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रविवार, 12 मार्च 2017

आज होली है,

जब किसी बेबस को रंग नही लगाता हूँ,
किसी गरीब का चेहरा नही खिलाता हूँ,
खुद की आटा, दाल,औ नमक में हैरान,
सच कहूं तो सच्ची होली नही मनाता हूँ,
     
टूटी झोपडी का चीत्कार देखता हूँ जब,
किसी का उतरता श्रृंगार देखता हूँ जब,
इन रंगों में हमको वो ख़ुशी नही दिखती,
बाप शहीद को कंधा देते देखता हूँ जब,

जो रात सन्नाटे में आबरू नीलाम होती है,
कोई सावित्री भी खौफ में गुमनाम होती है,
तो हमारे चुप हुए होंठों का ही  नतीजा है,
की कभी बहन कभी बेटी बदनाम होती है,

सोमवार, 30 जनवरी 2017

मैं कौन हूँ

मेरी फ़िक्र करो, जिक्र करो मेरी,
बदहाल बचपन से सुबह करो मेरी,
मैं हूँ भारत का मजबूर भविष्य,
तकदीरों से ओझल दूर भविष्य,
क्या गरीबी में ही जीना मरना है,
क्या यूँ पशुवत विचरण करना है,
क्या यहाँ मेरा न कोई रखवाला है,
क्या देश मस्ज़िद और शिवाला है,
क्या जाति पात में भी पिसना होगा,
क्या धर्मी दंगों में घुट के रिसना होगा,
क्या यहीं जीना और मरना होता है,
क्या इस संत्रास पे दिल नही रोता है,
क्या मेरे स्वाभिमान का मोल नही,
क्या मानवता का यूँ कोई तोल नही,
बोलो भारत बोलो क्या यही भविष्य,
कूड़े कचरे के ढेरों में दबता भविष्य,
रहने दो न बोलो तुम नहीं कह पाओगे,
सच बोलने वाला कलेजा कहाँ लाओगे,
तुम लिप्त रहो भोग विलास में सने रहो,
कायर थे, कायर हो, कायर ही बने रहो,
यहां स्वार्थ के पूरण में ही कौमे जिन्दा है,
मुर्दों ने घरबार जलाया, मुर्दे ही शर्मिंदा है,
कवि हूँ बोल दिया तुम न हिम्मत करना,
गर करना इतना की आईना साफ रखना,
     
    (   कवि :- अश्विनी यादव )

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

हाँ तुम स्त्री हो


माँ हो, बहन हो, बेटी हो,
परिवार खुद में समेटी हो,
कभी फूल सी कोमल हो,
कभी हीरे सी कठोर हो,
रात सी शीतल दिन सोनल हो,
समाज संघर्ष की भोर हो,
आस्था की ज्योति नारी हो तुम,
हम एक रूप में उद्धारी हो तुम,
हो विश्वास की कल्पवृक्ष,
प्रेम न्याय की मूर्ति हो,
हो दर्पण सी एक चच्क्षु,
मनुष्य श्रृंखला की पूर्ति हो,
हाँ तुम लड़की हो औरत हो,
पत्नी हो हाँ तुम स्त्री हो,
तुम गर्व करो अभिमान करो,
अपने नारीत्व का सम्मान करो,

     (कवि―अश्विनी यादव)

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

काश! की तुम मिलने आती

कोहरे की पहरेदारी थी
काश की तुम मिलने आती,
सर्द रातों की दुश्वारी थी
काश की तुम समझ पाती,
भेज ही देती किसी तरह
यादों का गर्म बिछौना तुम,
प्रेम पाश के कम्बल को
ओढ़ा दी होती मुझपर तुम,
दिन चमकना भूल गया है
क्या इसकी भी साझेदारी थी,
काश की तुम मिलने आती
फिर कोहरे की पहरेदारी थी,
____इस बेरहम कड़कती सर्दियों से खुदा जहाँ को बचाये,
  ( पंक्तियाँ :― अश्विनी यादव )

