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सोमवार, 20 मार्च 2017

शिव सर्वत्र है

शिव ही सब है, सब में शिव है,
शिव ब्रम्ह है, जहाँ भी शिव है,
दुःख भी शिव है, सुख भी शिव है,
मन भी शिव है, मुख भी शिव है,
शिव ही ओज है, तेज भी शिव है,
शिव समस्या, शोध भी शिव है,
शिव छुपा है, खोज भी शिव है,
शिव ही मिथ्या, सत्य भी शिव है,
शिव आकार, निराकार शिव है,
शिव चमत्कार, विचार भी शिव है,
शिव ही नियम है, कर्म भी शिव है,
शिव ही सुन्दर, धर्म भी शिव है,
शिव है जन-जन के रग - रग में,
शिव निहित हैं हर में इक कण में

शिव संसार है, शिव ही सकल है,

शिव समुद्र है, शिव ही जल  है,

शिव सर्वस्व, ब्रम्हाण्ड भी शिव है,
शिव ही आदि है, अनन्त भी शिव है,
___जय शिव शंकर___


           ― अश्विनी यादव

लूट गये

राम नाम पे लूट ले गये
गाय पे हत्या जारी है,
दलितों को सब पीट गये
गंगा पूजन उधारी है,
खुद को राष्ट्रवादी कहते
सेना पे वोट बाजारी है,
अपने मर रहे रोज पर उन्हें
विदेशी जमीने प्यारी है,
दुःख नही झूठे सारे वादे थे
हाँ ये सरकार व्यापारी है,
मन्दिर मन्दिर हर बार किये,
पर समय न कभी जारी है,
गर मन्दिर बना तो भेद खत्म,
बस यहीं समस्या सारी है, 
समाजवाद का कल्पित चेहरा,
ठाना राम पार्क बनवाने का,
वोट खातिर धर्म युद्ध शुरू किये,
ये भूल  तुम्हारी  भारी है,
व्यापार इनके खून में बह रहा,
बह चुकी हिंदुत्वता सारी है, 
ये दलाल है उद्योगपतियों के,
सब पैसे वालों के दरबारी है।
         
       © ―अश्विनी यादव

दिवाली की जरूरत

#त्यौहार_गरीबों_के
खुश था दिवाली आ रही थी
फिर से खरीदी होगी,
घरो में सजावट हो रही थी
दीप की उम्मीदी होगी,
मेरी किसानी खत्म हो चली
जाने क्या बर्बादी होगी,
कलह यूँ आ पड़ी मंहगाई की
या कपड़े या दवाई होगी,
ये जिन्दगी मगरूर है बड़ी
काश! कोई लाटरी होती,
कम से कम इक आस होती
न या ख़ुशियाँ की चाभी होगी,
       

         ©  अश्विनी यादव

मैं ही इंकलाब हूँ

गरीबों का छप्पर हूँ, कलम की आवाज हूँ,
दुखियों का रहबर हूँ, बेबसों का सरताज हूँ,

जला दे जुल्मी को, शब्दों में लिपटा आग हूँ,
रक्त रंजिश शमशीर हूँ, हाँ मै ही इन्कलाब हूँ,

पहली उठी बंद मुठ्ठी हूँ, शोषितों के जज्बात हूँ,
रोज गिरती हुई ईमारत सी, सोच-ए-समाज हूँ,

किस्तों में जीना छोड़,निर्माण की शुरुआत हूँ,
'कलम की आवाज हूँ, हाँ मै ही इन्काब हूँ,

           ―  अश्विनी यादव

रविवार, 12 मार्च 2017

आज होली है,

जब किसी बेबस को रंग नही लगाता हूँ,
किसी गरीब का चेहरा नही खिलाता हूँ,
खुद की आटा, दाल,औ नमक में हैरान,
सच कहूं तो सच्ची होली नही मनाता हूँ,
     
टूटी झोपडी का चीत्कार देखता हूँ जब,
किसी का उतरता श्रृंगार देखता हूँ जब,
इन रंगों में हमको वो ख़ुशी नही दिखती,
बाप शहीद को कंधा देते देखता हूँ जब,

जो रात सन्नाटे में आबरू नीलाम होती है,
कोई सावित्री भी खौफ में गुमनाम होती है,
तो हमारे चुप हुए होंठों का ही  नतीजा है,
की कभी बहन कभी बेटी बदनाम होती है,

सोमवार, 30 जनवरी 2017

मैं कौन हूँ

मेरी फ़िक्र करो, जिक्र करो मेरी,
बदहाल बचपन से सुबह करो मेरी,
मैं हूँ भारत का मजबूर भविष्य,
तकदीरों से ओझल दूर भविष्य,
क्या गरीबी में ही जीना मरना है,
क्या यूँ पशुवत विचरण करना है,
क्या यहाँ मेरा न कोई रखवाला है,
क्या देश मस्ज़िद और शिवाला है,
क्या जाति पात में भी पिसना होगा,
क्या धर्मी दंगों में घुट के रिसना होगा,
क्या यहीं जीना और मरना होता है,
क्या इस संत्रास पे दिल नही रोता है,
क्या मेरे स्वाभिमान का मोल नही,
क्या मानवता का यूँ कोई तोल नही,
बोलो भारत बोलो क्या यही भविष्य,
कूड़े कचरे के ढेरों में दबता भविष्य,
रहने दो न बोलो तुम नहीं कह पाओगे,
सच बोलने वाला कलेजा कहाँ लाओगे,
तुम लिप्त रहो भोग विलास में सने रहो,
कायर थे, कायर हो, कायर ही बने रहो,
यहां स्वार्थ के पूरण में ही कौमे जिन्दा है,
मुर्दों ने घरबार जलाया, मुर्दे ही शर्मिंदा है,
कवि हूँ बोल दिया तुम न हिम्मत करना,
गर करना इतना की आईना साफ रखना,
     
    (   कवि :- अश्विनी यादव )

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

हाँ तुम स्त्री हो


माँ हो, बहन हो, बेटी हो,
परिवार खुद में समेटी हो,
कभी फूल सी कोमल हो,
कभी हीरे सी कठोर हो,
रात सी शीतल दिन सोनल हो,
समाज संघर्ष की भोर हो,
आस्था की ज्योति नारी हो तुम,
हम एक रूप में उद्धारी हो तुम,
हो विश्वास की कल्पवृक्ष,
प्रेम न्याय की मूर्ति हो,
हो दर्पण सी एक चच्क्षु,
मनुष्य श्रृंखला की पूर्ति हो,
हाँ तुम लड़की हो औरत हो,
पत्नी हो हाँ तुम स्त्री हो,
तुम गर्व करो अभिमान करो,
अपने नारीत्व का सम्मान करो,

     (कवि―अश्विनी यादव)