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मंगलवार, 13 जुलाई 2021

भारत भूषण पंत ( जीवनी )

भारत भूषण पंत का जन्म 3 जून 1958 को हुआ था। उनकी जिंदगी का लंबा हिस्सा बल्कि यूं कहें कि पूरी जिंदगी ही लखनऊ में बीती। उनकी जिंदगी भी दर्द से भरी हुई थी, जब वे बड़े हो रहे थे तो उन्हीं दिनों उन्होंने अपने पिता को बीमारी से जूझते हुए मौत का सफ़र तय करने का हादसा देखा। पिताजी तो चल बसे लेकिन उसके बाद ऐसा लगता रहा कि भारत भूषण पंत कहीं तिल तिल कर अपनी जिंदगी को ख़त्म करते रहे।
बाद में उनकी पत्नी उनका सहारा बनीं लेकिन उन्हें भी कैंसर हो गया और 2014 में वे भी इस दुनिया से विदा हो गयीं। पत्नी के देहांत के बाद पंत जी बिल्कुल अकेले रह गए।काॅपरेटिव की नौकरी से स्वैच्छिक सेवनिवृत्ति उन्होंने पहले ही ले ली थी। उनकी जिंदगी अकेलेपन का शिकार हो गयी।
और बीमारी के कारण 11 नवम्बर 2019 को विवेकानंद हॉस्पिटल, लखनऊ में अंतिम साँस ली।
दबिस्तान ए लखनऊ की फेहरिस्त में अगर आज़ादी के बाद शायरों को देखें तो भारत भूषण पंत का नाम बड़ी संजीदगी से लिया जाता है। ख़ास बात ये है कि बात यह है कि मुनव्वर राना,ख़ुशबीर शाद और पंत साहब इत्तेफ़ाक से तीनों ही वाली आसी साहब के शागिर्द थे। मुनव्वर साहब ख़ुद भी मानते हैं कि उनके उस्ताद भाइयों में पंत जी से बढ़िया शेर कोई नहीं कहता था।
दो दिनों की ज़िन्दगानी कुफ्र क्या इस्लाम क्या
एक दिन काबे में सजदा, बुत-परस्ती एक दिन

पंत साहब को बेचेहरगी से इस हद तक लगाव था कि उनकी मजमुआ इसी नाम से साये हुआ था । 'तन्हाइयाँ कहती हैं', 'यूँ ही चुपचाप गुज़र जा (1995), और 'कोशिश' (1988) ज़रिए उनके कलाम से वाबस्ता हुआ जा सकता है। उनके उस्ताद भाई मुनव्वर राणा का यह बयान ज़ेरे गौर है कि " भारत भूषण ने अपनी शायरी को हमेशा सिसकियों की छत्रछाया में रखा है, किसी भी लफ्ज़ को चीख नहीं बनने दिया। अपनी हर ग़ज़ल में वो अपने दुखों से खेलते दिखाई देते हैं "
दरअसल पंत जी शायरी में बहुत सी चीज़ें मिलेंगी जैसे ज़बान की मिठास, फ़िक्र का लबादा, नए मौज़ूआत, तख़लीकी अमल, नए नए इस्तिआरे, ग़ालिब और मीर के अलावा जिगर मुरादाबादी, शकेब जलाली, सलीम अहमद की मक़बूल ज़मीनों पर ग़ज़ल कहने का हुनर से लेकर और भी बहुत सारी बातें।
किताबें :- 1 बेचेहरगी
              2 तन्हाईयाँ कहती हैं
              3 कुछ मज़ामी ग़ैब से ( पब्लिश होने वाली है )
   भारत भूषण पंत ने फिल्मी दुनिया को भी अपनी कलम से नवाज़ा है। पूजा भट्ट की फिल्म "धोखा" के लिए उन्होने अपने उस्ताद भाई खुशबीर सिंह शाद के साथ मिलकर गीत लिखे हैं तो मशहूर गायिका कविता सेठ के प्राइवेट अल्बम के लिए भी गीत लिखे हैं। आने वाले दिनों में हमें उनके गीतों से सजी कुछ और फिल्में देखने को मिल सकती हैं.
   आपने बहुत सारे नाटकों के लिए भी गीत लिखे हैं।
उर्दू शाइरी के लिए सुप्रसिद्ध बेवसाइट rekhta पर भी उन्हें पढ़ा जा सकता है, [1]
https://www.rekhta.org/poets/bharat-bhushan-pant/all?lang=hi
शाइरी की एक और प्रसिद्ध बेवसाइट कविताकोश पर भी पढ़ सकते हैं, [2]
http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%B7%E0%A4%A3_%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A4

