हमें प्रयास करते रहना चाहिए ज्ञान और प्रेम बाँटने का, जिससे एक सभ्य समाज का निर्माण किया जा सके।
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शनिवार, 11 अक्टूबर 2025
ग़ज़ल
मंगलवार, 17 जून 2025
नई ग़ज़ल
सुकून-ओ-सब्र तुम तोड़ा करोगे
मिरी जां सच में तुम ऐसा करोगे
तुम्हारे साथ मेरा नाम लेगें
भला कितनों से तुम उलझा करोगे
भले हम लाख तेरा ध्यान रक्खें
नई रंजिश ही तुम पैदा करोगे
तिरी परछाई समझा था मैं ख़ुद को
कि अब ग़ैरों को हमसाया करोगे
सुनों जब हम यहाँ होगें नहीं तो
मुझे हर दर पे तुम ढूँढा करोगे
सुनहरी शाम हम रेतों पे बैठे
वो हर इक बात तुम सोचा करोगे
बहुत रोओगी तुम भी जान उस दिन
अगर मैं मर गया तो क्या करोगे
~ अश्विनी यादव
गुरुवार, 22 मई 2025
कर भला तो हो भला
उन बच्चों की मुस्कान 😍
अगर आपके मन में दया और श्रद्धा है तो माधव आपके साथ हैं। आज एक दुकान पर फ्राइड राइस खा रहा था तभी तीन बच्चे आ गए, बोले भैया कुछ खिला दीजिये.. अगर उन्होंने पैसे माँगे होते तो यक़ीनन मना कर हटा देता लेकिन अन्न कैसे मना किया जा सकता है।
पूछा क्या खाओगे ?
बच्चों का जवाब था- चाऊमीन
बगल वाली दुकान पर मिल रहा था सो दुकान दुकानदार को बोलकर बच्चों को दिलवा दिया।
इधर मेरा अगला निवाला चम्मच में था कि उस पर निग़ाह पड़ गयी जिसमें एक स्टेपलर पिन थी, मेरे होश उड़ गए क्योंकि वो मुँह या पेट में चली जाती तो जाने क्या होता राम।
और फिर...
दुकानदार को फटकार लगाई लेकिन बहुत कुछ नहीं कहा क्योंकि वो नई ऐज का लड़का ख़ुद का बिजनेस शुरू किया था।
उसके बाद जाकर बच्चों का पेमेंट किया, पूछा बस न बेटा.. और कुछ तो नहीं चाहिए न..
बच्चों ने मुस्कुराते हुए कहा नहीं भैया बस।
मुस्कान देना धर्म का काम है।
शुक्रिया कृष्णा🙏🏼
मंगलवार, 20 मई 2025
नई ग़ज़ल
तुम्हारे बिना जाने कैसा रहूँगा
मैं जीता रहा भी तो कितना रहूँगा
मुझी पे अमर बेल लिपटी हुई है
नहीं हूँ हरा मैं सो सूखा रहूँगा
उदासी मुझे प्यार करने लगी है
इसी के सहारे मैं तन्हा रहूँगा
हो तुमको मुबारक ये रंगीन महफ़िल
मैं सादा जिया हूँ सो सादा रहूँगा
मुझे अब बुलाता है गंगा का पानी
मेरी जां मैं शाइर हूँ ज़िन्दा रहूँगा
कोई जब तुम्हें भी सताएगा ऐसे
इसी दर्द सा याद आता रहूँगा
मुझे दफ़्न कर दो तो अच्छा रहेगा
भला कब तलक मैं ये ढोता रहूँगा
~ अश्विनी यादव
शुक्रवार, 10 नवंबर 2023
एक और ख़त तुम्हारे नाम
ऐ सुनों न, तुम फिर मुँह फुलाकर बैठ गयी हो न... मैं मनाता ही रहूँगा न..? कब तक.? कब तलक तुम गुस्सा होती रहोगी बताओ न.!
