कुल पेज दृश्य

aarjoo-e-ishq लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
aarjoo-e-ishq लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 20 मई 2017

पहले जैसा हो जायेगा

सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा
न तुम्हारे आने से कुछ रुका था,
न ही अब थम जायेगा,
सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा,

न सूरज का उगना रुकेगा,
न ही चंदा का आना,
न ही रुकेगी तारों की टिमटिम,
न हवाओ का इतराना,
न रुकेगी JIO की स्पीड,
और न IPL सीजन का आना,
न roadies का fever,
न तारक मेहता SAB पर आना,
ऐ काश कुछ बदलता जिंदगी में,
पर जब तुम थे सब वैसा रह जायेगा,
सुनो, सब पहले जैसा ही हो जायेगा,

हाँ शायद इतना फर्क पड़ा है मुझ पर
अब रातों में ख़ामोशी सी है,
दिन में छाया धुंधलापन है अब,
कुछ आदतें तुम डाली ही थी,
कुछ को तुमने बदला था तब,
उनमें से कुछ तो बदलेंगी,
कुछ फिर वैसे हो जाएंगी,
कुछ तो गिर कर सम्हलेंगी,
कुछ नई भी पड़ जाएंगी,
बस इतना जीवन में बदलेगा
बाकि फिर पहले जैसा हो जायेगा,
सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा,

            ― प्रशांत त्रिपाठी

बुधवार, 3 मई 2017

तुम्ही सिखा दो

आख़िर हम क्या जाने प्यार वफ़ा,
और इसमें के हुये नुकसान नफ़ा,
हम ठहरे सीधे साधे है संसार के,
पर नाम हमारा काफ़ी है वार को,
इक तुम ही वाकिफ़ नही हो हमसे,
इक हम है जो सीख रहें है तुमसे,
चलो तुम ही सिखा दो वादे कसमें,
या आकर सिखा दो रिवाजे रस्में,
छोडो ये सब तुम से न हो पाएगा,
हमें सिखाने में ही प्यार हो जायेगा,

       ― अश्विनी यादव

      ( प्रशांत त्रिपाठी जी से प्रेरित )


सोमवार, 24 अप्रैल 2017

इश्क है या ख़्वाब

मुझे नही पता क्यूँ,
आज आसमां का नीलापन
और हल्के बादलों की सफेदी भी,
आज कुछ ज्यादा अच्छा लग रहा है
लेकिन पता नही क्यूं,
कनैर के फूल का पीलापन
और महकते गुलाब की गुलाबी भी,
आज कुछ ज्यादा अच्छा लग रहा है
लेकिन पता नही क्यूं,
समोसा औ चटनी का तीखापन
रस से भरी मीठी सी जलेबी भी,
आज कुछ ज्यादा अच्छा लग रहा है
लेकिन पता नही क्यूं,
सड़क जाम का उलझापन
और धूप में गाड़ी की खराबी भी,
आज कुछ ज्यादा अच्छा लग रहा है
लेकिन पता नही क्यूं,
नौकरी की बढ़ती जरूरतपन
उसपे ज्यादा की खरीदी भी,
आज कुछ ज्यादा अच्छा लग रहा है
लेकिन पता नही क्यूं,
दूसरे का हमसे झगड़नापन
और लड़खड़ाते हुए शराबी भी,
आज कुछ ज्यादा अच्छा लग रहा है
लेकिन पता नही क्यूं,
हाँ मुझे नही पता क्यूं,
बिल्कुल नही पता क्यूं......!!

बहुत सोचा, समझा और पाया कि―

आँख जरा सा बंद हुई तो
एक चेहरा नजर आ रहा,
जब भी सपने-ख्वाब दिखे तो
रंग में डूबा सजऱ छा रहा,
अब लगता है फिर जीने की
एक आस दिखाई पड़ती है,
हमे वो नाम तुम्हारा लगता है,
जो खास दिखाई पड़ती है,
डर लगता है कि तुमसे मैं
शायद कुछ न कह पाऊंगा,
तुम भी जरा हालात समझो
वरना बिन बोले रह जाऊंगा,
तुमसे चाहत इतनी गहरी है कि
जिंदगी अपनी उधार देंगें हम,
एक वादे और तेरी ख़ुशी वास्ते
सारी उम्र भी गुजार देंगें हम,

    ( कवि :― अश्विनी यादव )

गुरुवार, 26 मई 2016

तेरी-मेरी कहानी

नाम तेरा हम लिखते मिटाते रहे
तुझे झरोखों से देख मुस्कुराते रहे
चर्चा कालेज में थी हूँ मै आशिक तेरा
वो भाभी है तेरी हम समझाते रहे
एक तेरे चक्कर में कितने लफड़े हुए
अपने हमयार भी नजरे चुराने लगे
बस तुझे छोड़ सबको थी ये खबर
क्यूँ तेरे नाम पे लुटने-लुटाने लगे
यूँ दिलकशी में पढाई चौपट हो रही
ध्यान तेरे सिवा और कुछ भी न था
कह न पाया कभी तुमसे दिल की बात
और तुम हँसकर सबसे बतियाते रहे
मै आंवारा न होऊ सो शहर आ गया
पूरा शहर परियो की बगिया लगी
भूलने लगा तुम्हे तितलियों में रहकर
जिम्मेदारी पढाई की बढने लगी
बीच में जब भी घर आना हुआ
तुम हमे देखकर शरमाने लगे
एक साल न गुजरे तेरी शादी हो गई
आज अफसर हो हम भी कमाने लगे
फिर भी अफ़सोस है उस अधूरेपन का
जिसे ख़यालों में हम गुनगुनाते रहे
मेरे यारों को उनकी वो भाभी न मिली
जिन्हें हम "जान" कहके बुलाते रहे...

कवि- अश्विनी यादव