खबरों में भारत भूषण पन्त
     [3]

[4] [5] [6]




शुक्रवार, 5 जून 2020

क़िस्से भारत भूषण पन्त के

मैं और भारत भूषण पन्त दादा
_______________________
      भारत दादा का एक शे'र जिसे पढ़ने में, कहने में लगभग हर बार मैं ग़लती कर देता था.....

"क़रीब आती हर एक शय ने मेरा नज़रिया बदल दिया है
मैं जिसके पीछे पड़ा हुआ था उसी से पीछा छुड़ा रहा हूँ,,

लेकिन अब याद है। हाँ तो शे'र को जब उन्होंने मेरे लिए पढ़ा तो मैं बस मुस्कुरा ही पाया और मुँह से इतना निकला कि "अरे यार दादा आप के पास होना ही मेरी कमाई है और मेरी ज़िंदगी का ये मुक़ाम है कि आप मुझे शे'र सुना रहे हैं वो भी बगल बैठाकर,,और फिर वो मुस्कुरा दिए।वो अपनी सफेद दाढ़ी -मूँछ के बीच में वो ही हल्की सी एक इंच मुस्कान लिए जब बोलते थे तो बहुत अच्छा लगता था।❤️

लेकिन उनके जाने के बाद मैंने देखा कि दो तरह के लोग सामने आए... एक तो वो जिनमें झूठे लोगों की बाढ़ सी आ गयी जैसे उन लोगों के लिए दादा के गुज़रने के कुछ दिन बाद ही एक ग़ज़ल कही थी जिसके शे'र कुछ यूँ है...

"मर जाते ही दुनिया को ख़ूबी दिखती है
बदल रहे हैं क़िस्से भी बतलाने वाले,,

दूसरे वो लोग भूल गए, जब तक ज़िन्दा थे तब तक अरे दादा ये अरे दादा वो , दादा आप महान हो ब्ला ब्ला....करके पोस्ट पर दीमक की तरह लगे रहते थे, और सबके सामने कहते थे कि दादा मैंने शाइरी के असली मानी तो आपसे ही सीखे हैं लेकिन अब वो ही उनके जाने के बाद एक पोस्ट तक नही कर पाए थे जन्मदिन पर या कोई और भी दिन पर...... ऐसे बहुत से नाम हैं क्या ही अब बेइज़्ज़त करूँ।

ये लो दादा का ही शे'र....

"मुनहसिर इतना लिबासों पर है मेरी शख़्सियत
    हर किसी के सामने नंगा ही कर देगी मुझे,,

ख़ैर अब मेरे पोस्ट करने का कोई फ़ायदा नही होना है और उन दो कौड़ी के लोगों को कोई फ़र्क़ ही पड़ने वाला है। सो ये शे'र दादा का.....

इस बार तुम्हारे रोने पर कुछ लोग चले आये लेकिन,
हर बार कहाँ ये मुमकिन है हर बार कहाँ से लाओगे

