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सोमवार, 18 जनवरी 2021

नज़्म ~ भूखा किसान

बारिश की बौछार
आ रही थी चूल्हे तक
रोटी पकी नहीं थी कि
चूल्हा बुझ गया
लेकिन घर के लोगों ने
और बारिश की चाह रखी,
भीगते -ठिठुरते लोग
अपने आप से ज़ियादह
थे अपनी माटी को सोच रहे..

सोच रहे थे
ये कपड़े तो
कल ही सूख जाएँगें
ये रोटी कल भी बन जाएगी
लेकिन,
ग़र बारिश रुकी
तो फसल नहीं
जो फ़सल नहीं
तो नस्ल नहीं..

    – अश्विनी यादव

मंगलवार, 13 जून 2017

मैं किसान हूँ

मर जाने दो, उबर जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,
फ़सली ज़ख्म भर जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

गहरा आघात हुआ था मुझे
बिटिया के डोली का,
डोली न सही अर्थी जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

ईश्वर का कहर भी क्या खूब
कभी बरसता नही,
कभी बाढ़ में घर बह जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

बैंक वाले, सूददार, औ सरकार
जरा समझते ही नही,
मौत से ही तसल्ली हो जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

    ― अश्विनी यादव