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शनिवार, 20 नवंबर 2021

नज़्म ~ दम्भी का दम्भ

दम्भी का दम्भ है टूट गया
सच पर से कालिख़ छूट गया

बलिदान हुए हैं जो अपने
“आज़ाद ,, बने हैं वो अपने

हर इक आँसू का बदला है
कुछ पिछला है कुछ अगला है

लाशें, मातम, बेचैनी सब
याद करो उसकी करनी सब

हर लाठी पर ज़ख़्म पे अपने
ख़ून बहाए सींचे सपने

ज़ुल्मी से तो लड़ना ही था
आख़िर लड़कर मरना ही था

मरने का जब ख़ौफ़ नहीं है
अस्ल कहूँ तो जीत वहीं है

सब ने मिलकर जीता है ये
साथ लड़ेंगें वादा है ये

हर इक ज़ुल्मी झुक जाएगा
जो भी हमसे टकराएगा

हाँ! ख़ून समेटो मुस्काओ
अब सारे आँसू पी जाओ

हम माटी के लाल हैं प्यारे
दिल्ली हैं बंगाल हैं प्यारे

खेत हमीं से देश है हमसे
गाँव, गली परदेश है हमसे

  ~ अश्विनी यादव 



सोमवार, 2 अगस्त 2021

ओलम्पिक में भारतीय खिलाड़ी और हम लोग

 हर रोज आपको दो चार लोग ये कहते हुए पोस्ट करते मिल जाएंगे 130 करोड़ की आबादी में 13 मेडल भी  नहीं आ रहे हैं. भारत खेलों में इतना पिछड़ा हुआ क्यों है ? 

 तो भाई मेडल इसलिए नहीं आते हैं क्योंकि हम बचते है खिलाड़ियों को मूलभूत सुविधाएं देने में , उन्हे उनकी वाजिब पहचान देने में . मेडल क्या ख़ाक आयेंगे ?

 तो भाई सुनो जिस लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के पास ये जिम्मेदारी थी कि वो देश की बुलंद इमारत में सशक्त नींव का पत्थर साबित होगा वो आज कल दो कौड़ी से भी गई गुजरी हरकतें करके अपना स्तर दिन ब दिन बद से बदतर  कर रहा है . 

भारतीय महिला हॉकी  टीम ने आस्ट्रेलिया को हराया तो ये चक दे इंडिया की अभिनेत्री को फोन पर लेकर अपने दर्शकों का टाइम पास करवा रहे हैं.शर्म तो मगर इन नमूनों को आती नहीं होगी . अगर हॉकी खिलाड़ियों के घर परिवार वालों से ही बात के कि होती तो क्या बिगड़ जाता इनका ?

कुछ समय से यही हो रहा है असली नायकों को गायब करके हम पर फर्जी के  नायक थोपे जा रहे हैं। 

ऐसा हर क्षेत्र में हो रहा है . 

हर जगह ग्लैमर का तडका चाहिए.शायद इसीलिए कोई राजा विदेशी मेहमान के आने पर झोपड़पट्टियां दीवार के पीछे छिपा देता है . 

ये इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि हमने असली नायकों को हमेशा गुमनाम ही रखा है..और जबरदस्ती के नायक इस देश पर थोपे गए हैं.

         ~  गौरव सिंह यादव

बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल

ज़ुल्म के नाख़ून पैने हो गए हैं,
यार अब तो जान की बाज़ी लगी है,

चुन रहें हैं बलि दिया जाए कहाँ पर,
और अब सरकार भी राजी लगी है,

हम भला आदम समझ बैठे थे जिसको,
जात भी उसकी वहीं दागी लगी है,
____________________
  अश्विनी यादव​​ 

सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

जन्मोत्सव लाल बहादुर शास्त्री जी का

लाल बहादुर शास्त्री जी के जन्मोत्सव पर नमन करते हुए हार्दिक शुभकामनाएं समस्त भारतवंशियों को।

भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता, क्रांतिकारी व्यक्तित्व और जन कल्याणी विचारों के लिए हमेशा याद किए जाते हैं। शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। वह अपने देश और देशवासियों के सम्मान और रक्षा के लिए कुछ भी करने को तैयार थे, जो कि उनके व्यक्तित्व को महान बनाता है। आपको बता दें कि इसी के चलते उन्होंने देश को मुसीबत से निकालने के लिए भोजन करना भी छोड़ दिया था और साथ ही वेतन लेने से भी मना कर दिया था।

हम बताते है कि क्यों छोड़ दिया था खाना...

1962 के युद्ध में भारत को बहुत नुकसान हुआ था। इसी का फायदा उठाने के लिए पाकिस्तान ने 1965 में युद्ध छेड़ दिया। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाक को मुंहतोड़ जवाब देकर हरा दिया। युद्ध के दौरान भारत में वित्तीय संकट गहरा गया था। ऐसे में पूर्व प्रधानमंत्री ने रामलीला मैदान से लोगों से अपील की कि, सभी अपने फालतू के खर्चे छोड़ दें और हफ्ते में एक दिन उपवास जरूर रखें। जिससे भारत को अमेरिका से गेंहू ज्यादा ना खरीदना पड़े और भारत को जल्दी वित्तीय संकट से उबर पाए। इसलिए उन्होंने खुद भी एक दिन उपवास रखना शुरू कर दिया था।

वेतन लेने से कर दिया था मना...