मंगलवार, 2 जून 2020

जन्मोत्सव भारत भूषण पन्त दादा का

जन्मदिन की बधाई दादा
______________________
        हाँ मैंने अपनी पढ़ाई -लिखाई के समय में से थोड़ा सा कीमती समय एक जगह पर ख़र्च किया था वो भी किसी शायर के सानिध्य के लिये, वैसे तो जुड़ाव शायर होने की वजह से हुआ था लेकिन बाद मुझे दादा और बच्चे जैसी मुहब्बत का एहसास होने लगा सो समय बीच बीच में ख़र्च होता गया। मैं इस दावे से कह सकता हूँ आज यानी 3 जून 2020 से पहले के क़रीब 3 साल मैंने केवल पढ़ाई पर दिए लेकिन इसी बीच में एक ऐसे महान शख़्सियत का इतने क़रीब आना और रिश्ते में जुड़ जाना नाम देना और फिर चले जाना...... वाक़ई में मेरी ज़िन्दगी के बदलाव का सबसे शानदार तथा दुःखद पलों का मेला था।
      
          एकदम ग़ज़ब का मेला था शुरुआत में सारी दुकानें एकदम बेहतरीन लगीं, फिर चलते चलते एक साथी कहीं खो गया अब मुझे पूरे मेले को पार करना होगा और फिर मेले के दूसरे छोर पर हम दोनों मिलेंगें जहाँ पर मिलने का वादा किया गया है। मुझे यक़ीन हैं कि आप मेरे काम की बहुत सारी चीज़ें सँजोये होगे उस पार। लेकिन तब तक मैं पूरे मेले में आपके क़िस्से सुनाता रहूँगा🙏
  
          स्वर्गीय श्री भारत भूषण पन्त जी का जन्मदिन यानी मेरी शाइरी के लिए भी एक अहम दिन, वैसे आपने मुझे शाइरी तो नहीं सिखाई लेकिन जो तजुर्बा दिया है मुहब्बत दिया है और जाने का ग़म दिया है न वो मेरी शाइरी की जान है। वो दर्द, मुहब्बत और तन्हाई को महसूस करने का रंग ही मेरी शाइरी को वजूद देता है। आपको पढ़ने के बाद दुनिया को देखने का नज़रिया बदल जाता है......एक अलग ही बात है आप में।
वैसे तो आप ग़ालिब के दीवाने थे, उन्हीं की ज़मीन पर बहुत ग़ज़लें कही है आपने लेकिन मैं आपके ग़ैरमौजूदगी में भी कहता हूँ कि मेरे ख़ातिर आप 'ग़ालिब से पहले हो'। मैंने बहुत ज़ियादः तो नहीं पढ़ा है लोगों को लेकिन जितना भी पढ़ा है कोई भी आप जितना महसूस नही हुआ है।

        आपने मुझे धीरेन्द्र सिंह 'फ़ैयाज़' जैसे बड़े शायर को भाई के रूप में भेंट किया। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पूछने पर आपने कहा कि मेरा बच्चा है, बड़ा प्यारा बच्चा है, शाइरी सीख रहा है...एक दिन नाम करेगा...अच्छा लिखता है अभी भी। अब क्या ही कहूँ दादा कि आपने क्या क्या नही दिया क्या क्या दे दिया...बहुत कुछ है।

       मैं विस्मृता लेकर आ रहा हूँ जल्द ही और उस दिन जो आपके सामने कहा था वो ही मेरा मक़सद रहेगा, आप वहाँ जन्नत से देखिएगा कि आपका बच्चा इस देश भर में कैसे नाम रौशन करता है🙏

सब कहते हैं तू वापिस आ जा घर अपने,
कब आये हैं राह-ए-जन्नत जाने वाले....

दादा आपको जन्मदिन की दिल से मुबारकबाद, आप शाइरी में ज़िन्दा हो बस ये ही आपके इस दुनिया में होने का निशाँ है।
________________________
  अश्विनी यादव​​ 

रविवार, 10 मई 2020

सफ़र विस्मृता का (भाग 1)

"दरिया ने भी तरसाया है प्यासों को
दरिया को भी प्यासा कर के देखा जाए,,

ये शे'र पढ़िए अब नाम याद कर लीजिए ऐसी शाइरी केवल Bharat Bhushan Pant दादा की हो सकती है। ये नाम ही शाइरी है।

