ज़ुल्म के नाख़ून पैने हो गए हैं,
यार अब तो जान की बाज़ी लगी है,
चुन रहें हैं बलि दिया जाए कहाँ पर,
और अब सरकार भी राजी लगी है,
हम भला आदम समझ बैठे थे जिसको,
जात भी उसकी वहीं दागी लगी है,
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अश्विनी यादव
हमें प्रयास करते रहना चाहिए ज्ञान और प्रेम बाँटने का, जिससे एक सभ्य समाज का निर्माण किया जा सके।
ज़ुल्म के नाख़ून पैने हो गए हैं,
यार अब तो जान की बाज़ी लगी है,
चुन रहें हैं बलि दिया जाए कहाँ पर,
और अब सरकार भी राजी लगी है,
हम भला आदम समझ बैठे थे जिसको,
जात भी उसकी वहीं दागी लगी है,
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अश्विनी यादव
एक कुँआ था
सड़क के इस पार
एक बस्ती थी
सड़क के उस पार
कुँआ पक्का था
सड़क कच्ची थी
बस्ती में हंसी-ख़ुशी
दोनों बहुत सस्ती थी
कुँआ और बस्ती दोनों
इक-दूजे के साथी थे
पर कब तलक
ऐसा समर्पण रहता
एक दिन कुँआ
ख़ा गया आधी बस्ती को
सड़क के उस पार
लाशों पर गिरते आँसू
चीख़ों का मातम
लाचारी, बेबसी फ़ैली थी
सड़क के इस पर
कुँआ जाने क्यूँ चुप था
बेहाल रोने वालों को
किसी ने पानी पिला दिया
कुछ चीख़ें कम हो गयी
कुछ लाशें और बढ़ गयी
तब ये बात उठी
शायद कुँए में ज़हर है
इत्तला करने से पहले
थाने से आए कुछ लोग
सुनी -सुनाई कुछ भी नही
बस बचऊ को घसीट ले गए
शायद वो आये थे इसीलिए
बस्ती की आवाज़ ले जाने
बचऊ को दोषी कहा
जीभ पर लात रखकर मारा
ताकि कोई आवाज़
फिर उठ न सके
कोई "जमींदार" के ख़िलाफ़
कुछ कह न सके
अच्छा! ये माज़रा था सब
कुछ दिन पहले ही जब
जमींदार के लड़के ने
बस्ती की बच्ची नोंची थी
इन ठण्डे ख़ून वालों ने
कुछ दो चार थप्पड़ मारे थे
आज़ उसी का नतीज़ा है
लाशें, आँसू, लात, लाठी,
मातम के साथ वापस हुआ
अब इसका बदला भी
ले पाना ही मुश्किल है
ख़ून ठंडा था, है और रहेगा
काश! कोई उठ पाता
इतनी हिम्मत लेकर
छाती चीर देता जमींदार की
और लिख देता
"गर्म ख़ून की कहानी,,
पुलिस लाठी मार रही
ज़हर से ज़मीदार
बस्ती श्मसान हो गयी
सोती है सरकार....।।
― अश्विनी यादव
( घर के बच्चों के लिए दुआएँ )
नज़्म
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ओ मेरी नन्ही हथेली
तुम मेरी उँगली पकड़ो
कोशिश करो चलने की
अपने कदम आधे कर लूँगा
लेकिन तुम्हारे साथ चलूँगा
तुम बिना भय के चलो
मैं तुम्हें सम्हाल लूँगा
तुम्हारे छोटे छोटे होंठ
जब मुझे बुलाते हैं
बड़े प्यार से
सच कहूँ तो लगता है
ज़िन्दगी बस यहीं रुकी रहे
हम साथ चलते रहें
तुम बोलो बिना रुके
मैं सुनता रहूँ, बस सुनता रहूँ....