सोमवार, 28 नवंबर 2016

आप तो उनसे भी आगे हो

"___खुद को सेवक और चौकीदारी कहने वाले एक कद्दावर नेता और उसके लगभग अंधे हो चुके समर्थकों को समर्पित ये पंक्तियाँ___,,
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जनता भूखी थकी हुई और चहुं ओर हाहाकार है,
पगले भक्त चिल्ला रहे है की बागों में बहार है,
उन्हें जान के लाले पड गये जो हमारे जिम्मेदार है,
देश का मुंह बंद करो कह रहा फट्टू चौकीदार है,
सलीमा देखाई में नोट चले पर खा नही सकते है,
वो लाइन में खाए धक्के जो आ जा नही सकते है,
बुढ़िया रोये अपाहिज रोये भारत देश परेशान हुआ,
आधी रात मे तेरे नाटक से जन मानस हैरान हुआ,
ये जान लो जिस कारण से तुम्हे सरताज बनाया था,
कैसे उनको गर्त में फेंक तुम्हें सत्ताधीश बनाया था,
पर क्या कहें की तुमने उनको काफ़ी पीछे छोड़ दिया,
तानाशाही और घुमाई कर हम से नाता तोड़ दिया,
रोटी छीना, थाली छीना, मुँह में नोटिस ठूस दिया,
चादर छीन लिया हमसे बदले में ठिठुरती पूस दिया,
सुन ओ सनकी राजा अधिकारों का हनन किया तुमने,
आपातकाल स्थिति पैदा कर हमे शर्मसार किया तुमने,
तुमको लाया भूल हुई तुम गला दबाने पे तुल गये हो,
तुम मदमस्त हाथी से सत्ता नशे में सब भूल गये हो,
है कसम इस बार तुम्हें जनता औकात दिखा देगी,
जैसे तुमको बिठाया था वैसे ही तुमको गिरा देगी,
नोट बंदी सही किया पर तरीका जनहित में न था,
तुम्हें गरीबी समझ होगी सोच लेना उचित न था,
साहब तुमने तो कुर्सी को अमीरों की रखैल बना डाली,
हम जनता खुद का ध्यान रखे जेटली जी ने कह डाली,
अब बताओ तुम रोज गरीबी-किसानी पेले रहते हो,
जहाँ देखो तुम भारत निर्माण की डींगे रेले रहते हो,
जितना तुमने प्रचारों पर खर्च कराया कामों का,
इतने के न काम हुए है लुटाया जितने दामों का,
अब तो वक्त निकल चुका कुर्सी छोड़ने की बारी है,
जन मानस बेहाल हुआ सबक सिखाने की तैयारी है,
जनता भूखी थकी हुई और चहुं ओर हाहाकार है,
पगले भक्त चिल्ला रहे है की बागों में बहार है,
___आज दुर्दशा सिर्फ नासमझी के कारण हुई, क्युकी उन्हें तो अमीरों के बीच में रहने की आदत है..तब गरीबों की बातें तो पन्नों में लिखी हुई आती है फिर मंच से आप चित्रित कर देते हो सब.....अब भला करे भगवान हमारा____
           
         "पंक्तियाँ :-  अश्विनी यादव"

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

याद करोगे जब हमें

करोगे याद जब हमको न आंसू रोक पाओगे,
मेरी बातों में खोने से न खुद को रोक पाओगे,
बड़ी तालीम ली होगी जमाने को सिखाने के लिए,
जमाना सवाल करेगा न किसी को टोक पाओगे,,,
कभी बिस्तर पे सिमटोगे कभी झरोखे पे आओगे,
कभी ख्वाबो में डूब के भूलकर मुझे बुलाओगे,
इक़ मेरी चाहत में कितनो को लिखना सिखाया,
तुमसे मोहब्बत न सम्हली अब नजर कैसे मिलाओगे,,,,
वो घरौंदे, वो पत्थर हमारे नाम के जब दिखाई देंगे,
दिल बोझिल हो जायेगा मेरे बोल सुनाई देंगें,
हम घुट घुट कर मर रहें कतरों में बिखर जायेंगें,
तुम ही जानो हाल तुम्हारा की कैसे जी पाओगे,
करोगे याद जब हमको न आंसू रोक पाओगे,......
     ―अश्विनी यादव

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

तुम होती तो ऐसा होता

बडा गुमनाम हो गया हूँ बिछड़ कर तुमसे,
हर सुबह का मंजर क्या कहूँ कैसा होता,
शाम सुहानी हो जाती तेरा साथ पाकर के,
तुम होती तो ऐसा होता क्या कहूँ कैसा होता,//

ठंडी आने वाली होती जब जब भी,
तुम्हारे हाथ में ऊन का गोला होता,
हम चाय की चुस्की लेते पास बैठ के,
बगल में गर्म अलाव का शोला होता,
हम टहलते कोहरे में बातें करते करते,
हर लम्हा क्या कहूँ की कैसा होता,
सर्दियाँ इंतजार करवाती हमसे,
तुम होती तो ऐसा होता-वैसा होता,//

गर्मी के दिनों हम छत पर होते,
मै चाँद निहारता तो तुम्हे तराशता,
हाथ-हाथ ले और तुम्हारी बातों में,
मै खोता जाता और तुमको पाता,
भरी दोपहरी में तुम लस्सी बनाती,
तरबूज काटते क्या सोचूं कैसा होता,
धूप में छाँव चहूँ ओर हरियाली होती,
तुम होती तो ऐसा होता-वैसा होता,//

बारिशों में तुम्हारे हाथ के पकौड़े,
तीखी चटनी और करारी काफ़ी होती,
उस रिमझिम में भीगते खेल खेल में,
जरा मै सम्हलता तुम बहकती होती,
न जाने कब में दोनों को सर्दी होती,
काढ़ा बनाते क्या जानू कि कैसा होता,
बड़ी तसल्ली से रूह तक भिगो देता,
तुम होती तो ऐसा होता-वैसा होता,//

पतझड़ में बिखरी पत्तियाँ तुम्हारा,
इंतजार करती कुछ बेकरार होती,
पैरों से लिपटने आस-पास उड़ने को,
शाखों से भी वो तकरार कर लेती,
बागों का सरीखा मौसम ऐसा होता,
तुम होती तो ऐसा होता-वैसा होता,//

         ― अश्विनी यादव