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बुधवार, 13 जून 2018

जो तुम लौट आते


हमारे दरमियान यह जो ख़ामोशी है. यही मुहब्बत है. तुम दुनिया में मसरूफ़, मैं दुनिया में मसरूफ़ जब कि हम दोनों ही के पास वैसा कोई काम नहीं है कि हम एक दूसरे में मसरूफ़ न हो सकें. इसके पीछे जो वज्ह है, वो मुहब्बत है.
लौटना इतना मुश्किल नहीं है, कभी होता ही नहीं.
तुम्हें लौट आना चाहिए !

मरज़ ये वो था कि जिस में तो जान जाती है
मैं मर भी जाता जो वो वक़्त पर नहीं आता
ﻣﺮﺽ ﯾﮧ ﻭﮦ ﺗﮭﺎ ﮐﮧ ﺟﺲ ﻣﯿﮟ ﺗﻮ ﺟﺎﻥ ﺟﺎﺗﯽ ﮨﮯ
ﻣﯿﮟ ﻣﺮ ﺑﮭﯽ ﺟﺎﺗﺎ ﺟﻮ ﻭﮦ ﻭﻗﺖ ﭘﺮ ﻧﮩﯽ ﺁﺗﺎ
_________
फ़ैयाज़ ﻓﯿﺎﺽ

सोमवार, 4 जून 2018

नज़्म ( हम बैठे है )

रेलगाड़ी के गुजरने से
वो पुल थरथराने लगा
जिसके नीचे 'हम' बैठे हैं,

गंगा का पानी भी न
अठखेलियां करने लगा
इसके बगल 'हम' बैठें हैं,

उसकी उंगलियां बेझिझक
मेंरी उँगलियों से लिपटी हैं
इतने पास 'हम' बैठें हैं,

रेत से हो पानी चूमता हुआ
झोंका हवा का झूमने लगा
ऐसे होश खोकर 'हम' बैठें हैं,

उसका सर मेरे कांधे पे
पूरा का पूरा टिकने लगा
रुकती सांस लिए 'हम' बैठें हैं,

अभी रंगीनियों में डूबे थे
याद आया समाज हमको
जिससे छुप के यहां 'हम' बैठें हैं,

जाने कैसी जाति की लाज की
ये बेंडियां बनाई गई हैं
जिनसे डरकर आज 'हम' बैठें हैं,

वो जिसके साथ जीना मरना है
उसको चुन लेना भी गुनाह है
ऐसी इंसानियत लिये 'हम' बैठे हैं,

खाप का है फैसला मार देंगें
हमारी भी ज़िद है जी लेंगें
ये एहसास में डूबे 'हम' बैठे हैं,

एक दफा जी करता है मर जाये
सदियों की बेड़ियों कैसे तोड़ेंगें
इश्क़-खौफ़ द्वंद में 'हम' बैठें है,

बुधवार, 23 मई 2018

दो शाइर

दो बहुत बड़े शाइरों के बड़े शानदार शे'र जो आज के लिए है.......

वो दर्द भरी   चीख़  मैं भूला नहीं अब तक,
कहता था कोई बुत मुझे पत्थर से निकालो,
_____________
भारत भूषण पन्त

इश्क़ महज़ दो लोगों में हो जाता 'है'
बीच में लेकिन पूरी दुनिया होती 'है'
عشق محض دو لوگوں میں ہو جاتا ہے
بیچ میں لیکن پوری دنیا ہوتی ہے
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फ़ैयाज़ فیاض

बुधवार, 2 मई 2018

पुनीत सिंह :- शख्सियत (मेरे अपनों में से)

          हम भाई हम अच्छे हैं, आप अपना बताइए..?? इन शब्दों से शुरुआत होती है.... कभी प्यार से 'सर', भाई, भैया, नाम.....यार जो जी में आये से सम्बोधित करता हूँ आपको।
       आइये मिलवाते हैं पेशे से पत्रकार हंसमुख और फ़िक्रमंद रहने वाले अपने भाई       पुनीत सिंह 'प्रियम' जी से....।
          बात उन दिनों की है जब हम घर पर यक्सर भी मिलते रहते थे माने हाल-चाल लेने को ही। आप कह सकते है हम 'लंगोटिया यार' हैं हलांकि हमने बदल के कभी पहनी नहीं है आज तक। हम दोनों लोग पड़ोसी हैं, और हमारे रिश्ते आज पानी+दूध की तरह हैं जिसे आजकल का समाजिक लैक्टोमीटर नही माप सकता है।

             खैर छोड़िये ये सब बातें कुछ जानते है पुनीत भाई के बारे में____
           बनारस, फ़ैजाबाद, इलाहबाद में इंटरमीडियट तक की पढाई पूरी हुई.....चूँकि पिता जी पुलिस में थे इस कारण तबादलों के साथ स्कूल भी बदलते रहे।
         आज से लगभग 7 साल पहले आपके पिता जी ड्यूटी पर कुछ बदमाशों से भिड़ंत में घायल हो गये और बहुत जिम्मेदारियों का भार देते हुए दुनिया से रुखसत हो लिए..... इतनी कम उम्र का लड़का एक छोटी बहन और माँ.... अभी दुनिया को करीब से देखा भी नही था, मस्ती भरे दिन चल रहे थे हाईस्कूल पूरा हुआ था शायद......दुनियादारी की कोई ख़बर नही सम्हालने को, मार्गदर्शन को घर के बुजुर्गों का साथ नहीं.........।
          और इन्हीं परिस्थितियों ने पुनीत को इतना समझदार और क़ाबिल बनने को प्रोत्साहित किया.....हम और हमारा परिवार सदा से ही साथ रहा है हर क्षण में।
          आज बहन IIT से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है और पुनीत भाई IIMC से पढ़ाई पूरी करके एक प्रतिष्ठित न्यूज पोर्टल  #बोलता_हिंदुस्तान  में पत्रकार #बोलता_यूपी के एडिटर इन चीफ हैं। निष्पक्ष और बेख़ौफ़ पत्रकारिता में आज एक नाम आपका भी है....जिससे मैं ख़ुद को गौरान्वित महसूस करता हूँ। मेरा हमेशा साथ देने वाले भाई बहुत प्यार आपको।
        दुआ है आप हमेशा मेरे साथ रहो।

