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शनिवार, 20 नवंबर 2021

नज़्म ~ दम्भी का दम्भ

दम्भी का दम्भ है टूट गया
सच पर से कालिख़ छूट गया

बलिदान हुए हैं जो अपने
“आज़ाद ,, बने हैं वो अपने

हर इक आँसू का बदला है
कुछ पिछला है कुछ अगला है

लाशें, मातम, बेचैनी सब
याद करो उसकी करनी सब

हर लाठी पर ज़ख़्म पे अपने
ख़ून बहाए सींचे सपने

ज़ुल्मी से तो लड़ना ही था
आख़िर लड़कर मरना ही था

मरने का जब ख़ौफ़ नहीं है
अस्ल कहूँ तो जीत वहीं है

सब ने मिलकर जीता है ये
साथ लड़ेंगें वादा है ये

हर इक ज़ुल्मी झुक जाएगा
जो भी हमसे टकराएगा

हाँ! ख़ून समेटो मुस्काओ
अब सारे आँसू पी जाओ

हम माटी के लाल हैं प्यारे
दिल्ली हैं बंगाल हैं प्यारे

खेत हमीं से देश है हमसे
गाँव, गली परदेश है हमसे

  ~ अश्विनी यादव 



गुरुवार, 7 अक्टूबर 2021

नज़्म ~ तुम्हें ये हक़ दिया किसने


तुम्हें ये हक़ दिया किसने
किसी को मार देने का
घरौंदे तोड़ देने का
तुम्हें ये हक़ दिया किसने

बनाकर लाश उनको
कर रहे ज़ुल्म-ओ-सितम
निशाँ कोई नहीं बाक़ी
है उनकी बेगुनाही का
उन्हें बर्बाद करने का
तुम्हें ये हक़ दिया किसने

किसी की लाश पर चढ़कर
पैरों से कुचलने का
किसी हैवान के जैसे
शज़र वीरान करने का
तुम्हें ये हक़ दिया किसने


  ~ अश्विनी यादव

सोमवार, 24 मई 2021

नज़्म

वैसे तो ये कहना ग़लत ही होगा
लेकिन फिर भी यक़ीन करना
हम दोनों की तकदीरों में
नहीं लिखा इस जनम में मिलना...

बहुत जतन कर चुका हूँ मैं भी
बहुत जतन कर चुकी हो तुम भी
हम दोनों से ख़फ़ा है दुनिया
सच से एकदम जुदा है दुनिया
इस दुनिया को नहीं पता है
क्या मुहब्बत, क्या चाहत है ?

हम दोनों को बतलाना था
सबको मुहब्बत तक लाना था
लेकिन ये होने से रहा अब
तुम भी सब कुछ भूल ही जाना
मत बतलाना किसी को कुछ भी
हम भी ऐसे जीते रहेंगें
दिल की कोई बात न सुनना
हरदम हँसकर बातें करना

हम दोनों को ख़ुश रहना है
मिलो कभी तो ध्यान रखना..
हम दोनों की तक़दीरों में
नहीं लिखा इस जनम में मिलना....
_________________
अश्विनी यादव

शुक्रवार, 14 मई 2021

ग़ज़ल

सोच रहे हैं मदद को निकलें लेकिन उनका भी डर है
इस डर से मर जाने दें ? हद है क्या इतना भी डर है

डर डर कर जीने से अच्छा लड़कर ही मर जाएं हम
बेसुध, सहमा, पागल, बंदी ऐसे रहना भी डर है

घर में सर दीवारों से टकराने से क्या हासिल है
खिड़की खोलो बाहर जाओ घर में छिपना भी डर है

बन्दूकों से सत्ता हासिल कर सकते हो तुम लेकिन
रोज़ कोई आवाज दबाना चीख़ दबाना भी डर है

चारासाज़ों के मरने पर बागी लोग बढ़ेंगे ही
उजलत में यूँ जेल बनाना, टैक्स बढ़ाना भी डर है
_____________________
अश्विनी यादव

