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मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

ग़ज़ल

हँसते, रोते, सुनते, गाते ज़िन्दा ऐसे रहते हैं

थे जिस मिट्टी के मीर-ओ-ग़ालिब हम उस मिट्टी के हैं


सच कहने से ज़ियादह मुश्किल होता है ख़ुद पर सुनना

मुँह पर अच्छा रहने से ही रिश्ते अच्छे रहते हैं


ना उम्मीदी कुफ़्र कहे हो लेकिन ऐ दुनिया वालों

जिसके साथ नही है कोई फिर कैसी उम्मीदे हैं


ग़ज़लें सुनने की आदत थी उससे मिलने से पहले

और उसी के ग़म-ए-हिज्राँ में अब हम ग़ज़लें कहते हैं


मेरे जैसा बनने की तुम ये जो चाहत रखते हो

लेकिन इसकी भरपाई में सारे सुख जा सकते हैं


          ~ अश्विनी यादव

मंगलवार, 20 मई 2025

नई ग़ज़ल

तुम्हारे बिना जाने कैसा रहूँगा
मैं जीता रहा भी तो कितना रहूँगा

मुझी पे अमर बेल लिपटी हुई है
नहीं हूँ हरा मैं सो सूखा रहूँगा

उदासी मुझे प्यार करने लगी है
इसी के सहारे मैं तन्हा रहूँगा

हो तुमको मुबारक ये रंगीन महफ़िल
मैं सादा जिया हूँ सो सादा रहूँगा

मुझे अब बुलाता है गंगा का पानी
मेरी जां मैं शाइर हूँ ज़िन्दा रहूँगा

कोई जब तुम्हें भी सताएगा ऐसे
इसी दर्द सा याद आता रहूँगा

मुझे दफ़्न कर दो तो अच्छा रहेगा
भला कब तलक मैं ये ढोता रहूँगा

    ~ अश्विनी यादव

गुरुवार, 20 अप्रैल 2023

हे मालिक

टिकटों की कालाबाज़ारी हे मालिक
अद्भुत तेरी सेवादारी हे मालिक

जन सेवक का चोला ओढ़े बैठे हो
अंदर से इतनी मक्कारी हे मालिक

हे मालिक ये कैसी तेरी माया है
फॉर्च्यूनर पर अटकी गाड़ी हे मालिक

सेवा करने आये थे जो नेतागण
मर्सडीज़ की करें सवारी हे मालिक

काम तुम्हारा देख के हैरत है हमको
गुंडे-लुच्चे रखते यारी हे मालिक

बाप बनाये शीश महल अपने खूँ से
बेटा बन बैठा व्यापारी हे मालिक

हाथ में गजरा- दारू लेकर बैठे हैं
अय्याशी की लगी बीमारी हे मालिक

मुँह में नोट दबाये ठुमका मार रहे
आपस में ही मारा-मारी हे मालिक

मज़दूर किसानों के वो सारे वादे
'चखना' भर की हिस्सेदारी हे मालिक

हर इक झंडा ढोने वाला क्यों न रोये
दल की ऐसी दुर्गति भारी हे मालिक

      ~ अश्विनी यादव

Note:- अदम गोंडवी साहब जी को पढ़ने के बाद प्रेरणा लेते हुए ये कविता। इसे किसी भी पार्टी से जोड़कर देखने वाले आहत न हों, ये मेरी लिखी जा रही एक किताब में से एक अंश है, जो कविता के रूप में है।

शनिवार, 11 फ़रवरी 2023

नज़्म – तुम्हें अब भूल जाना है

तुम्हें ग़र भूल जाऊँ तो
मुझे कुछ चैन आ जाये
वो ही सब बात मुझको याद
अभी तक आ रही हैं पर
मुझे क्या भूल जाना है
ये सब भी याद रखना है
यही सब याद रहने में
नहीं कुछ भूल पाता हूँ
मगर अब भी गुज़ारिश है
ख़ुदा मुझ पर रहम कर दे
कि उसको भूल जाने में
ज़रा मेरी मदद कर दे
ये मेरी साँस ले ले तू
ये मेरा होश भी ले लो
मेरी आँखें मिरा ये दिल
मेरा साया मेरा ये नाम
तुम्हें जो भी ज़रूरत हो
मेरे मौला तू सब ले ले
मगर दर्दे-निहाँ से अब
रिहाई भी अता कर दे

