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गुरुवार, 20 मई 2021

ग़ज़ल

रेतों में दफ़नाए हुये पहराए हुए लोग
क्या शौक़ से डूबे थे हम उतराए हुये लोग

हम इतने बुरे हैं यारों बदनामी वास्ते
चीलों को पसन्द हैं हम पगलाए हुए लोग

साहब ने कहा है मत बदनाम करो हमको
यूँ तैरो मत गंगा में ओ छिपाए हुए लोग

कितनी लाशें अब तक कुत्तों के हिस्सों में
चील-कौवे मछली को हम बँटवाए हुए लोग

है लाखों में मारा इक ज़ुल्मी पागल ने
आख़िर सच कैसे बोलें झुठलाए हुए लोग
 
     
       ~ अश्विनी यादव

सोमवार, 20 मार्च 2017

मैं ही इंकलाब हूँ

गरीबों का छप्पर हूँ, कलम की आवाज हूँ,
दुखियों का रहबर हूँ, बेबसों का सरताज हूँ,

जला दे जुल्मी को, शब्दों में लिपटा आग हूँ,
रक्त रंजिश शमशीर हूँ, हाँ मै ही इन्कलाब हूँ,

पहली उठी बंद मुठ्ठी हूँ, शोषितों के जज्बात हूँ,
रोज गिरती हुई ईमारत सी, सोच-ए-समाज हूँ,

किस्तों में जीना छोड़,निर्माण की शुरुआत हूँ,
'कलम की आवाज हूँ, हाँ मै ही इन्काब हूँ,

           ―  अश्विनी यादव

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

हाँ तुम स्त्री हो


माँ हो, बहन हो, बेटी हो,
परिवार खुद में समेटी हो,
कभी फूल सी कोमल हो,
कभी हीरे सी कठोर हो,
रात सी शीतल दिन सोनल हो,
समाज संघर्ष की भोर हो,
आस्था की ज्योति नारी हो तुम,
हम एक रूप में उद्धारी हो तुम,
हो विश्वास की कल्पवृक्ष,
प्रेम न्याय की मूर्ति हो,
हो दर्पण सी एक चच्क्षु,
मनुष्य श्रृंखला की पूर्ति हो,
हाँ तुम लड़की हो औरत हो,
पत्नी हो हाँ तुम स्त्री हो,
तुम गर्व करो अभिमान करो,
अपने नारीत्व का सम्मान करो,

     (कवि―अश्विनी यादव)

सोमवार, 28 मार्च 2016

किसान मर गया

बड़ी चहल-पहल मची है । नेता जी शोक सभा में जा रहे है । उन्हें किस किस बात पे क्या क्या बोलना है, पहले किससे मिलना है। वहाँ का लोकल नेता कौन है पता लगाया जा रहा है।
-----वही दूसरी ओर एक घर में चारपाई पे एक जर्जर हुई शरीर। अगल बगल कई बिलखते चेहरे। जिसमे एक लगभग पागल सी दिखने वाली औरत.....और तीन बच्चे। जिनकी हालत कुपोषण के साये में जीवंत है।
बाजार में, सदन में, मन्दिर के ट्रस्ट की आफ़िस, नमाज के बाद मस्जिद के बगल में, नुक्कड़ पे  बार बार लगातार एक चर्चा बड़ी गर्म चल रही है,,,"फिर एक किसान मर गया"....
'किसान मर गया'
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चर्चाएँ चल रही चहुँओर
कि एक किसान मर गया,
संवेदना लेकर हर नेता
उसके घर पे है गया,
बात सदन में उठ रही
मौत क्यूँ हुई उसकी,
सत्ता कह रही कल की
ठंड से मर गया,
विरोधी पुरज़ोर कह रहे
वो कर्ज में डूबा था,
फसले हो गयी बर्बाद
वो डरके मर गया,
पर राहत देने को
कोई आगे नही आया,
मुआवज़े का ऐलान हुआ
पर मजाक बनकर रह गया,
अपने दो वक्त की रोटी को
जो सैकडों पेट भरता था,
वो जमीर का अमीरजादा
बेनाम किसान मर गया,
पर एक बात सच्ची सी
छोटी सी बच्ची बोली,
बाबू कई दिन से भूखे थे
उन्होंने खा ली जहर गोली,
कुछ ठेकेदार मजहब के
पूछ रहे है सबसे,
जरा पता करो जल्दी
हिंदू था कि मुसलमान मर गया,
ये दास्तान सुन करके
मेरा इन्सान मर गया,
बाँट लो दरख्तों को
तख्तों को ओ जल्लादों,
तेरा खुदा मर गया
और मेरा राम मर गया..
हलचल है शहर में की
फिर से एक किसान मर गया...
――
कुछ बेहूदे अभी तक कुतर्क कर रहे है आपस में ..
'यार उसके पत्नी का अफेयर था शायद,,, नही बे उसकी कही और सेटिंग थी उसी के चक्कर में,  अरे पीने के चक्कर में लड़ाई की होगी और फिर सुसाइड कर लिया होगा...
--©®---कवि/लेखक― अश्विनी यादव