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मंगलवार, 20 मई 2025

नई ग़ज़ल

तुम्हारे बिना जाने कैसा रहूँगा
मैं जीता रहा भी तो कितना रहूँगा

मुझी पे अमर बेल लिपटी हुई है
नहीं हूँ हरा मैं सो सूखा रहूँगा

उदासी मुझे प्यार करने लगी है
इसी के सहारे मैं तन्हा रहूँगा

हो तुमको मुबारक ये रंगीन महफ़िल
मैं सादा जिया हूँ सो सादा रहूँगा

मुझे अब बुलाता है गंगा का पानी
मेरी जां मैं शाइर हूँ ज़िन्दा रहूँगा

कोई जब तुम्हें भी सताएगा ऐसे
इसी दर्द सा याद आता रहूँगा

मुझे दफ़्न कर दो तो अच्छा रहेगा
भला कब तलक मैं ये ढोता रहूँगा

    ~ अश्विनी यादव

रविवार, 7 मई 2023

ग़ज़ल ( अच्छी हो )

उलझन में सुलझी अच्छी हो
नटखट प्यारी सी अच्छी हो

हाँ! तो पहले ये बतलाओ
ये तुम क्यूँ इतनी अच्छी हो

सूरत, सीरत, लहज़ा, बोली
ये कैसे पूरी अच्छी हो

तुम अच्छी हो ये दिखता है
पर सुनने में भी अच्छी हो

तुम एक परी सी आई हो
तुम कुछ ज़्यादा ही अच्छी हो

हैरत में है दुनिया सारी
तुम अच्छी से भी अच्छी हो

साथ निभाओ तो मैं मानूँ
ग़र सच में इतनी अच्छी हो

~ अश्विनी यादव

सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल

तुम्हारे दिल में भी तूफ़ाँ उठा है
हमें भी प्यार तुमसे हो चला है

किसी अय्यार जैसे हो गए हो
तुम्हारा नाम मुझको रट गया है

तुम्हारी बात भी अब टालने में
मुझे अब ख़ुद से लड़ना पड़ रहा है

अजब सी कश्मकश है ज़िन्दगी में
कि मेरा मैं ही मुझसे जा रहा है

अभी तक मैं यहाँ पर सो रहा हूँ
मगर पिंजड़े का पंछी उड़ गया है

     ~ अश्विनी यादव

शनिवार, 12 फ़रवरी 2022

नज़्म

मैंने हर सम्त उसे चाहा है
बड़ी शिद्दत से
मुझको लगता है
वो मिल जाएगी
सच कहूँ तो
बड़ी तलब है मुझको
जाने किस रोज़ को
वो पास मेरे आएगी
उसे इस तरह से
चाह रहा हूँ अब तक
उस तक ख़बर ये आख़िर
कैसे जाएगी

~ अश्विनी यादव

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

काश की तुम मिलने आती

कोहरे की पहरेदारी थी
काश की तुम मिलने आती,

सर्द रातों की दुश्वारी थी
काश की तुम समझ पाती,

भेज ही देती किसी तरह
यादों का गर्म बिछौना तुम,

प्रेम पाश के कम्बल को
ओढ़ा दी होती मुझपर तुम,

दिन चमकना भूल गया है
क्या इसकी भी साझेदारी थी,

काश की तुम मिलने आती
फिर कोहरे की पहरेदारी थी,

शिकायत भी न है कोई
गिला न हमसे रखना तुम,

हवाओ से कहा अकेले में
वो मुझसे कभी कहना तुम,

इन सड़कों पे दीद मेरी ये
ढूंढ रहीं हैं इक पहचाने को,

वो रस्ते बदल रहा देखो
अरे मिले न मुझ दीवाने को,

कतरा कतरा रात कटी
फ़ना होने की जिम्मेवारी थी,

कोहरे की पहरेदारी थी
काश की तुम मिलने आती,

( पंक्तियाँ :― अश्विनी यादव )


बुधवार, 2 अगस्त 2017

सब तुम्हारी कारस्तानी है

आखिर बात क्या है जरा बता दो न तुम,
नई बाग लगी है शहर में या आये हो तुम,
आखिर बात क्या.......

इतनी जमालियत हमने पहले देखी नहीं,
चांद पूरा है की चांदी में नहा आये हो तुम,
आखिर बात क्या.......

कोई पता तो करो ये शज़र ठहरा है क्यूं,
यकीं है महफ़िल में मुस्कुरा आये हो तुम,
आखिर बात क्या.......

जिस डगर पे गया करीब-ए-मर ही दिखे,
उस शहर में बेपर्दा घूम कर आये हो तुम,
आखिर बात क्या......

पुजारी मन्दिर नहीं मियां मस्ज़िद न गया,
जब से उनके हाल पूंछ कर आये हो तुम,
आखिर बात क्या......