ये जो सबसे ख़ूबसूरत पल मिला है इसका इस्तेमाल करना न करना अब तुम्हारे हाथ में है, तुम चाहो तो इसे सबसे हसीन पल बना सकती हो हमारे रिश्ते का और चाहो तो नाराजगी दिखाते हुए इस लम्हे को बर्बाद कर सकती हो। याद है कैसे तुम अपने हाथों में मेरा हाथ लेकर अपनी और मेरी उंगलियों का कलर मैच कराती थी, कैसे तुम हाथ दबाकर अपनी ताक़त बताने के चक्कर में ये सब पागलपन करती थी.. हा हा हा याद तो सब होगा ही।
मैं सैकड़ों किलोमीटर दूर तुम्हारे घर के पास वाले चौराहे पर आया था तुमसे मिलने लेकिन तुम दूर बहुत दूर से ही मुझे निहारती रह गयी। मैं भी तुम्हें बिल्कुल ऐसे ही देख रहा था जैसे मंदिरों में जाने के बाद बहुत भीड़ हो और आप भगवान की मूरत को एक नज़र पाते हों... सुनों न, तुम कभी सोचती हो कि तुम क्या अहमियत रखती हो मेरे लिये..? नहीं न.. रुको रुको मैं बताता हूँ।
इतने करोड़ों लोगों में.. इतने हज़ारों पसन्द के चेहरों में.. बस एक चेहरा एक शख़्स जिसे इतना पसन्द किया जाता हो कि बस वो यानी सब कुछ वो ही लगने तो सोचिये कि ऐसा तो इस दुनिया में इंसान अपनी माँ-पिता और भगवान को ही प्यार कर सकता हो.. अब समझ लो कि अहमियत क्या है..!
हमारे वृंदावन जाने, तुम्हें झुमके दिलाने और हाँ तुम्हारे मुँह फुलाने पर भी तुम्हें इतना प्यार से हँसा देने की चाहत जाने क्यों अधूरी सी रह जाती हुई दिखाई पड़ती है। तुम तो मेरे हर उस रूप से वाक़िफ़ हो जिसे इस दुनिया में कोई और शख़्स न जानता हो फिर भी... तुम्हें जाने क्यों दूर जाना था? जाने क्यों नाराज़ रहना था.? कोई बात नहीं हम तो अपने रास्ते पर चलते ही जाएंगें.. क्योंकि एक तुम ही तो नहीं ज़िम्मेदारी हो मेरी.. और भी ग़म हैं मुझे जो नोंचते रहते हैं। तुम साथ रहती थी तो मेरे हर ग़म को भले ही आधा न कर पाओ पर मेरी ख़ुशियाँ बढ़ाकर इस ग़म से हो रहे दुःख को ज़रूर हल्का कर देती थी।
हमारा क्या है हम तो बस ख़ुशियाँ बाँटने में ही रह गए, अपने लिए कोई मुस्कुराट बचाकर नहीं रखा। पर मेरा यक़ीन है कि जितनी ख़ुशियाँ बांटूंगा उसका दस गुना मेरे हिस्से में ही आनी है। तुम भी मेरी ख़ुशी का एक हिस्सा हुआ करती थी, करती हो, करती रहोगी। तुम्हारे पास होने न होने से मुहब्बत में कमी नहीं आएगी.. हालांकि ग़मज़दा रहूँगा, मुस्कुराने के लिए भी बहाने ख़ोजने पड़ सकते हैं पर चाहत तो बेकरारी के बाद और भी बढ़ती ही जाएगी। अगर तुम एक बार और सोचो तो तुम्हें लौट आना चाहिए..