बुधवार, 12 मई 2021

ग़ज़ल

देखिये कैसे गिनाई जा रही लाशें हमारी,
आज पानी में बहाई जा रही लाशें हमारी,

अब नहीं सुनता है कोई रो लें कितना चीख़ लें हम,
चील कौवों को खिलाई जा रही लाशें हमारी,

वो कि ज़िम्मेदार आदम सो रहा है जागकर भी,
सच कहो तो बस लुटाई जा रही लाशें हमारी,

मन की बातें कर रहें हैं आज कल सुनते नहीं हैं,
जग हँसाई में दिखाई जा रही लाशें हमारी,

मर रहें हैं लोग साहब अब तो गद्दी छोड़ दो तुम,
तेरे महलों में दबाई जा रही लाशें हमारी,
___________________
    अश्विनी यादव

बुधवार, 26 अगस्त 2020

नज़्म ( साहब की तैयारी )

साहब ने सारी तैयारी कर रक्खी,
हर इक घर पर पहरेदारी कर रक्खी,

जो बोलेगा उसको पीटा जाएगा,
कोर्ट -कचहरी रोज़ घसीटा जाएगा,

पहले तुमको थाने में बुलवाएंगें,
फिर वर्दी से मनमर्ज़ी करवाएंगें,

लेकिन साहब तुमको इतना ध्यान रहे,
कर्म सभी का हासिल है ये ज्ञान रहे,

जैसे तुम यूँ सबको आज रुलाते हो,
तुम भी रोये थे क्यों भूले जाते हो,

हाँ मा'लूम हमें हैं तुम ही दाता हो,
जेल नहीं तो मौत के भाग्य विधाता हो,

ईश्वर जाने कब तक का ये खेला है,
जाने कैसे हम सब ने ये झेला है,

रोजी रोटी का उनका इक वादा था,
पर लगता है ये सब शोर सराबा था,

जंगल में हम रहते हैं ये बोले थे,
भाषण में वो अंगारे ही घोले थे,

जात बिरादर का डंका भी पीटे थे,
यूँ समझो बस ये सब कर ही जीते थे,

इक वादे पर सौ वादा कर ऐंठे थे,
हाथों का ये खेल समझ कर बैठे थे,

उस दिन तक तो पैरों में गिर जाते थे,
हरक़त ये चमचों से भी करवाते थे,

उस मालिक को जैसे ही सत्ता सौंपी,
मझधारे में हमने थी नौका सौंपी,

उस दिन से फिर रोज़ हमें दुत्कारा है,
अब आख़िर के हक़ में वोट हमारा है,

बढ़कर आगे आओ फिर टकराने को,
उस ज़ुल्मी के मुँह पर सच कह जाने को,

देखो कितनी आग रखे हो सीने में,
बाहर ला के शामिल कर लो जीने में,

वोट से पहले गुरूर-ए-हाकिम तोड़ो जी,
बिन तोड़े यूँ कॉलर तो मत छोड़ो जी,

     ~ अश्विनी यादव

गुरुवार, 23 जनवरी 2020

शे'र और फ़िक्र देखिए

बात आख़िर में कही अब कैसे  हो,
मैंने हँसकर कह दिया 'अब' ठीक हूँ,
_________________शे'र (1)

बात आख़िर में कही अब कैसे  हो,
मैंने हँसकर कह दिया 'हाँ' ठीक हूँ,
_________________शे'र (2)
यहाँ दो अशआर एक जैसे हैं केवल एक शब्द के बदल जाने भर से ही दोनों के मानी यानी कि (  सिचुएशन ) परिस्थिति बदल सी गयी है कहने की......दोनों के जवाब का लहजा और फिक्र दोनों ही बदल से गए हैं।

अब देखते हैं पहले शे'र को तो किसी ने पूरी बात करने के बाद मुझसे आख़िर में हाल पूछा तो जवाब में मैंने हँसकर कहा ''अब ठीक हूँ" इसका मतलब इक तुम्हारे पूछ लेने भर से या तुमसे बात करने के बाद काफी ठीक लग रहा है। एक फ्लर्ट या राहत वाली फिक्र है इसमें।