  ~ अश्विनी यादव

सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल

तुम्हारे दिल में भी तूफ़ाँ उठा है
हमें भी प्यार तुमसे हो चला है

किसी अय्यार जैसे हो गए हो
तुम्हारा नाम मुझको रट गया है

तुम्हारी बात भी अब टालने में
मुझे अब ख़ुद से लड़ना पड़ रहा है

अजब सी कश्मकश है ज़िन्दगी में
कि मेरा मैं ही मुझसे जा रहा है

अभी तक मैं यहाँ पर सो रहा हूँ
मगर पिंजड़े का पंछी उड़ गया है

     ~ अश्विनी यादव

शनिवार, 30 अप्रैल 2022

नज़्म ~ फिर युद्ध नहीं होंगे

कोई भी दीवार
नहीं रोक सकती
प्रेम, परिंदे, गीत

कोई भी युद्ध
नहीं ला सकता
शांति, सुकूँ, मुस्कान

हम ज़्यादा से ज़्यादा
बात करें
और प्रेम करें
तब यक़ीनन सदियों तक
कोई युद्ध नहीं होंगे।

~ अश्विनी यादव

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2022

नज़्म ~ ऐ तख़्तनशीं लोगों तुमने

ऐ तख़्तनशीं लोगों तुमने
ये कैसा मुल्क़ बना डाला
हर हिस्से में है जख़्म बहुत
हर शक़्ल पे मातम छाया है
कतरा कतरा खूँ बहता है
रेज़ा-रेज़ा सब मरते हैं
हर लम्हा इक डर रहता है
कोई साया जाने कहाँ से
आ धमके फिर खा ही जाए
हम डरते हैं सब डरते हैं
सबका डरना लाज़िम भी है
इन कमरों में चीख़ रही है
सच कहने वाली ख़ामोशी
सच सुन ने वाली इक आदत
सच लिखने वाले कुछ पागल
हैं ज़ब्त कहीं पर लोग यहाँ
कोई ख़ोजे आख़िर इनको
हाँ! इन लोगों में हिम्मत है
तोपों के आगे रख देंगें
कुछ गीत, कहानी, नज़्म, कलम
कुछ दीवारें पोती जायेंगीं
कुछ वादे लिक्खे जाएंगें
वो दहशत तोड़ी जाएगी
कुछ पुतले फूँके जाएँगें
ढपली पे राग बनेगी फिर
तब एक मशाल जलेगी फिर
जंजीरें, तलवारें, तोपें
ये सब गायब हो जायेंगीं
हम फिर से तब मुस्काएंगें
हम फिर से सच कह पायेंगें..

  ~ अश्विनी यादव

शनिवार, 12 फ़रवरी 2022

नज़्म

मैंने हर सम्त उसे चाहा है
बड़ी शिद्दत से
मुझको लगता है
वो मिल जाएगी
सच कहूँ तो
बड़ी तलब है मुझको
जाने किस रोज़ को
वो पास मेरे आएगी
उसे इस तरह से
चाह रहा हूँ अब तक
उस तक ख़बर ये आख़िर
कैसे जाएगी

~ अश्विनी यादव

शनिवार, 13 नवंबर 2021

ग़ज़ल

बंदगी रखिये भला क्या हर किसी से
सारे चेहरे लग रहे हैं मतलबी से

कब तलक नाराज़गी पर हम मनाएँ
आज रिश्ता तोड़ लो अपनी ख़ुशी से

आदमी ही आदमी का यार कब था
मिल रहे हैं लोग सबसे ज़्यादती से

ख़ुदकुशी बेहद बुरी है चीज़ प्यारे
शाइरी को भी मिलाओ ज़िन्दगी से

हो मुबारक तुमको ये रंगीन दुनिया
हमको लम्हें काटने हैं सादगी से
________________

  अश्विनी यादव

मंगलवार, 7 सितंबर 2021

ग़ज़ल ( अल्लमा इक़बाल को समर्पित )