हाँ तो ये शे'र पढ़कर याद आया मुझे जब मैं दादा से मिलने गया था पहली बार तो मैं "विस्मृता" की नींव रख रहा था। दादा ने बहुत से नाम बताए जिनसे मुझे सीखने को मिल सकता है.... मैं एक एक करके सबसे जुड़ गया। फिर कुछ लोगों से अच्छे से कनेक्ट हो गया "भैया" ही थे सब के सब। साइट आई जो कि मैगज़ीन थी... पहली मैगजीन को सेलेक्ट करने के लिए एक व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया था और लोगों द्वारा भेजने के लिए एक नम्बर जारी  किया था। हाँ तो किसी तरह सबकी रचनाएँ चूज़ करके डाल दी पब्लिश हो गयी। मेम्बर्स की भी ग़ज़लें थीं उसमें। चार दिन बाद अगले एडिशन के लिए सब ठंडे पड़ गए केवल मुझे छोड़कर....... अब लोग ग्रुप में रिप्लाई नही करते थे मैं मूर्ख की तरह भैया -भैया करके लगा रहता था।  मेरी हमेशा से आदत रही है कि जिसे सम्मान दो प्यार दो सर -आँखों पर रखो नही तो औरों की तरह ही रखो, इसी का सबने नाजायज़ फ़ायदा उठाया था। जिसने जब जिस भी चीज़ के लिए कहा था मैंने हमेशा मदद की थी लेकिन उन्होंने मेरी कद्र नही की।और कुछ दिन बाद मैं परेशान होकर साइट को रोक दिया। फिर मैं और मेरे दो छोटे भाई Gyanendra Yadav , Abhishek Ramsey Singh ने अपने आप को और कड़े संघर्ष के लिए तैयार किया।
क्योंकि जब लोग साथ छोड़ देते हैं तो आप और भी मजबूत बनते हैं ऐसा सुना था लेकिन हमने सच मे ऐसा किया है। हमने उसे नए तरीक़े से लाने की कोशिश की जिस सफर में एक बड़े भी मिले जिनका मार्गदर्शन बहुत अच्छा रहा और प्यार भी काफी मिला... मैंने शाइरी में भी काफी ठीक ठाक कर लिया है ख़ुद को। लेकिन उनके बिजी रहने के कारण मैं साइट को उनके भरोसे ऐसे तरह का नही बना सकता था कि उन्हीं पर सब डिपेंड रहे क्योंकि ये मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट है और इसको कभी मैं डूबता देखूँ ये बहुत दुःख की बात होगी मेरे लिए।  और फिर हमने बहुत मेहनत के बाद एक प्रारूप को चुना जिसमें मन की सारी बात तो नही पूरी हो पाई है लेकिन काफी हद तक चीज़ें डाल दिया हूँ।

         अरे हाँ तो इसी सफ़र में मेरे बड़े भाई Mayank Yadav जी का पूरा सपोर्ट रहा है शुरुअ से ही। एक और प्यारे भाई B Krishna ने हमें जॉइन करके हमारे जोश को आकाश पर चढ़ा दिया। इसी बीच में Pushp Raj Yadav भाई ने भी हमारे मुहब्बती परिवार को जॉइन करके हमारा मान बढ़ाया।

मुझे कोई दुःख नही है कि बड़े शायरों ने, लेखकों ने ज़रा भी मेरा सपोर्ट नही किया । वो मुझसे अपना नाम जुड़ने से बचाते हैं ख़ुद को, लेकिन मुझे फ़र्क़ नही पड़ता है क्योंकि अब तो....

"आया है वो मक़ाम भी उल्फत की राह में,
कहना पड़ा है कि अब तुझे नही चाहता हूँ मैं,,

       अब लगभग हम लोग आख़िरी पड़ाव पर आ गए हैं साइट को लॉन्च करने के। ये एक ट्रेलर मात्र है बाक़ी के कारनामे तो दूसरे वर्जन में अपडेट करने बाद दिखेंगें।

"क़रीब आती हर एक शय ने मिरा नज़रिया बदल दिया है
मैं जिस के पीछे पड़ा हुआ था उसी से पीछा छुड़ा रहा हूँ,