             ― अश्विनी यादव

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

भीमराव अम्बेडकर जयंती

धत्त साले तू एकदम 'चमार' लग रहा है बे.....शक्ल तो एकदम 'भंगी' वाली है।
बहुत बेकार और है तू 'चमारिन' कहीं की.....
___ये शब्द जातिसूचक है और आज 21वीं सदी में भी समाज के नालायकों द्वारा इसे गाली के तौर पर इस्तेमाल करने वाले समाज में आपसी सौहार्द की बात करते हैं, समभाव की बात करते हैं.....अम्बेडकर जयंती की रेलम-पेल बधाई दिए पड़े हैं।
खैर छोड़िये सब समाजहित में सौहार्द, समभाव, सामाजिक न्याय के क्षेत्र में अद्वितीय कदम उठाने वाले श्री भीमराव अम्बेडकर जी की जयंती पर समस्त देशवासियों को हार्दिक बधाई।
        "खुद को बदलिए सिर्फ मुखौटा बदलने से कुछ नहीं बदलेगा,,

            ― अश्विनी यादव

जमीर जिंदा रखना

जा रहे हो बेशक हाथ छोड़ दे मिरा,
मैं चला जाऊँगा तन्हा ही चाँद तक,

         मेरे भाई तुमसा क़ाबिल होने के लिए उसे शायद एक सदी और लगेगी, और तुम्हारा साथ खो देना किसी बदनसीबी से कम नहीं.....कुछ लोंगों की किस्मत अच्छी होती है की "हम मिलते हैं उन्हें, और वो ख़ुद को इतना क़ाबिल समझ लेते है की भूल जाते है की हम उन्हें आसानी से हाथ बढ़ाएं हैं साथ एवं सहयोग के लिए.....हमकदम बनने के लिए लेकिन जब वो दूर से देंखेंगें तो नजर आएगा की सैकड़ों शख्स उससे आगे खड़े है कतार में हमारे वास्ते।
      अपना एटिट्यूड। वापस लाओ और जब सामने वाला अपनी औकात भूल जाये तो खुद को कठोर बना लीजिये अन्यथा दुनिया और वो शख्स आपको बेवकूफ़ और कमजोर समझेगा.......अपनी क़ाबिलियत दिखाओ और चलो "चाँद के सफ़र पर,, कारवां। होगा तुम्हारे पीछे। वादा रहा।
   खुश रहो प्यारे भाई।
          ― अश्विनी यादव

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

दादा श्री भरत भूषण पंत 'Dada Bharat Bhusan Pant Ji'

एक दफ़ा तो ऐसा लगा की साँस ही रुक जाएगी,
दिल में अदबो―ख़ुशी इससे कम न होनी चाहिए,

लबों की कंपकंपी से लगा जीभ ही कट जाएगी,
ये प्यार का बरसात कभी खतम न होनी चाहिए,

बादल से आसमां में लगा चांदनी भी छुप जाएगी,
बस फिजाओं में अना कभी कम न होनी चाहिए,

ख़जाना लूटने में लगा की उमर ही लग जाएगी,
ऐ ख़ुदा कोहिनूरे-चमक भी कम न होनी चाहिए,

      ......मैं जब से जुड़ा बस पढ़ता रहा हूँ और इतना सीख रहा हूँ की कदमों के निशाँ मिटने न पाये इससे पहले ही उस पथ पर अग्रसर हो जाया जाये....
बैंक जैसी जोड़-गुणा-गणित वाली जगह से मैनेजर रहते हुए शायरी करना वाकई बहुत ही अलग अंदाज रहा है.....कई किताबें, ढेर सारे सम्मान, अवार्ड....और हल्की सी वो सफ़ेद दाढ़ी। गोल्डन चश्मा, बिल्कुल सफ़ेद कुर्ता-पैजामा.....समझाते हुए वो आवाज.....जो मुझे टोंक नही रही थी और अपनी बात भी कर रही थी। ये दादा श्री भारत भूषण पंत जी की आवाज है....ये सलीका उन्ही पर जंच रहा था।
मैनें एक पत्रकार की तरह दादा से सब पूंछा....एक बच्चे की उत्सुकतावश अपने लिए सारी बात की....साहित्य के बारे में जानकारी ली...अपने कैरियर के बारे में सलाह ली हमने। अपने नये कार्यों के शुभारम्भ के लिए आशीर्वाद भी बटोर लिया।

     बेहद शालीन शांत सौम्य व्यक्तित्व के धनी इस दौर के बेहतरीन शायरों में से एक श्री भरत भूषण जी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.....मैं अश्विनी, और साथ में भाई निलेश शर्मा जी "मि0 इरिटेटिंग" को सुअवसर मिला।
हम दोनों की ये कई दिनों से ये लालसा थी की इस छत्ते से शहद निकाल लिया जाये.....यकीन मानिये हम और भी
  ''शहद चुरा लेते आपके मधुकोष से,
      पर व्यस्तता की मक्खी का डंक लग गया,,
बेवसाइट विस्मृता 'vismtrita' के लिए मार्गदर्शन और शुभाशीष भी लिया,

          ― अश्विनी यादव