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रविवार, 22 दिसंबर 2019

तू झूठा है झूठों का क्या

यूँ ज़हर सदा उगलेगा क्या..?
अब राह नही बदलेगा क्या..?

गिरने से पहले जनता का,
तू हाथ कभी पकड़ेगा क्या..?

तू बनता है मज़लूम सदा,
सो दर्द मिरा समझेगा क्या..?

तुझसे कोई उम्मीद नही,
तू झूठा है झूठों का क्या..?

जब तू इंसान नहीं है तब,
डर ईश्वर का रक्खेगा क्या..?

चन्दन वन से इस भारत को,
तू विषधर है छोड़ेगा क्या..?

वादा झूठा, बातें झूठी,
गंगा की लाज रखेगा क्या..?

रोहित और नज़ीब कहाँ हैं ?
चीख़- पुकार सुनेगा क्या,

हिन्दू -हिन्दू रटता है तू,
कमलेश के घर पे कहेगा क्या..?

भात बिना इक मरती बिटिया,
लाशों से देश बनेगा क्या..?

तुझको क्या लगता है ज़ालिम,
सदियों तक राज चलेगा क्या..?

देश बँटा है लोग बँटे हैं,
पागलपन ही चाहेगा क्या..?

तू दुनिया से ऊपर का है,
सब लम्बी ही फेंकेगा क्या..?

इक दिन मोहब्बत का पौधा,
बाग-ए-नफ़रत में उगेगा क्या..?
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अश्विनी यादव

शनिवार, 7 दिसंबर 2019

नई ग़ज़ल

ज़िन्दा रहते दिल का दर्द सुनाने वाले
कितने अच्छे होते हैं मर जाने वाले

मर जाते ही दुनिया को खूबी दिखती है
बदल रहें हैं किस्से भी बतलाने वाले

एक शजर ने वीराने में उम्र गुजारी
सूख गया तो आए उसे गिराने वाले

अंगारों को पार किया तब मर्कज़ आया
 कितने हैं मुझ ऐसे पैर जलाने वाले

इक दरिया सैलाब बना तो आफत आई
अब तक जाने कहां थे बांध बनाने वाले

ये दुनिया केवल मतलब से ही साथ रही
देखो फूँक रहे हैं प्यार जताने वाले

सब कहते हैं तू वापिस आ जा घर अपने
कब आयें हैं राह-ए-जन्नत जाने वाले

हाँ! मैं पागल हूँ, शायर हूँ, दूर रहो तुम
थक कर मुझसे हार गए समझाने वाले

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  अश्विनी यादव


बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल

ज़ुल्म के नाख़ून पैने हो गए हैं,
यार अब तो जान की बाज़ी लगी है,

चुन रहें हैं बलि दिया जाए कहाँ पर,
और अब सरकार भी राजी लगी है,

हम भला आदम समझ बैठे थे जिसको,
जात भी उसकी वहीं दागी लगी है,
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  अश्विनी यादव​​ 

गुरुवार, 26 सितंबर 2019

एक कुँआ था

एक कुँआ था
सड़क के इस पार
एक बस्ती थी
सड़क के उस पार
कुँआ पक्का था
सड़क कच्ची थी
बस्ती में हंसी-ख़ुशी
दोनों बहुत सस्ती थी
कुँआ और बस्ती दोनों
इक-दूजे के साथी थे
पर कब तलक
ऐसा समर्पण रहता
एक दिन कुँआ
ख़ा गया आधी बस्ती को
सड़क के उस पार
लाशों पर गिरते आँसू
चीख़ों का मातम
लाचारी, बेबसी फ़ैली थी
सड़क के इस पर
कुँआ जाने क्यूँ चुप था
बेहाल रोने वालों को
किसी ने पानी पिला दिया
कुछ चीख़ें कम हो गयी
कुछ लाशें और बढ़ गयी
तब ये बात उठी
शायद कुँए में ज़हर है
इत्तला करने से पहले
थाने से आए कुछ लोग
सुनी -सुनाई कुछ भी नही
बस बचऊ को घसीट ले गए
शायद वो आये थे इसीलिए
बस्ती की आवाज़ ले जाने
बचऊ को दोषी कहा
जीभ पर लात रखकर मारा
ताकि कोई आवाज़
फिर उठ न सके
कोई "जमींदार" के ख़िलाफ़
कुछ कह न सके
अच्छा! ये माज़रा था सब
कुछ दिन पहले ही जब
जमींदार के लड़के ने
बस्ती की बच्ची नोंची थी
इन ठण्डे ख़ून वालों ने
कुछ दो चार थप्पड़ मारे थे
आज़ उसी का नतीज़ा है
लाशें, आँसू, लात, लाठी,
मातम के साथ वापस हुआ
अब इसका बदला भी
ले पाना ही मुश्किल है
ख़ून ठंडा था, है और रहेगा
काश! कोई उठ पाता
इतनी हिम्मत लेकर
छाती चीर देता जमींदार की
और लिख देता
"गर्म ख़ून की कहानी,,
पुलिस लाठी मार रही
ज़हर से ज़मीदार
बस्ती श्मसान हो गयी
सोती है सरकार....।।

    ― अश्विनी यादव

बुधवार, 25 सितंबर 2019

नज़्म (दुआएँ )

( घर के बच्चों के लिए दुआएँ )

नज़्म
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ओ मेरी नन्ही हथेली
तुम मेरी उँगली पकड़ो
कोशिश करो चलने की
अपने कदम आधे कर लूँगा
लेकिन तुम्हारे साथ चलूँगा
तुम बिना भय के चलो
मैं तुम्हें सम्हाल लूँगा
तुम्हारे छोटे छोटे होंठ
जब मुझे बुलाते हैं
बड़े प्यार से
सच कहूँ तो लगता है
ज़िन्दगी बस यहीं रुकी रहे
हम साथ चलते रहें
तुम बोलो बिना रुके 
मैं सुनता रहूँ, बस सुनता रहूँ....
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  अश्विनी यादव

शनिवार, 21 सितंबर 2019

ग़ज़ल

सब कहते हैं ऐसा होता आया है
यार कहानी में राँझा भी मरता है

हीर कहाँ बचने वाली ही थी पहले
दर्द भरा इतिहास हमारा कहता है

उस पत्थर को आख़िर कैसे बतलाऊँ
इक दरिया मेरी आँखों में रहता है

दिल के अरमां टुकड़ों में बँट जाते हैं
तब जाकर आँसू का रस्ता बनता है

दुनिया कहती ज़िन्दा रहते मौत जिसे
हम भी देखें इसमें क्या -क्या दुखता है

चाहत, राहत, धोखा, मातम, बेचैनी
मेरे हिस्से में आख़िर क्या मिलता है

हुस्न भला क्या चीज़ मुहब्बत के आगे
दिन बदले तो ये भी रोज़ बदलता है

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  अश्विनी यादव

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

नज़्म

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वो इक चेहरा था जो
वो जो नाम था उसका
हाँ सब याद है मुझको
कुछ भूला नही हूँ मैं
तब हर शख़्स अच्छा था
जो हमशक़्ल थे तेरे
जो हमनाम थे तेरे
यार तमाम लोग मुझे
अब पसन्द नही बिल्कुल
जिनसे शक़्ल मिलती है
या आवाज़ मिलती है
जिनके नाम तुझ से है
नफरत है मुझे सबसे
जिन्हें प्यार करता था
जिनकी बात करता था
नफरत है मुझे सबसे...
नफरत है मुझे तुमसे...
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अश्विनी यादव