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सोमवार, 18 जनवरी 2021

नज़्म ~ भूखा किसान

बारिश की बौछार
आ रही थी चूल्हे तक
रोटी पकी नहीं थी कि
चूल्हा बुझ गया
लेकिन घर के लोगों ने
और बारिश की चाह रखी,
भीगते -ठिठुरते लोग
अपने आप से ज़ियादह
थे अपनी माटी को सोच रहे..

सोच रहे थे
ये कपड़े तो
कल ही सूख जाएँगें
ये रोटी कल भी बन जाएगी
लेकिन,
ग़र बारिश रुकी
तो फसल नहीं
जो फ़सल नहीं
तो नस्ल नहीं..

    – अश्विनी यादव

सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

मां पागल होती है

कोख में रखकर नौ माह हमको
हजारो दुःख सहती रहती है,

लात लगे, मिचली-चक्कर आये
सूरज से पहले जागी रहती है,

आम पेड़ सी अमरबेल से हमको
खुद घुटकर जिंदा रखती है,

डर हो नसें फटें भले हड्डियां टूटें
जां देने को आमदा रहती है,

चिमटा, बेलन, थाली, चाकू सब
चौके चूल्हे में उलझी रहती है,

दूध, दवाई, कपड़ा, मालिश को
भूले से न बिसराया करती है,

काजल, फुग्गा, लाड, लोरी संग
चांद सोये तो सोया करती है,

स्कूल टिफ़िन औ पांच रुपया दे
हमें यूं भी बहलाया करती है,

मेरी खुशी की ख़ातिर ही अम्मा
घरवालों से भी लड़ पड़ती है,

हम लाख बड़े हो जाये फिर भी
अक्सर  नहलाया  करती है,

गुस्सा करती है रोती है लेकिन
मेरे आंसू देख चुप करती है,

विधाता न मिला अबतक हमको
मुझे मां ही खुदा सी लगती है,

जब मां इतनी पागल सी होती है
तो पागल ही अच्छी लगती है,

अश्विन, मां शब्द अजर अमर है
शब्द में सृष्टि समायी रहती है,

        अश्विनी यादव
   महासचिव, उत्तर प्रदेश
राष्ट्रीय साहित्य चेतना मंच

रविवार, 18 जून 2017

पापा तुम सा कोई नही

अपने सपने तोड़कर जीना
हमारे ख्वाब जोड़कर जीना
ये जीना भी एक जीना है
खुद को यूँ भुला कर जीना
ऐसा कोई और कहाँ होगा
हाँ पापा जैसे तुम हो,

हमारे लिए इतनी डिग्रियां
इतनी पढ़ाई इतनी किताबें
कभी बस्ता कभी फ़ीस
कभी जूता तो कभी जुराबें
ऐसे सब मिलता कहाँ होगा,
हाँ पापा जैसे तुम हो,

    ― अश्विनी यादव