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अश्विनी यादव
सब कहते हैं ऐसा होता आया है
यार कहानी में राँझा भी मरता है
हीर कहाँ बचने वाली ही थी पहले
दर्द भरा इतिहास हमारा कहता है
उस पत्थर को आख़िर कैसे बतलाऊँ
इक दरिया मेरी आँखों में रहता है
दिल के अरमां टुकड़ों में बँट जाते हैं
तब जाकर आँसू का रस्ता बनता है
दुनिया कहती ज़िन्दा रहते मौत जिसे
हम भी देखें इसमें क्या -क्या दुखता है
चाहत, राहत, धोखा, मातम, बेचैनी
मेरे हिस्से में आख़िर क्या मिलता है
हुस्न भला क्या चीज़ मुहब्बत के आगे
दिन बदले तो ये भी रोज़ बदलता है
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अश्विनी यादव
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वो इक चेहरा था जो
वो जो नाम था उसका
हाँ सब याद है मुझको
कुछ भूला नही हूँ मैं
तब हर शख़्स अच्छा था
जो हमशक़्ल थे तेरे
जो हमनाम थे तेरे
यार तमाम लोग मुझे
अब पसन्द नही बिल्कुल
जिनसे शक़्ल मिलती है
या आवाज़ मिलती है
जिनके नाम तुझ से है
नफरत है मुझे सबसे
जिन्हें प्यार करता था
जिनकी बात करता था
नफरत है मुझे सबसे...
नफरत है मुझे तुमसे...
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अश्विनी यादव
यहाँ -वहाँ सब तरफ
अख़बार से लेकर
टीवी के ख़बरों तक
बस नफरत ही बँट रही है
आजकल नफरत का कारोबार
बहुत बढ़ गया है
शायद इसकी मांग भी है
ख़ून के छीटे ऐसे
गहरे सुर्ख लाल
गाढे से हैं, जो
मिटा सकते हैं किसी भी
उजाले को... लेकिन
इस तिमिर में मुझे
एक चमकती हुई चीज दिखी
इससे रौशनी आ रही है
जिसकी साँसे चल रही थी
यानी एक दीपक जल रहा था
"मुहब्बत की हिफाज़त,,
कर्म में है इसके
शायद कुछ एक खुशियाँ
मयस्सर न हुई हैं
या यूँ कहूँ वो ख़ुशी
नाक़ाबिल थी इसके....
आज भी आँधियों से लड़ता है
और मुहब्बत की हिफाज़त
ज़िन्दादिली से करता है
ये यार है, भाई है, आवाज है
इस मुहब्बत का नाम 'अफराज़' है।
जन्मोत्सव की बहुत बहुत शुभकामनाएं, बड़े भाई हो, दोस्त हो बस इतना ही कॉफ़ी, चाय, दारू, कोल्डड्रिंक सब है मेरे लिये,,,, भाई तुम्हारी सलामती के लिए बहुत दुआएँ,,,, भगवान भोलेनाथ की कृपा सदैव बनी रहे और ऐसे ही पूरे जगत भर में मुहब्बत बाँटते रहो जान। बाक़ी तो आपकी हर क़ामयाबी मेरी क़ामयाबी है भाई।
एक सबसे ख़ास बात "मैं नल्ला हूँ, कमाता धमाता नही हूँ तो आप अभी से पैसे जमा करके रखो क्योंकि दिल्ली आऊँगा तो स्टेशन से उतरने के बाद एक फूटी कौड़ी नही ख़र्च करूँगा मैं सब आपको ही करना पड़ेगा याद रखियो गुरु,, और हाँ अपने शादी के अपने ड्रेस के साथ मेरी भी ख़रीदकर रख लेना भैय्ये....ये रिक्वेस्ट नही है बस बता रहा हूँ.....😊😊😊😊
बहुत दुआएँ यार भैया आप ख़ुश रहो सलामत रहो, बहुत मुहब्बत।
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अश्विनी यादव
इश्क़ में ख़ुद को ज़रा झूठा किया,
तुम नही मानी तभी रूठा किया,
यार ये यारी भला है कौन सी,
दूर से मरता हुआ देखा किया,
जो कबूतर शहर के क़ाबिल न थे,
भेजकर जंगल बहुत अच्छा किया,
नोंचकर फेंको मुझे पागल करो,
और कह दो इश्क में धोखा किया,
पंख पाकर याद रखनी थी ज़मीं,
नींद में भी इक तुझे सोचा किया,
एक चाहत थी मुझे इज़हार की,
हर गली जाकर तभी पीछा किया,
वो अभी कल रात को बेवा हुई,
सुब्ह सबने जिस्म पर दावा किया,
इक क़फ़स में कैद थी राहत मिरी,
रूह ख़ातिर साँस का सौदा किया,
तालियाँ बजती रहीं कुछ देर तक,
आख़िरी के सीन में ऐसा किया,
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अश्विनी यादव