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बुधवार, 3 मई 2017

तुम्ही सिखा दो

आख़िर हम क्या जाने प्यार वफ़ा,
और इसमें के हुये नुकसान नफ़ा,
हम ठहरे सीधे साधे है संसार के,
पर नाम हमारा काफ़ी है वार को,
इक तुम ही वाकिफ़ नही हो हमसे,
इक हम है जो सीख रहें है तुमसे,
चलो तुम ही सिखा दो वादे कसमें,
या आकर सिखा दो रिवाजे रस्में,
छोडो ये सब तुम से न हो पाएगा,
हमें सिखाने में ही प्यार हो जायेगा,

       ― अश्विनी यादव

      ( प्रशांत त्रिपाठी जी से प्रेरित )


मंगलवार, 2 मई 2017

लौट मत आना

गर तुम्हें छोड़कर जाना है तो शौक से जाओ
पर ख्याल रहे तुम फिर कभी लौट मत आना,
कोई शिकवा शिकायत हो तो सुना के जाओ
तुम बात नई लेके फिर कभी लौट मत आना,
हमें भुला दो,  अपने भुला दो,  और ये शहर
पर रिश्ता कोई जोड़कर कभी लौट मत आना,
होगा ताज़्जुब  जरा सा लोगों और खुदा को
पर हमारी  लाज रखने कभी लौट मत आना,
कोई उम्मीद नहीं  पर एक वादा करते आओ
न ज़िक्र करना, न फ़िक्र करना, न याद करना,
     
         ― अश्विनी यादव

गुरुवार, 26 मई 2016

तेरी-मेरी कहानी

नाम तेरा हम लिखते मिटाते रहे
तुझे झरोखों से देख मुस्कुराते रहे
चर्चा कालेज में थी हूँ मै आशिक तेरा
वो भाभी है तेरी हम समझाते रहे
एक तेरे चक्कर में कितने लफड़े हुए
अपने हमयार भी नजरे चुराने लगे
बस तुझे छोड़ सबको थी ये खबर
क्यूँ तेरे नाम पे लुटने-लुटाने लगे
यूँ दिलकशी में पढाई चौपट हो रही
ध्यान तेरे सिवा और कुछ भी न था
कह न पाया कभी तुमसे दिल की बात
और तुम हँसकर सबसे बतियाते रहे
मै आंवारा न होऊ सो शहर आ गया
पूरा शहर परियो की बगिया लगी
भूलने लगा तुम्हे तितलियों में रहकर
जिम्मेदारी पढाई की बढने लगी
बीच में जब भी घर आना हुआ
तुम हमे देखकर शरमाने लगे
एक साल न गुजरे तेरी शादी हो गई
आज अफसर हो हम भी कमाने लगे
फिर भी अफ़सोस है उस अधूरेपन का
जिसे ख़यालों में हम गुनगुनाते रहे
मेरे यारों को उनकी वो भाभी न मिली
जिन्हें हम "जान" कहके बुलाते रहे...

कवि- अश्विनी यादव