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सोमवार, 20 नवंबर 2017

आज बाज़ार गये थे

चटपटे चाट वाले के
तवे  की  खनखन,
बगल गुब्बारे वाले के
घुनघुनों की छनछन,
चूड़ी वाली चाची के
शीशों की चमक,
यादव जी के  घी के
लड्डूवों की महक,
सब खरीद लायें हैं
हम बाज़ार गये थे।।

सीटियों की सी-सी
गाड़ियों का शोर,
बन्दर की  खीं-खीं
नाचता इक मोर,
डमरू की डम-डम
लकड़ी का सांप,
चलते रहे थम-थम
भठ्ठियों की भाप,
सब बटोर लाये हैं,
आज बाज़ार गये थे।।

चमकता हुआ ताज
एक परी की छड़ी,
उड़ने वाला जहाज
एक छोटी सी घड़ी,
पूरा झोला भर खुशी
होंठों की मुस्कान,
तैरते हवा पर हंसी
झूले  की  उड़ान,
सब घर लायें हैं,
आज बाज़ार गये थे।।

     प्यारी भतीजी भूमि के लिए ये दूसरी कविता ''आज बाज़ार गए थे''......
     
       ― अश्विनी यादव

बुधवार, 23 अगस्त 2017

बिटिया

#बिटिया  #समाज  #सरकार और #हम
मैं अश्विनी, हमारे भारत की बुनियादी ढांचे को दर्शाने की कोशिश कर रहा हूँ....
........आइये रूबरू होते है भारत देश से जो कि पुरूष प्रधान देश है  जहां #यत्र_नारयेस्तु_पूज्यन्ते_रमन्ते_तत्र_देवता की गाथा गायी जाती है लेकिन हकीकत में हर वक्त महिलाओं को कुचला ही जाता है। क्यूंकि ये पुरूष खुद के अस्तित्व पर विश्वास नही कर पा रहा है सदियों से।
अब बात करते है महिला उत्पत्ति की........
        सबसे पहले तो कोई नही चाहता कि उसके घर बेटी जन्मे इसके लिए वो टोटके से लेकर डॉक्टर तक के  दरवाजे पर दस्तक देते है, इसके बाद जाँच पड़ताल करवाने के बाद यदि 'बेटी' की संभावना रहती है तो उसे गिराने के लिए हर सम्भव प्रयास किया जाता है फिर भी किसी कारणवश यदि कोई बात नहीं बन पाती है तो पैदा होने के बाद उसे कूड़ेदान, गटर, नाली, कीचड़, तालाब, झाड़ियों, खेतों, में फेंक देते है........ अगले सुबह कुछ कुत्तों द्वारा वो नन्ही जीव चीथी जाती हुई लाश के रूप में आधी अधूरी मिलती है।
फिर भी इन सबसे गर किसी तरह से बच गयी तो घर मे एक ग्रहण की तरह सबके निगाहों में चढ़ी हुई पाली जाती है, गिरते सम्हलते थोड़ा बहुत पढ़ने को जाती हैं यदि भाग्य ठीक रहा तो, कुछ दिन बाद वो भी बंद। इसके बावजूद किसी रिश्तेदार, पड़ोसी आदि से बलात्कृत होने से बच गयी तो जरा सा बड़ी होने पर दबंगो द्वारा खेतों में घसीट ली जाई जाती है, मनचलों द्वारा छेड़ी जाती है गर विरोध करती है तो मार दी जाती हैं, हाथ पैर काट डाला जाता है, तेजाब से नहला दिया जाता है,........ इतने के बाद भी बच गयी अगर तो कम उम्र में शादी कर दी जाती है, वहां ससुराल में पे जाने के लिए उसे पैसो से तोला जाता है... कई बार दहेज प्रथा को जीवंत रखने के लिए आग के हवाले करने में भी सास, ससुर और पति कोई कोताही नहीं बरतते है।
मान लो ये सब से निकल गयी वो तो जिंदगी भर जूती बनकर जीने को ही अपनी किस्मत समझकर वो मजबूर रहती है।
      .......इस संसार मे न जाने क्यों पौरुष का प्रमाण देने के लिए महिला को पताडित करके ही दर्शाया जाता रहा है। आवेश में आकर पुरूष मारेगा, बलत्कृत करेगा, कभी अकेले कभी सामूहिक और इतने जुल्म होने के बाद वो महिला या बिटिया ही अपवित्र हो जाती है जबकि उसके साथ ये घिनौनी हरकत करने वाले लोग पाक साफ बने समाजिक प्रतिष्ठा के अधिकारी होते हुए जिंदगी को जीते है।
    .....इन सभी ग्रन्थों से लेकर हर जगह पर नारी को संसार सृजन कर्ता कहा गया है लेकिन हकीकत में पैदा होने के पहले से आखिरी सांस तक मतलब हर वक्त
वो डरी, सहमी, कुचली, अपमानित की हुई मिलती है। यदि यही पुरुषत्व के पौरुष की निशानी है तो मैं अश्विनी, थूकता हूँ इस दोगले समाज पर।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

हाँ तुम स्त्री हो


माँ हो, बहन हो, बेटी हो,
परिवार खुद में समेटी हो,
कभी फूल सी कोमल हो,
कभी हीरे सी कठोर हो,
रात सी शीतल दिन सोनल हो,
समाज संघर्ष की भोर हो,
आस्था की ज्योति नारी हो तुम,
हम एक रूप में उद्धारी हो तुम,
हो विश्वास की कल्पवृक्ष,
प्रेम न्याय की मूर्ति हो,
हो दर्पण सी एक चच्क्षु,
मनुष्य श्रृंखला की पूर्ति हो,
हाँ तुम लड़की हो औरत हो,
पत्नी हो हाँ तुम स्त्री हो,
तुम गर्व करो अभिमान करो,
अपने नारीत्व का सम्मान करो,

     (कवि―अश्विनी यादव)