वो रब्त-ए-बाहम नहीं है लेकिन अभी भी रिश्ता बना हुआ है
वो मुझ से दूरी बढ़ा रहा है मैं उस से क़ुर्बत घटा रहा हूँ,,

जिन्होंने हमें छोड़ दिया उनका तो सबसे पहले शुक्रिया🙏, जो साथ हैं उन सभी को मुहब्बतें❤️ और जो जुड़ेंगें उनका स्वागत 💐है।
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सारे के सारे शे'र भारत दादा जी के ही हैं। वो तो अब नही रहे लेकिन उनका आशीर्वाद साथ है। मैंने उनसे जो वादा किया था वो पूरा करूँगा ज़रूर।
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  अश्विनी यादव

बुधवार, 23 मई 2018

दो शाइर

दो बहुत बड़े शाइरों के बड़े शानदार शे'र जो आज के लिए है.......

वो दर्द भरी   चीख़  मैं भूला नहीं अब तक,
कहता था कोई बुत मुझे पत्थर से निकालो,
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भारत भूषण पन्त

इश्क़ महज़ दो लोगों में हो जाता 'है'
बीच में लेकिन पूरी दुनिया होती 'है'
عشق محض دو لوگوں میں ہو جاتا ہے
بیچ میں لیکن پوری دنیا ہوتی ہے
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फ़ैयाज़ فیاض

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

दादा श्री भरत भूषण पंत 'Dada Bharat Bhusan Pant Ji'

एक दफ़ा तो ऐसा लगा की साँस ही रुक जाएगी,
दिल में अदबो―ख़ुशी इससे कम न होनी चाहिए,

लबों की कंपकंपी से लगा जीभ ही कट जाएगी,
ये प्यार का बरसात कभी खतम न होनी चाहिए,

बादल से आसमां में लगा चांदनी भी छुप जाएगी,
बस फिजाओं में अना कभी कम न होनी चाहिए,

ख़जाना लूटने में लगा की उमर ही लग जाएगी,
ऐ ख़ुदा कोहिनूरे-चमक भी कम न होनी चाहिए,

      ......मैं जब से जुड़ा बस पढ़ता रहा हूँ और इतना सीख रहा हूँ की कदमों के निशाँ मिटने न पाये इससे पहले ही उस पथ पर अग्रसर हो जाया जाये....
बैंक जैसी जोड़-गुणा-गणित वाली जगह से मैनेजर रहते हुए शायरी करना वाकई बहुत ही अलग अंदाज रहा है.....कई किताबें, ढेर सारे सम्मान, अवार्ड....और हल्की सी वो सफ़ेद दाढ़ी। गोल्डन चश्मा, बिल्कुल सफ़ेद कुर्ता-पैजामा.....समझाते हुए वो आवाज.....जो मुझे टोंक नही रही थी और अपनी बात भी कर रही थी। ये दादा श्री भारत भूषण पंत जी की आवाज है....ये सलीका उन्ही पर जंच रहा था।
मैनें एक पत्रकार की तरह दादा से सब पूंछा....एक बच्चे की उत्सुकतावश अपने लिए सारी बात की....साहित्य के बारे में जानकारी ली...अपने कैरियर के बारे में सलाह ली हमने। अपने नये कार्यों के शुभारम्भ के लिए आशीर्वाद भी बटोर लिया।

     बेहद शालीन शांत सौम्य व्यक्तित्व के धनी इस दौर के बेहतरीन शायरों में से एक श्री भरत भूषण जी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.....मैं अश्विनी, और साथ में भाई निलेश शर्मा जी "मि0 इरिटेटिंग" को सुअवसर मिला।
हम दोनों की ये कई दिनों से ये लालसा थी की इस छत्ते से शहद निकाल लिया जाये.....यकीन मानिये हम और भी
  ''शहद चुरा लेते आपके मधुकोष से,
      पर व्यस्तता की मक्खी का डंक लग गया,,
बेवसाइट विस्मृता 'vismtrita' के लिए मार्गदर्शन और शुभाशीष भी लिया,

          ― अश्विनी यादव