आदम के खूँ का प्यासा ये कारवाँ हमारा
है नफ़रतों में डूबा सारा जहाँ हमारा

मर्ज़ी का हैं वो मालिक सुनता नहीं किसी की
सौदागरी में खोया है निगहबाँ हमारा

सर फोडकर हमारा कहता है देंगे चारा
क़ातिल ही अब बना है फिर पासबाँ हमारा

गंगा हो या कि यमुना रोती है दर्द अपना
बाक़ी कहाँ बचा है विरसे निशाँ हमारा

बस आपने दिल ही दिल में रोते हैं आज हम सब
मालूम क्या किसी को दर्द- ए -निहाँ हमारा

अहले वतन के लोगो करियेगा शुक्र उनका
जिनके लहू ने सींचा है सायबाँ हमारा

वो हैं मिटाने को अब जो नक्श थे ख़ुशी के
आओ बचाने ख़ातिर ये कहकशाँ हमारा

अहले-वतन के लोगों है जश्न भी ज़रूरी
लाखों की क़ब्र से बना ये गुलसिताँ हमारा

     ~ अश्विनी यादव

[ अल्लमा इक़बाल को सादर समर्पित ]

गुरुवार, 17 जून 2021

नज़्म ~ इंतज़ार में हैं

वो दिन भी जल्दी आएगा
हम इंतज़ार में हैं
इंतज़ार में हैं

हाँ उस दिन भी हम बोलेंगें
हम लड़कर सज़ा दिलवाएंगें
हिसाब हमारा बाक़ी है
हम बेकरार से हैं
इंतज़ार में हैं

आवाज उठेगी हक़ की जब
हर ज़िन्दा बुत से पूछेंगें
क्यों होने दिया ये ज़ुल्मों सितम
हम गुस्से के इज़हार में हैं
हम इंतज़ार में हैं

हर इक तमाशा ये जो है
किसने तराशा है इसको
हर उसका नक़ाब उतरेगा
ज़ब्त-ए-नफ़रत-ओ-दीवार में हैं
हम इंतज़ार में हैं

~ अश्विनी यादव

सोमवार, 18 जनवरी 2021

नज़्म ~ भूखा किसान

बारिश की बौछार
आ रही थी चूल्हे तक
रोटी पकी नहीं थी कि
चूल्हा बुझ गया
लेकिन घर के लोगों ने
और बारिश की चाह रखी,
भीगते -ठिठुरते लोग
अपने आप से ज़ियादह
थे अपनी माटी को सोच रहे..

सोच रहे थे
ये कपड़े तो
कल ही सूख जाएँगें
ये रोटी कल भी बन जाएगी
लेकिन,
ग़र बारिश रुकी
तो फसल नहीं
जो फ़सल नहीं
तो नस्ल नहीं..

    – अश्विनी यादव

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

ग़ज़ल ( political)

आज तुम्हारी हरक़त पर मैं थूक रहा
या'नी समझो आदत पर मैं थूक रहा

तुझ मक्कार पे दुनिया सारी थूकी थी
ओ झूठे तिरी फ़ितरत पर मैं थूक रहा

अँधियारे में ज़बरन चीज़ जली कोई
हद है ऐसी उजलत पर मैं थूक रहा

चीख़ें, मातम, आँसू, लाठी, बेचैनी
ज़ुल्मी तेरी चाहत पर मैं थूक रहा

सर कुचलोगे तो क्या चुप हो जाऊँ मैं
हिटलर तेरी बरक़त पर मैं थूक रहा

      ~ अश्विनी यादव