            ― अश्विनी यादव

बुधवार, 3 मई 2017

तुम्ही सिखा दो

आख़िर हम क्या जाने प्यार वफ़ा,
और इसमें के हुये नुकसान नफ़ा,
हम ठहरे सीधे साधे है संसार के,
पर नाम हमारा काफ़ी है वार को,
इक तुम ही वाकिफ़ नही हो हमसे,
इक हम है जो सीख रहें है तुमसे,
चलो तुम ही सिखा दो वादे कसमें,
या आकर सिखा दो रिवाजे रस्में,
छोडो ये सब तुम से न हो पाएगा,
हमें सिखाने में ही प्यार हो जायेगा,

       ― अश्विनी यादव

      ( प्रशांत त्रिपाठी जी से प्रेरित )


सोमवार, 24 अप्रैल 2017

इश्क है या ख़्वाब

मुझे नही पता क्यूँ,
आज आसमां का नीलापन
और हल्के बादलों की सफेदी भी,
आज कुछ ज्यादा अच्छा लग रहा है
लेकिन पता नही क्यूं,
कनैर के फूल का पीलापन
और महकते गुलाब की गुलाबी भी,
आज कुछ ज्यादा अच्छा लग रहा है
लेकिन पता नही क्यूं,
समोसा औ चटनी का तीखापन
रस से भरी मीठी सी जलेबी भी,
आज कुछ ज्यादा अच्छा लग रहा है
लेकिन पता नही क्यूं,
सड़क जाम का उलझापन
और धूप में गाड़ी की खराबी भी,
आज कुछ ज्यादा अच्छा लग रहा है
लेकिन पता नही क्यूं,
नौकरी की बढ़ती जरूरतपन
उसपे ज्यादा की खरीदी भी,
आज कुछ ज्यादा अच्छा लग रहा है
लेकिन पता नही क्यूं,
दूसरे का हमसे झगड़नापन
और लड़खड़ाते हुए शराबी भी,
आज कुछ ज्यादा अच्छा लग रहा है
लेकिन पता नही क्यूं,
हाँ मुझे नही पता क्यूं,
बिल्कुल नही पता क्यूं......!!

बहुत सोचा, समझा और पाया कि―

आँख जरा सा बंद हुई तो
एक चेहरा नजर आ रहा,
जब भी सपने-ख्वाब दिखे तो
रंग में डूबा सजऱ छा रहा,
अब लगता है फिर जीने की
एक आस दिखाई पड़ती है,
हमे वो नाम तुम्हारा लगता है,
जो खास दिखाई पड़ती है,
डर लगता है कि तुमसे मैं
शायद कुछ न कह पाऊंगा,
तुम भी जरा हालात समझो
वरना बिन बोले रह जाऊंगा,
तुमसे चाहत इतनी गहरी है कि
जिंदगी अपनी उधार देंगें हम,
एक वादे और तेरी ख़ुशी वास्ते
सारी उम्र भी गुजार देंगें हम,

    ( कवि :― अश्विनी यादव )

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

तुम होती तो ऐसा होता

बडा गुमनाम हो गया हूँ बिछड़ कर तुमसे,
हर सुबह का मंजर क्या कहूँ कैसा होता,
शाम सुहानी हो जाती तेरा साथ पाकर के,
तुम होती तो ऐसा होता क्या कहूँ कैसा होता,//

ठंडी आने वाली होती जब जब भी,
तुम्हारे हाथ में ऊन का गोला होता,
हम चाय की चुस्की लेते पास बैठ के,
बगल में गर्म अलाव का शोला होता,
हम टहलते कोहरे में बातें करते करते,
हर लम्हा क्या कहूँ की कैसा होता,
सर्दियाँ इंतजार करवाती हमसे,
तुम होती तो ऐसा होता-वैसा होता,//

गर्मी के दिनों हम छत पर होते,
मै चाँद निहारता तो तुम्हे तराशता,
हाथ-हाथ ले और तुम्हारी बातों में,
मै खोता जाता और तुमको पाता,
भरी दोपहरी में तुम लस्सी बनाती,
तरबूज काटते क्या सोचूं कैसा होता,
धूप में छाँव चहूँ ओर हरियाली होती,
तुम होती तो ऐसा होता-वैसा होता,//

बारिशों में तुम्हारे हाथ के पकौड़े,
तीखी चटनी और करारी काफ़ी होती,
उस रिमझिम में भीगते खेल खेल में,
जरा मै सम्हलता तुम बहकती होती,
न जाने कब में दोनों को सर्दी होती,
काढ़ा बनाते क्या जानू कि कैसा होता,
बड़ी तसल्ली से रूह तक भिगो देता,
तुम होती तो ऐसा होता-वैसा होता,//

पतझड़ में बिखरी पत्तियाँ तुम्हारा,
इंतजार करती कुछ बेकरार होती,
पैरों से लिपटने आस-पास उड़ने को,
शाखों से भी वो तकरार कर लेती,
बागों का सरीखा मौसम ऐसा होता,
तुम होती तो ऐसा होता-वैसा होता,//

         ― अश्विनी यादव