तुम्हें ये ख़त महसूस होना चाहिये। पिछले वाले ख़त के जवाब में मुझे तुम्हारे आँसू मिले थे, तुम्हारा वो मायूस चेहरा मिला मिला था पर इस बार अपनी चमकती आंखों के साथ मुस्कुराट भेजना।
मुहब्बत सबके नसीब में नहीं होती, मुस्कुराहट और सुकूँ तो उससे भी ज़्यादा मंहगी चीज़ है इस धरती पर।
Note - ये सब नॉवेल के हिस्से में से है। बाद में जब समेटा जाएगा तो ये सब टुकड़े जोड़कर एक शक़्ल बनाऊंगा मेरी जान और फिर उस रोज़ मैं अपनी चाहत के सारे रंग को इस जहां में बिखेर दूँगा।
~ अश्विनी यादव
बुधवार, 27 सितंबर 2023
नज़्म ~ जब ख़्वाब हक़ीक़त हो जाये
तुम्हें मुस्कुराना आता है
यानी मेरी आँखें चमकेंगीं
तुम्हें गले लगाना आता है
यानी मेरे ग़म बंट जाएंगें
तुम बात समझती हो सारी
सो मुझको सुकूँ मिल पायेगा
तुम सूरत में भी सीरत में भी
मेरे ख़्वाबों के जैसे हो
होंठ तुम्हारे सुर्ख गुलाबी
और आँखें हैं कजरारी सी
चूम लूँ मैं और खो जाऊँ
ये भी तो इक हसरत है
सबसे अव्वल ये कहना है
झुमके तुम पर जँचते हैं
साड़ी बिंदी हँसता चेहरा
बस इतनी तमन्ना है मेरी
हुस्न तुम्हारा सोने जैसा
आँखें हीरे जैसी हैं
हर इक नक्श तराशा यूँ है
जैसे नदी मुड़े कोई
इक दिन ये सारा कुछ भी
मेरे नाम करोगी तुम
हाए, ये भी तो इक दुनिया है
और उस में तुम अधिकारी हो।
सोमवार, 18 सितंबर 2023
ब्राह्मण और अन्य पर विचार...
आइये ब्राह्मण/पण्डित पर बात कर लेते हैं।
सबसे पहली बात मुझे जातिगत किसी से कभी भी दिक़्क़त नहीं हुई है और न ही जाति के कारण प्रेम बरसाया हूँ कभी। और हाँ अगर पोस्ट पूरी पढ़ेंगें तभी कमेंट में ज्ञान/राय देने आइयेगा नहीं तो ज़रूरत नहीं किसी की।
अब आते हैं मुद्दे पर, मैं किसी से जातिगत कारणों से भेदभाव नहीं कर सकता और न ही समर्थन। जो भी व्यक्ति मेरे पास में होता है वो मेरा होकर रहता है न कि मेरे नाम मेरी जाति या मेरी किसी भी प्रभावशाली चीज़ के चक्कर में हो। लोग मेरे क़िरदार को पसन्द करें बस ये ज़रूरी है साथ देने के लिये। अब दिक़्क़त ये है कि तमाम लोगों में से मुझे मेरी जाति के कुछ यार दोस्त बेहद पसंद करते हैं तो बदले में उनका हक़ है कि मैं भी उन्हें उनसे ज़्यादा पसन्द करूँ... वो लड़के मुझे अपना बड़ा भाई मानते हैं तो ज़ाहिर है कि वो मेरे लिए मेरे अपने ही हैं।
जब इंजीनियरिंग कर रहा था तो मेरे रूम में मैं पिछड़ी जाति का और एक पण्डित जी सामान्य वर्ग से और एक दलित समाज का भाई... हम तीनों साथ रहते थे। हम तीनों ने कभी ये महसूस ही नहीं किया कि जाति भी होती है कुछ आपस में। आज भी हम तीनों बराबर के दोस्त हैं। हम तीनों को पार्टी अलग पसन्द थीं, हम तीनों के नेता अलग थे, हम तीनों सोशल मीडिया पर भी अलग ही लिखा करते थे लेकिन हम तीनों में कुछ चीज़ कॉमन थी इंसानियत, साथ और प्रेम। इसलिए कह रहा हूँ न मुझे आज तक इन दोनों से कोई धोखा मिला है न ही कोई ऐसी बात हुई है कि मैं परेशान होऊं जातिगत। बचपन से ही मेरे साथ लगभग हर जाति के लोग पढ़ाई किये हैं।
