंगा
काला धन लाकर हर घर भर दूंगा
नारी सुरक्षा  का  उसका वादा था
हत्या लूट के खात्मे पर आमदा था
गाय गंगा के  हित से यूँ वास्ता था
वहीं है हिंदुत्व  जिसका रास्ता था
देश लाइन में  लगाकर  चला गया
दो दिनों बाद टेंसुएँ बहाने आ गया
कहता था चौराहे पर लटका देना
जी में आये तो सूली  पे चढ़ा देना
मेरा  क्या  झोला  वाला फकीर हूँ
उठाया चल दूंगा  इतना गम्भीर हूँ
गधे से  सीख  रहा  हूँ मुझे देखो न
सबका डीएनए जांचा मेरा देखो न
बेरोजगारों  की  चमड़ी उधेडा हूँ
बेटियों को  लाठियों से खदेड़ा हूँ
शिक्षामित्रों  की  चिता लगाया हूं
रोजगार सेवकों को लतियाया हूँ
बच्चों को जिंदा  ये दफना गया है
सुना है की विकास पगला गया है
राम मंदिर का खेला खेल गया है
लेके मोटा सा ये चंदा पेल गया है
शहीदों की बात पे हकला गया है
ई गुजराती विकास पगला गया है
देख अश्विन भी  कैसे ठगा गया है
ये भक्तों का  बप्पा  पगला गया है

......... जिस तरीके से आज भारत देश की नीतियां हैं शासन-प्रशासन है और पूरा प्रतिरूप है उसको देखते हुए ही लग रहा है कि विकास पूरी तरह से अपना संतुलन खो बैठा है। हमारी सभी सिर्फ विनती है कि इस विकास को इसकी औकात पर रखे और भविष्य में विकास को संभाल कर रखेंगे कहीं फिर से ना पगलाने पाए,,,,,,,,,,

            ― अश्विनी यादव

रविवार, 13 अगस्त 2017

आजादी सत्तर साल की

मैं भी चाहता हूं कि बोलूं मेरा भारत महान है,
हर दिल, हर कण में बसता पूरा हिंदुस्तान है,
हर एक चेहरे पे  कायम प्यारी सी मुस्कान है,
मैं भी चाहता हूं कि बोलूं मेरा भारत महान है,

लेकिन जात पात में बंटा हुआ देख रहा हूँ मैं,
एक दूजे के लहू के प्यासों को देख रहा हूँ मैं,
छोटी सी अफवाहों पे  हत्याएं देख रहा हूँ मैं,
दुःख होता है मजहब से लुटता देख रहा हूँ मै,

टैंक हमारे पास नए हर साल ले आये जाते है,
फिर क्यूं सरहद पे रोज कई शहीद हो जाते है,
सपने खूब दिखा कर सब सत्ता में आ जाते है,
वहीं देश है जहां रोज लाखों भूखे सो जाते है,

सत्तर बरस आज़ादी के उल्लास मनाये जाएंगे,
शहीदों के परिजन फिर उपेक्षित रक्खे जाएंगे,
यूँ दलाली वास्ते मासूमों की स्वांस रोके जाएंगे,
और दम्भ भर रहे है हम विश्व गुरु बन जाएंगे,

फिर पूंछ रहा हूँ क्या  गाय देश मे समान नही,
कहीं कटे बीफ़ बने,  कहीं कटे तो इंसान नही,
सत्ताधीश बतलाओ क्या दलितों में प्राण नही,
या अब्दुल हमीद में बसा हुआ हिंदुस्तान नही,

अब केवल एक विनती है पहले सा हो जाने दो,
मुस्लिम हिंदू ईसाई  को एक थाल में खाने दो,
गाय-गंगा-राम सभी को हृदय में बस जाने दो,
मिसाले-एकता मुल्क ये हिंदुस्तान बन जाने दो,

आजादी के सत्तर साल के वर्षगांठ पर देश के सभी बन्धुओ को ये सौहार्द का संदेश।

           ― अश्विनी यादव

बुधवार, 21 जून 2017

योग दिवस और भारत

योगा दिवस पे करोड़ो खर्च किया गया,,,,, कोई बात नही ऐसे तो हर सरकार कुछ न कुछ उल्टा पुल्टा करती है। लेकिन भूखे पेट वाले को इस योगा से क्या ये ओ उसके लिए ढ़कोसला मात्र है। ये तो भरे पेट, मोटी तोंद लिए उन लोंगों के लिए खास है जो एक गिलास पानी भी नही ले पाते है अपने हाथ से।
मैं योगा के खिलाफ नही हूँ, मुझे पसन्द है लेकिन जब पिछली रात को पेट भरा हो, शरीर में थकान न हो, सुबह से ही शाम के लिए पैसो के बारे में सोचना न हो तब।
वैसे मोदी जी आपके जैसे  नाटकबाज आदमी कोई नही दिखा मुझे। बात से मुकरने का कोई एक लम्बा समय होता है क्षण भर में कल्टी मार लेना बहुत निंदनीय है। आप करोड़ो खर्च किये हो दुनिया आपको देख रही है लेकिन योगासन में #फोटूवासन के लिए फ़ुटेज खा रहे हो। आपने तो हद ही कर दी। वैसे भी किसान गोली खा रहे है, कभी जहर की कभी सरकारी  बन्दूक की... और आप फ़ुटेज खा ले रहे है तो क्या हुआ।
चलो खैर छोडो मेरी तरफ से भी....
       #happy_happy_योगा_डे  
     
     ― अश्विनी यादव के विचार से )

मंगलवार, 13 जून 2017

मैं किसान हूँ

मर जाने दो, उबर जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,
फ़सली ज़ख्म भर जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

गहरा आघात हुआ था मुझे
बिटिया के डोली का,
डोली न सही अर्थी जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

ईश्वर का कहर भी क्या खूब
कभी बरसता नही,
कभी बाढ़ में घर बह जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

बैंक वाले, सूददार, औ सरकार
जरा समझते ही नही,
मौत से ही तसल्ली हो जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

    ― अश्विनी यादव

सोमवार, 20 मार्च 2017

लूट गये

राम नाम पे लूट ले गये
गाय पे हत्या जारी है,
दलितों को सब पीट गये
गंगा पूजन उधारी है,
खुद को राष्ट्रवादी कहते
सेना पे वोट बाजारी है,
अपने मर रहे रोज पर उन्हें
विदेशी जमीने प्यारी है,
दुःख नही झूठे सारे वादे थे
हाँ ये सरकार व्यापारी है,
मन्दिर मन्दिर हर बार किये,
पर समय न कभी जारी है,
गर मन्दिर बना तो भेद खत्म,
बस यहीं समस्या सारी है, 
समाजवाद का कल्पित चेहरा,
ठाना राम पार्क बनवाने का,
वोट खातिर धर्म युद्ध शुरू किये,
ये भूल  तुम्हारी  भारी है,
व्यापार इनके खून में बह रहा,
बह चुकी हिंदुत्वता सारी है, 
ये दलाल है उद्योगपतियों के,
सब पैसे वालों के दरबारी है।
         
       © ―अश्विनी यादव