अब दूसरे शे'र को तो एकदम वैसे ही पूछा गया लेकिन इस बार मेरे जवाब का लहजा एकदम बदला सा है...कि उसने बाद दिखाने के लिए पूछा और मैंने भी बस जवाब देने भर के लिए हामी भर दी कि "हाँ ठीक हूँ,,। इसमें एक झुँझलाहट है, गुस्सा है, बेरुखी है, ऐसा लग रहा है मानो मुझे कोई फ़र्क़ ही नही पड़ता है उसके पूछने से या मेरे जवाब देने से......

सच कहूँ मुझे तो ऐसी बारीकी कभी अजीब लगती थीं लेकिन अब अच्छी लगती हैं। शायरी एकदम कमाल की चीज़ है एक एक शब्द से पूरे मिजाज़ बदले जा सकते हैं। मैं अब ऐसी बातों पर आगे ध्यान जरूर दूँगा।

मैं काफी देर तक इन्हीं दोनों शब्दों में उलझा रहा फिर मैंने अपने लिए पहला वाला शे'र चुना। जिसे पोस्टर पर जगह देना ठीक समझा।

आप मुझे ऐसी बारीकियों से ज़रूर रूबरू करवायें।जो आपके समझ मे हों अभी। मुझे पता चला है कि मीर तकी मीर इस तरह की शायरी के उस्ताद शायर में से एक हैं।
शुक्रिया।❤️
________________
अश्विनी यादव

रविवार, 22 दिसंबर 2019

तू झूठा है झूठों का क्या

यूँ ज़हर सदा उगलेगा क्या..?
अब राह नही बदलेगा क्या..?

गिरने से पहले जनता का,
तू हाथ कभी पकड़ेगा क्या..?

तू बनता है मज़लूम सदा,
सो दर्द मिरा समझेगा क्या..?

तुझसे कोई उम्मीद नही,
तू झूठा है झूठों का क्या..?

जब तू इंसान नहीं है तब,
डर ईश्वर का रक्खेगा क्या..?

चन्दन वन से इस भारत को,
तू विषधर है छोड़ेगा क्या..?

वादा झूठा, बातें झूठी,
गंगा की लाज रखेगा क्या..?

रोहित और नज़ीब कहाँ हैं ?
चीख़- पुकार सुनेगा क्या,

हिन्दू -हिन्दू रटता है तू,
कमलेश के घर पे कहेगा क्या..?

भात बिना इक मरती बिटिया,
लाशों से देश बनेगा क्या..?

तुझको क्या लगता है ज़ालिम,
सदियों तक राज चलेगा क्या..?

देश बँटा है लोग बँटे हैं,
पागलपन ही चाहेगा क्या..?

तू दुनिया से ऊपर का है,
सब लम्बी ही फेंकेगा क्या..?

इक दिन मोहब्बत का पौधा,
बाग-ए-नफ़रत में उगेगा क्या..?
_______________
अश्विनी यादव

बुधवार, 25 सितंबर 2019

नज़्म (दुआएँ )

( घर के बच्चों के लिए दुआएँ )

नज़्म
_______________
ओ मेरी नन्ही हथेली
तुम मेरी उँगली पकड़ो
कोशिश करो चलने की
अपने कदम आधे कर लूँगा
लेकिन तुम्हारे साथ चलूँगा
तुम बिना भय के चलो
मैं तुम्हें सम्हाल लूँगा
तुम्हारे छोटे छोटे होंठ
जब मुझे बुलाते हैं
बड़े प्यार से
सच कहूँ तो लगता है
ज़िन्दगी बस यहीं रुकी रहे
हम साथ चलते रहें
तुम बोलो बिना रुके 
मैं सुनता रहूँ, बस सुनता रहूँ....
_______________
  अश्विनी यादव

बुधवार, 17 जुलाई 2019

हम लड़के भी न

नज़्म
___________
हम लड़के भी न
कहीं पर रह लेते हैं
कुछ भी सुन लेते हैं
कुछ भी सह लेते हैं
हम लड़के भी न....

