कोहरे की पहरेदारी थी
काश की तुम मिलने आती,
सर्द रातों की दुश्वारी थी
काश की तुम समझ पाती,
भेज ही देती किसी तरह
यादों का गर्म बिछौना तुम,
प्रेम पाश के कम्बल को
ओढ़ा दी होती मुझपर तुम,
दिन चमकना भूल गया है
क्या इसकी भी साझेदारी थी,
काश की तुम मिलने आती
फिर कोहरे की पहरेदारी थी,
____इस बेरहम कड़कती सर्दियों से खुदा जहाँ को बचाये,
( पंक्तियाँ :― अश्विनी यादव )
हमें प्रयास करते रहना चाहिए ज्ञान और प्रेम बाँटने का, जिससे एक सभ्य समाज का निर्माण किया जा सके।
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शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016
काश! की तुम मिलने आती
सोमवार, 11 अप्रैल 2016
एक हसीं सा ख्वाब है तू
सजाकर माथ पे बिन्दी
लगाकर आँख में काजल
रचाकर हाथ में मेंहदी
पहनकर पांव में पायल
सुर्ख़ होंठों की लाली से
कभी मुस्कान करती हो
तुम्ही में खो सा जाता हूँ
जब हँसकर बात करती हो
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चमकती नाक की नथुनी
खनकते ये हाँथ के कंगन
गाढ़ी सी चूनर धानी
कसी हुई कमर की कर्धन
मोती माला सजी गर्दन
बाली जुल्फों संग लटकती है
समां थम सा जाता है
जब हमारी ओर तकती हो...
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―अश्विनी यादव
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