इस वित्तीय संकट से देश को निकालने और देशवासियों के सामने प्रेरणा बनने के लिए उन्होंने अपना वेतन लेने से भी मना कर दिया था। यहां तक कि कहा जाता है कि एक बार शास्त्री जी विदेश जा रहे थे किसी बैठक के लिए  उनकी धोती फटी हुई थी तो उन्होंने नई धोती की जगह फटी धोती को ही रफ़ू करवाकर पहने और सम्मेलन में चले गए।
आज इस पावन अवसर पे ऐसी महान व्यक्तित्व के सुकर्मों का संस्मरण करते हुए बधाई प्रेषित करतें है ।

पसीना बहाना पड़ता है खेतों में,
ऐसे ही कोई किसान नहीं होता,
__________________
  अश्विनी यादव

शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

फ़ूलन के ज़ख्म फ़ूलन का फ़ैसला

वो चीखी-चिल्लाई भी पर उठा ले गए।
भागी, कूदी, काटी भी पर उठा ले गए।।

साहब ने मनमर्जी की और सज़ा दे गए।
वो राम दुहाई अर्जी दी पर सज़ा दे गए।।

सो रहा राम हमारा सोया था कान्हा भी।
वो घसीटे कोठरी गए चुप था थाना भी।।

बारी-बारी लूट रहे थे रौबीली मूँछों वाले।
ख़ैरात जान टूट पड़े खानदान ऊंचे वाले।।

ब्लाउज़ के इतने टुकड़े  हुये क्या बोलूं।
साड़ी तन से जाने कब छूटी क्या बोलूं।।

पेटीकोट जा बनी साहब जी की पगड़ी।
वो डरते डरते निहत्थे ही सबसे झगड़ी।।

खुद को वीरों का खानदान बतलाने वाले।
नोंच-नोंच कर जिस्म से पेट भरने वाले ।।

गांव के जमींदारों का यूँ पौरुष जागा था।
बिना पट वक्ष-नितंब ले जिस्म भागा था।।

जननांगों का खूब प्रदर्शन ऐसे होता रहा।
बच्ची के बाप-भाइयों का लहू सोता रहा।।

ऊँचें घराने वाले जो यूँ छूने से कतराते थे।
गर आबरू मिले तो काट काटके खाते थे।।

मर्यादा सब चली गयी देश चुप रहा सारा।
ख़ाकी वाले खद्दर वाले का हाथ रहा सारा।।

बोलो कौन जायेगा भारत के न्यायालय में।
पंचों ने ही इज्ज़त लूटी गांव के पंचायत में।।

जीना दूभर करके सबने कालिख़ पोती है।
वो बाप भी गुनहगार है जिसकी वो बेटी है।।

मर जाते बचाने में तब भी तो अच्छा होता।
गर जिंदा रह गए थे बदले को सोचा होता।।

टीका लगा माथे पे जय भवानी गाया उसने।
एकनाली लोहे की आखिर में उठाया उसने।।

दामन के दागों का हिसाब लगाया फ़ूलन ने।
अपने हर  चोंटों पे मरहम लगाया फ़ूलन ने।।

जो जवानी जोश में थी गुरुर आसमां पे था।
ज़बरदस्ती का  हुनर जिनके खानदाँ में था।।

उन सबके छाती में पीतल उतारा फ़ूलन ने।
इनके जैसे बहुतों किया किनारा फ़ूलन ने।।

बागे-खुशहाली में ही  कटा था नीम करैला।
अपने ज़ख्म, आबरू तो हो अपना फ़ैसला।।

                © अश्विनी यादव

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

विकास पगला गया


पता तो करो कौन  बरगला गया है
सुना है कि विकास  पगला गया है
जो मंच से  खूब  गलगला गया था
वो खुद को  जादूगर  बता गया था
किसानों जवानों की बात करता था
देश न झुकने  दूंगा  दम्भ भरता था
टैक्स वाली समस्या  हल कर दूंगा
काला धन लाकर हर घर भर दूंगा
नारी सुरक्षा  का  उसका वादा था
हत्या लूट के खात्मे पर आमदा था
गाय गंगा के  हित से यूँ वास्ता था
वहीं है हिंदुत्व  जिसका रास्ता था
देश लाइन में  लगाकर  चला गया
दो दिनों बाद टेंसुएँ बहाने आ गया
कहता था चौराहे पर लटका देना
जी में आये तो सूली  पे चढ़ा देना
मेरा  क्या  झोला  वाला फकीर हूँ
उठाया चल दूंगा  इतना गम्भीर हूँ
गधे से  सीख  रहा  हूँ मुझे देखो न
सबका डीएनए जांचा मेरा देखो न
बेरोजगारों  की  चमड़ी उधेडा हूँ
बेटियों को  लाठियों से खदेड़ा हूँ
शिक्षामित्रों  की  चिता लगाया हूं
रोजगार सेवकों को लतियाया हूँ
बच्चों को जिंदा  ये दफना गया है
सुना है की विकास पगला गया है
राम मंदिर का खेला खेल गया है
लेके मोटा सा ये चंदा पेल गया है
शहीदों की बात पे हकला गया है
ई गुजराती विकास पगला गया है
देख अश्विन भी  कैसे ठगा गया है
ये भक्तों का  बप्पा  पगला गया है

......... जिस तरीके से आज भारत देश की नीतियां हैं शासन-प्रशासन है और पूरा प्रतिरूप है उसको देखते हुए ही लग रहा है कि विकास पूरी तरह से अपना संतुलन खो बैठा है। हमारी सभी सिर्फ विनती है कि इस विकास को इसकी औकात पर रखे और भविष्य में विकास को संभाल कर रखेंगे कहीं फिर से ना पगलाने पाए,,,,,,,,,,

            ― अश्विनी यादव