लड़कियाँ एक से दूसरे 
घर को तो जाती हैं
लेकिन लड़के बाहर
किराए पर जीते हैं,
कभी -कभी थके हों तो
भूखे ही सो जाते हैं,

हम लड़के भी न....

घर पर जैसे ही
ज़रूरतों की बारिश होती है
तो हम लड़के ही
टीन शेड की तरह
छप्पर बना दिए जाते हैं
इन सबसे उबरने को
तरसा दिए जाते हैं,

हम लड़के भी न....

जब मन था आईएएस का
तो इंजीनियरिंग किया
पापा के कहने पर ही
नौकरी भी किया
लेकिन फिर नकारा कहकर
दुत्कार दिए जाते हैं

हम लड़के भी न....

उनके मन का ही पढ़ा
उनके मन का ही जिया
उन्होंने जब जो कहा
सब चुपचाप ही किया
ईज़्ज़त की बात थी सो
मुहब्बत भी मार दिया
जो उन्हें पसन्द थी
उसे ही स्वीकार लिया,
उनकी ख़ुशियों की ख़ातिर
हम क्या कर जाते हैं,

हम लड़के भी न....

रोज़ ही मरते हैं
रोज़ जी जाते हैं
डाँट खाते खाते
हम बड़े हो जाते हैं
लड़कियाँ चांदी सी
हम लोहे हो जाते हैं
हम लड़के भी न
बस ऐसे रह जाते हैं....
_______________
अश्विनी यादव

शुक्रवार, 10 मई 2019

'वो लड़की'

न समझ थी
न ही ताक़त थी
न ही शरीर का कोई अंग विकसित था
वो बस चौदह बरस की थी
फ़िर भी उसे
सहना पड़ा ये
पहाड़ बराबर दुःख
ये वो पीड़ा थी
जिसकी बराबरी
सौ बिच्छुओं का डंक,
हर इक हड्डी टूट जाने
नही कर सकता
और सच कहूँ तो कोई अनुमान नही
इतना दर्द उफ़्फ़!
लेकिन फ़िर भी
आदेश था कोर्ट का
जनना था उस बच्चे को
जो पैदा होने से पहले ही
ज़िन्दा लाश बना दिया था
ये अनचाही चीज़
उसे मिली कैसे कोई बतायेगा ?

ये भी इक बच्ची थी
अभी खेल कूद रही थी
इसके बस्तों की किताब भी
अगले कक्षा का
और इसका जन्मदिन अगले बरस का
दोनों इंतज़ार में थे
इक दिन कुछ दरिंदों ने
इस फूल को नोच डाला
इतना नोंचा जितनी ताक़त थी उनमें
पहले तो बात दबी
लेकिन ये बात नही आग थी
जिसने उन जिस्मों को जला दिया
जो छुपाना चाहते थे
फिर भी इस आग को
थाने के तूफ़ान से बढ़कर
कचहरी के बारिश को पार करना था

आज़ बहुत देर हो गयी
मीलार्ड की आँख खुलने में
क्योंकि इन केस के पन्नों में पंख लगे है
पैसों के, तारीखों के,
पेट का आकार बढ़ गया है
जान के अंदर भी इक जान आ गयी है
और कहा गया देर हो गयी है
इसे जनना होगा
वो लगभग मर ही गयी होगी
उस ''अनचाहे'' को जनने में
बच्चा अनाथाश्रम का हुआ
और इस अधमरी को दस लाख का चेक,
ये रुपया इसको आगे के लिए था
या ज़िन्दगी गंवाने का था
या फ़िर बलात्कार सहने
बच्चे पैदा करने का ईनाम था

पर अभी समझ न आया कि
देर हुई कहाँ थी
क्यूँ सहना पड़ा ?
सज़ा में देरी क्यूँ?
सज़ा किसको मिली आख़िर….?