हाँ लेकिन तमाम ब्राह्मण और पिछड़ी जातियों के लोग मिले हैं जो धोखा दे चुके हैं। अब दिक़्क़त इस बात की है कि धोखा देने वाले को जाति से नहीं बल्कि उसकी फितरत से पहचाना जाए।
अभी चंद दिनों पहले ही मेररी ही जाति के मेरे ही एक दोस्त ने अपनी 1 लाख+ फॉलोअर्स वाली id को एक मेरी ही जाति के लड़के से साझा किया। हमने उससे कहा कि भाई इससे भी ट्वीट कर दिया करो और आपके फॉलोअर्स कम हैं तो बढ़ जाएंगें धीरे धीरे। अब उसकी नज़र id चोरी करने पर थी, एक दिन उसने id का पासवर्ड से लेकर सब कुछ बदल दिया फिर डिएक्टिवेट कर दिया। साथ ही मेरे अकाउंट से लेकर मेरे जानने वाले हर एक को ब्लॉक कर दिया ताकि कोई सर्च न कर पाए। हम सब उससे बोले भी तो उसने साफ कह दिया कि भाई आप मेरी id ले लीजिए चाहे तो लेकिन ये मत कहिये मैंने चोरी किया है। बड़ा इनोशेन्ट बन रहा था.. खूब सारा नौटंकी किया... पर मैं उससे रिक्वेस्ट कर रहा था कि भाई दे दो क्या फ़ायदा ये सब आपस में करने का। चूँकि मेरे कहने पर उसको id मिली थी इसलिए मैं रिक्वेस्ट कर रहा था कि भाई वापस कर दो...
ख़ैर जाने दिया, उसने वापस नहीं किया... मैंने सारा कुछ भगवान पर छोड़ दिया और बोल दिया कि जो है सब राधे की मर्ज़ी है।
एक रात को हम और हमारा दोस्त बातें कर रहे थे कि भाई कल सुबह मैं उस आदमी पर केस करने वाला हूँ और यक़ीन करिये मैंने दो जगह पर थाना इंचार्ज से बात कर रखी थी कि कल इसकी वाट लगा देंगें। 15 दिन तक हम पता करते रहे फिर ये उसी केस की बात वाली रात को 3 बजे उसने id ओपन की तब जाकर हमने ट्विटर/X को ईमेल किया सब लिखकर, फिर वहाँ से ज़रूरी चीज़ें पूछी गईं और हमने सब प्रोवाइड करवा दिया... सुबह 6 बजे तक id वापस मिल गयी हमें। अब उस यादव दोस्त को न तो id मिली और न ही कुछ मिला।
यहाँ जाति की बात नहीं है बात मक्कारी और खानदान की परवरिश का है। इसलिये जाति की बात नहीं है।
अब आते हैं ब्राह्मण और दलित साथियों पर तो ऐसे कई दोस्त मिले जो मौक़ापरस्ती में सबसे आगे रहे हैं, उन्हें अपने काम को बस निकालने से मतलब होता था। और सच कहूँ तो तमाम लोगों ने अपना उल्लू सीधा किया... लेकिन मैं फिर कह रहा हूँ बात परवरिश की है।
कई दोस्त आज भी ऐसे हैं जो जान लगा देंगे मेरे एक बार पुकारने पर ही। ये लोग जाति से भिन्न हैं पर प्रेम इतना अटूट है कि गर्व होता है मुझे। इसलिए जाति ज़रूरी नहीं है इंसान का इंसान होना ज़रूरी है।
मैं आरक्षण समर्थक हूँ, मेरे तमाम सवर्ण मित्र भी आरक्षण समर्थक हैं, और तमाम विरोध में... मैं आंबेडकर साहब से लेकर मैं लालू जी और मुलायम जी को मसीहा मानता हूँ, और मेरे कुछ लोग इन्हें पसन्द कम करते हैं तो क्या हुआ आख़िर।
सबकी अपनी सोच है सबको हक़ है। और रही बात ब्राह्मणों द्वारा शोषण किये जाने की तो यक़ीन मानिये जो भी जब भी जहाँ मज़बूत रहा है सबने शोषण किया है। इसलिये ब्राह्मणों पर आक्षेप लगाने से पहले हमें अपने भी दामन की तरफ़ देखना चाहिए।
अब ये मत कहना फ़लाने ने ये पोस्ट किया और आपने वो.. सबकी मर्ज़ी है अपनी।
राधे -राधे।
~ अश्विनी यादव