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गुरुवार, 20 अप्रैल 2023

हे मालिक

टिकटों की कालाबाज़ारी हे मालिक
अद्भुत तेरी सेवादारी हे मालिक

जन सेवक का चोला ओढ़े बैठे हो
अंदर से इतनी मक्कारी हे मालिक

हे मालिक ये कैसी तेरी माया है
फॉर्च्यूनर पर अटकी गाड़ी हे मालिक

सेवा करने आये थे जो नेतागण
मर्सडीज़ की करें सवारी हे मालिक

काम तुम्हारा देख के हैरत है हमको
गुंडे-लुच्चे रखते यारी हे मालिक

बाप बनाये शीश महल अपने खूँ से
बेटा बन बैठा व्यापारी हे मालिक

हाथ में गजरा- दारू लेकर बैठे हैं
अय्याशी की लगी बीमारी हे मालिक

मुँह में नोट दबाये ठुमका मार रहे
आपस में ही मारा-मारी हे मालिक

मज़दूर किसानों के वो सारे वादे
'चखना' भर की हिस्सेदारी हे मालिक

हर इक झंडा ढोने वाला क्यों न रोये
दल की ऐसी दुर्गति भारी हे मालिक

      ~ अश्विनी यादव

Note:- अदम गोंडवी साहब जी को पढ़ने के बाद प्रेरणा लेते हुए ये कविता। इसे किसी भी पार्टी से जोड़कर देखने वाले आहत न हों, ये मेरी लिखी जा रही एक किताब में से एक अंश है, जो कविता के रूप में है।

गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

ग़लती नेहरू की (कविता )

हो गई इनको दिक़्क़त भारी नेहरू से,
ये खेल रहें हैं नईकी पारी नेहरू से,

नेहरू इनका हाथ पकड़ के बैठे हैं,
वरना लेते ज़िम्मेदारी नेहरू से,

पता करो ई नेहरू कहँवा चला गया,
अरे छीन के लाओ नींद हमारी नेहरू से,

राम कसम ई आगे-पीछे नेहरू हैं,
चलत नही बा अब होशियारी नेहरू से,

झूठ, फ़रेब औ रोना-धोना कर बइठे
फ़ेल हो गयी सब मक्कारी नेहरू से,

गंगा, गोबर, गाय, दलित सब नाटक है,
तुलना कैसे होगी तुम्हारी नेहरू से,

इसका मतलब नेहरू तुमसे क़ाबिल हैं,
यानी तुमने मान ली हारी नेहरू से,

तुम भी उनकी शासन के ही पैदा हो,
कह दो ग़लती हुई है सारी नेहरू से,
___________________
    अश्विनी यादव

सोमवार, 28 नवंबर 2016

आप तो उनसे भी आगे हो

"___खुद को सेवक और चौकीदारी कहने वाले एक कद्दावर नेता और उसके लगभग अंधे हो चुके समर्थकों को समर्पित ये पंक्तियाँ___,,
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जनता भूखी थकी हुई और चहुं ओर हाहाकार है,
पगले भक्त चिल्ला रहे है की बागों में बहार है,
उन्हें जान के लाले पड गये जो हमारे जिम्मेदार है,
देश का मुंह बंद करो कह रहा फट्टू चौकीदार है,
सलीमा देखाई में नोट चले पर खा नही सकते है,
वो लाइन में खाए धक्के जो आ जा नही सकते है,
बुढ़िया रोये अपाहिज रोये भारत देश परेशान हुआ,
आधी रात मे तेरे नाटक से जन मानस हैरान हुआ,
ये जान लो जिस कारण से तुम्हे सरताज बनाया था,
कैसे उनको गर्त में फेंक तुम्हें सत्ताधीश बनाया था,
पर क्या कहें की तुमने उनको काफ़ी पीछे छोड़ दिया,
तानाशाही और घुमाई कर हम से नाता तोड़ दिया,
रोटी छीना, थाली छीना, मुँह में नोटिस ठूस दिया,
चादर छीन लिया हमसे बदले में ठिठुरती पूस दिया,
सुन ओ सनकी राजा अधिकारों का हनन किया तुमने,
आपातकाल स्थिति पैदा कर हमे शर्मसार किया तुमने,
तुमको लाया भूल हुई तुम गला दबाने पे तुल गये हो,
तुम मदमस्त हाथी से सत्ता नशे में सब भूल गये हो,
है कसम इस बार तुम्हें जनता औकात दिखा देगी,
जैसे तुमको बिठाया था वैसे ही तुमको गिरा देगी,
नोट बंदी सही किया पर तरीका जनहित में न था,
तुम्हें गरीबी समझ होगी सोच लेना उचित न था,
साहब तुमने तो कुर्सी को अमीरों की रखैल बना डाली,
हम जनता खुद का ध्यान रखे जेटली जी ने कह डाली,
अब बताओ तुम रोज गरीबी-किसानी पेले रहते हो,
जहाँ देखो तुम भारत निर्माण की डींगे रेले रहते हो,
जितना तुमने प्रचारों पर खर्च कराया कामों का,
इतने के न काम हुए है लुटाया जितने दामों का,
अब तो वक्त निकल चुका कुर्सी छोड़ने की बारी है,
जन मानस बेहाल हुआ सबक सिखाने की तैयारी है,
जनता भूखी थकी हुई और चहुं ओर हाहाकार है,
पगले भक्त चिल्ला रहे है की बागों में बहार है,
___आज दुर्दशा सिर्फ नासमझी के कारण हुई, क्युकी उन्हें तो अमीरों के बीच में रहने की आदत है..तब गरीबों की बातें तो पन्नों में लिखी हुई आती है फिर मंच से आप चित्रित कर देते हो सब.....अब भला करे भगवान हमारा____
           
         "पंक्तियाँ :-  अश्विनी यादव"