________________________
      अश्विनी यादव
ashwini yadav poetry

गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

ग़लती नेहरू की (कविता )

हो गई इनको दिक़्क़त भारी नेहरू से,
ये खेल रहें हैं नईकी पारी नेहरू से,

नेहरू इनका हाथ पकड़ के बैठे हैं,
वरना लेते ज़िम्मेदारी नेहरू से,

पता करो ई नेहरू कहँवा चला गया,
अरे छीन के लाओ नींद हमारी नेहरू से,

राम कसम ई आगे-पीछे नेहरू हैं,
चलत नही बा अब होशियारी नेहरू से,

झूठ, फ़रेब औ रोना-धोना कर बइठे
फ़ेल हो गयी सब मक्कारी नेहरू से,

गंगा, गोबर, गाय, दलित सब नाटक है,
तुलना कैसे होगी तुम्हारी नेहरू से,

इसका मतलब नेहरू तुमसे क़ाबिल हैं,
यानी तुमने मान ली हारी नेहरू से,

तुम भी उनकी शासन के ही पैदा हो,
कह दो ग़लती हुई है सारी नेहरू से,
___________________
    अश्विनी यादव

शनिवार, 17 मार्च 2018

vismrita हमारे बीच में

नव रात्रि के पावन पर्व एवम हिंदू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं....अत्यंत हर्षित हूँ ये सूचित करने के लिए की हमारी 'टीम विस्मृता' की मेहनत से हमारी बेवसाइट (पोर्टल) का लगभग सारा कार्य पूरा हो चुका है.....
आपकी रचनाओं और शुभकामनाओं की प्रतीक्षा है। हमारी टीम में आपका हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन है।
           ― अश्विनी यादव
              ( टीम विस्मृता )

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

काश! की तुम मिलने आती

कोहरे की पहरेदारी थी
काश की तुम मिलने आती,
सर्द रातों की दुश्वारी थी
काश की तुम समझ पाती,
भेज ही देती किसी तरह
यादों का गर्म बिछौना तुम,
प्रेम पाश के कम्बल को
ओढ़ा दी होती मुझपर तुम,
दिन चमकना भूल गया है
क्या इसकी भी साझेदारी थी,
काश की तुम मिलने आती
फिर कोहरे की पहरेदारी थी,
____इस बेरहम कड़कती सर्दियों से खुदा जहाँ को बचाये,
  ( पंक्तियाँ :― अश्विनी यादव )

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

याद करोगे जब हमें

करोगे याद जब हमको न आंसू रोक पाओगे,
मेरी बातों में खोने से न खुद को रोक पाओगे,
बड़ी तालीम ली होगी जमाने को सिखाने के लिए,
जमाना सवाल करेगा न किसी को टोक पाओगे,,,
कभी बिस्तर पे सिमटोगे कभी झरोखे पे आओगे,
कभी ख्वाबो में डूब के भूलकर मुझे बुलाओगे,
इक़ मेरी चाहत में कितनो को लिखना सिखाया,
तुमसे मोहब्बत न सम्हली अब नजर कैसे मिलाओगे,,,,
वो घरौंदे, वो पत्थर हमारे नाम के जब दिखाई देंगे,
दिल बोझिल हो जायेगा मेरे बोल सुनाई देंगें,
हम घुट घुट कर मर रहें कतरों में बिखर जायेंगें,
तुम ही जानो हाल तुम्हारा की कैसे जी पाओगे,
करोगे याद जब हमको न आंसू रोक पाओगे,......
     ―अश्विनी यादव

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

तुम बिन

मारो कोई बिष बाण प्रिये,
अब ले लो मेरे प्राण प्रिये,
तुम नही रही मेरी बनके,
कुसुमालय हुए कृपाण प्रिये,
की अब ले लो मेरे प्राण प्रिये।।

सुमरुं प्रेम नित नये गीत से,
दरश जो पाऊँ अपने मीत के,
बलिहारी करूं ज्यों रसिक बना,
कनक हुआ इस इश्क रीति से ।।

    © अश्विनी यादव