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रविवार, 22 दिसंबर 2019

तू झूठा है झूठों का क्या

यूँ ज़हर सदा उगलेगा क्या..?
अब राह नही बदलेगा क्या..?

गिरने से पहले जनता का,
तू हाथ कभी पकड़ेगा क्या..?

तू बनता है मज़लूम सदा,
सो दर्द मिरा समझेगा क्या..?

तुझसे कोई उम्मीद नही,
तू झूठा है झूठों का क्या..?

जब तू इंसान नहीं है तब,
डर ईश्वर का रक्खेगा क्या..?

चन्दन वन से इस भारत को,
तू विषधर है छोड़ेगा क्या..?

वादा झूठा, बातें झूठी,
गंगा की लाज रखेगा क्या..?

रोहित और नज़ीब कहाँ हैं ?
चीख़- पुकार सुनेगा क्या,

हिन्दू -हिन्दू रटता है तू,
कमलेश के घर पे कहेगा क्या..?

भात बिना इक मरती बिटिया,
लाशों से देश बनेगा क्या..?

तुझको क्या लगता है ज़ालिम,
सदियों तक राज चलेगा क्या..?

देश बँटा है लोग बँटे हैं,
पागलपन ही चाहेगा क्या..?

तू दुनिया से ऊपर का है,
सब लम्बी ही फेंकेगा क्या..?

इक दिन मोहब्बत का पौधा,
बाग-ए-नफ़रत में उगेगा क्या..?
_______________
अश्विनी यादव

मंगलवार, 5 मार्च 2019

नज़्म ( ज़िन्दा नज़र आओ )

यही वो वक्त है
ज़िन्दा होने का एहसास करो
अगर हाथ है तो
उठाने का प्रयत्न करो
कलम में स्याही नही
बारूद भरो
बेशक तुम्हारा ख़ून बहेगा
लेकिन नस्लें महफूज़ रहेंगीं..…

अगर पाँव है तो
दौड़कर आगे बढ़ो
ज़ुल्म के मुँह तमाचा जड़ने
जो कर सकते हो
करने की कोशिश करो
नही तो किसी रोज़
औरों की तरह
वो तुम्हें भी खा जाएगा
फिर तुम्हारी कायरता
नई नस्ल में भी उतर जाएगी....

ये भूख तुम्हारी है
ये मिट्टी भी तुम्हारी है
छिली हुई पीठ, घिठ्ठे वाले हाथ
सब कुछ तुम्हारा है
ये तय है कि ऐसे ही
मरना है तुम्हें
तो क्यूँ न लड़कर मरा जाए
बचेंगें तो भी हम ही
नही तो हमारे अपने बचेंगें.....

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

तो लिखना छोड़ दूंगा मैं

लिखना छोड़ दूंगा मैं,
मेरे लिखने से इंकलाब
न ही बदलाव कोई होगा
अपनो से रंजिश होगी
मतभेद मनभेद होगा
तब क्या करूँगा मैं,
सो लिखना छोड़ दूंगा मैं,।।

समाज की गफलत में
और विचारों के बहाव में
कुछ जिद्दी स्वभाव है
कई चीजों का अभाव है
सरकार के राजतन्त्र को
तिलांजलि लोकतंत्र को
देकर मुंह मोड़ लूंगा मैं,
तो लिखना छोड़ दूंगा मैं।।

ये जो पंक्तियाँ है मेरी
सब मूक बधिर रहेंगी
किसी ज़ुल्म जबदस्ती पे
ये कलम न चलेगी
इस तरह अपने यारों से
नाता जोड़ लूंगा मैं,
कलम सो रही मेरी अब
सो लिखना छोड़ दूंगा मैं।।

..... अश्विनी यादव​​
[मुझे लगता है कि मेरे राजनीतिक दलों पर, समाज की कुरीतियों, मज़हबी धर्मान्धों पर लिखने से कई खास मित्रगण लोग दुःखी से प्रतीत होते है,,, वो मतभेद नही बल्कि मनभेद कर बैठते है। सो अब लगता है कि देश गर्त में जाये या समाज डूब मरे जैसे कि अभी मर रहा है क्या फर्क है,,,, अपने को कुछ नही होना चाहिए बस।
हां देखो गर इस जुल्मी शासन में तुम मर जाओगे तो मैं दुःख जाहिर नही कर पाऊंगा,,,,लेकिन यदि मैं मर गया तो मेरे लिए एक पोस्ट कर देना, और ये जरूर लिख देना....
"वो टूटा नही था पर अपनो की चाहत में,
जमीरे-कलम पर लिबास डाल सो गया,,
        ―  अश्विनी यादव

सोमवार, 20 मार्च 2017

मैं ही इंकलाब हूँ

गरीबों का छप्पर हूँ, कलम की आवाज हूँ,
दुखियों का रहबर हूँ, बेबसों का सरताज हूँ,

जला दे जुल्मी को, शब्दों में लिपटा आग हूँ,
रक्त रंजिश शमशीर हूँ, हाँ मै ही इन्कलाब हूँ,

पहली उठी बंद मुठ्ठी हूँ, शोषितों के जज्बात हूँ,
रोज गिरती हुई ईमारत सी, सोच-ए-समाज हूँ,

किस्तों में जीना छोड़,निर्माण की शुरुआत हूँ,
'कलम की आवाज हूँ, हाँ मै ही इन्काब हूँ,

           ―  अश्विनी यादव