नव रात्रि के पावन पर्व एवम हिंदू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं....अत्यंत हर्षित हूँ ये सूचित करने के लिए की हमारी 'टीम विस्मृता' की मेहनत से हमारी बेवसाइट (पोर्टल) का लगभग सारा कार्य पूरा हो चुका है.....
आपकी रचनाओं और शुभकामनाओं की प्रतीक्षा है। हमारी टीम में आपका हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन है।
― अश्विनी यादव
( टीम विस्मृता )
हमें प्रयास करते रहना चाहिए ज्ञान और प्रेम बाँटने का, जिससे एक सभ्य समाज का निर्माण किया जा सके।
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शनिवार, 17 मार्च 2018
vismrita हमारे बीच में
शनिवार, 17 फ़रवरी 2018
फ़ूलन के ज़ख्म फ़ूलन का फ़ैसला
वो चीखी-चिल्लाई भी पर उठा ले गए।
भागी, कूदी, काटी भी पर उठा ले गए।।
साहब ने मनमर्जी की और सज़ा दे गए।
वो राम दुहाई अर्जी दी पर सज़ा दे गए।।
सो रहा राम हमारा सोया था कान्हा भी।
वो घसीटे कोठरी गए चुप था थाना भी।।
बारी-बारी लूट रहे थे रौबीली मूँछों वाले।
ख़ैरात जान टूट पड़े खानदान ऊंचे वाले।।
ब्लाउज़ के इतने टुकड़े हुये क्या बोलूं।
साड़ी तन से जाने कब छूटी क्या बोलूं।।
पेटीकोट जा बनी साहब जी की पगड़ी।
वो डरते डरते निहत्थे ही सबसे झगड़ी।।
खुद को वीरों का खानदान बतलाने वाले।
नोंच-नोंच कर जिस्म से पेट भरने वाले ।।
गांव के जमींदारों का यूँ पौरुष जागा था।
बिना पट वक्ष-नितंब ले जिस्म भागा था।।
जननांगों का खूब प्रदर्शन ऐसे होता रहा।
बच्ची के बाप-भाइयों का लहू सोता रहा।।
ऊँचें घराने वाले जो यूँ छूने से कतराते थे।
गर आबरू मिले तो काट काटके खाते थे।।
मर्यादा सब चली गयी देश चुप रहा सारा।
ख़ाकी वाले खद्दर वाले का हाथ रहा सारा।।
बोलो कौन जायेगा भारत के न्यायालय में।
पंचों ने ही इज्ज़त लूटी गांव के पंचायत में।।
जीना दूभर करके सबने कालिख़ पोती है।
वो बाप भी गुनहगार है जिसकी वो बेटी है।।
मर जाते बचाने में तब भी तो अच्छा होता।
गर जिंदा रह गए थे बदले को सोचा होता।।
टीका लगा माथे पे जय भवानी गाया उसने।
एकनाली लोहे की आखिर में उठाया उसने।।
दामन के दागों का हिसाब लगाया फ़ूलन ने।
अपने हर चोंटों पे मरहम लगाया फ़ूलन ने।।
जो जवानी जोश में थी गुरुर आसमां पे था।
ज़बरदस्ती का हुनर जिनके खानदाँ में था।।
उन सबके छाती में पीतल उतारा फ़ूलन ने।
इनके जैसे बहुतों किया किनारा फ़ूलन ने।।
बागे-खुशहाली में ही कटा था नीम करैला।
अपने ज़ख्म, आबरू तो हो अपना फ़ैसला।।
© अश्विनी यादव
गुरुवार, 25 जनवरी 2018
भूमि को पहले जन्मदिवस पर बधाई
मेरी जान तुम्हें जन्मदिवस पर
ढेरों ढेर बधाई है,
घर-आंगन में खुशियां गूँज रही
जब से तू आई है,
मेरी जान तुम्हें जन्मदिवस......
बंजर बंजर से हम सहरा में तू
कोपल सी आई है,
घर के मुरझाये बागों में कूकने
कोयल सी आई है,
सुनो जरा 'भूमि' बिटिया रानी
बीते एक बरस से,
मुझ शज़र पर तू सावन सी
हर दिन छाई है,
मेरी जान तुम्हें जन्मदिवस पर
ढेरों ढेर बधाई है.......
.......प्यारी भतीजी भूमि को पहले जन्मदिवस के अति शुभावसर पर अनन्त बार शुभकामनाएं.....आकाश भर आशीर्वाद....मेरी दुआएं मेरी बच्ची तुम्हारे साथ हैं.....
― अश्विनी यादव
सोमवार, 8 जनवरी 2018
मेरी घड़ी, चौराहा और तुम
छोटी सुई को बार बार
लगातार करती रही पार
मेरी घड़ी की बड़ी सुई
और मैं एक बार घड़ी
एक बार उस रस्ते को
जिससे तुम आओगी,
चौराहे के वो किनारा
जो अक्सर पूछ लेता है
वो देर से आएगा तो
क्यूं पहले आ जाते हो
फिर मेरे पास मुस्कुराने
अपनी आंखें चमकाने
सिवाय और न होता,
चौराहे की बाकी सड़के
हंसती रहती थी
मैं उलझन में खुश होता
और घड़ी से पूंछता
तू और कितनी देर से
आज भी आएगी
घड़ी की सुई बढ़कर
कहती थी वो आ रही,
इत्ती गाड़ियों के शोर
बाजार की चहल पहल
फेरीवालों के बुलावों
के बीच मे भी
मैं साफ सुन लेता था
अपनी तेज हुई धड़कन
अपने घडी की टिकटिक
तुम्हारे बिना पायल के
कदमों की आहट
साफ़ सुन लेता था मैं,
वक़्त तब भी न था
आज भी नही है न
तुम्हारे पास फिर से
की चले आते मिलने
पहले जैसे देर से सही
पर आ तो जाते ही
बड़ी बेसबर सी
थोड़ी पथराई हुई
मेरी आँखें
जरा सा धीरे हुई
मेरी घड़ी
हर रोज सँवरता सा
ये जवां होता चौराहा
हां इंतजार में हैं
तुम आओगी फिर
देर से ही सही,
पल्लू खुद में खुश
सबसे मिलती हुई
पैदल चलती हुई
तुम आओगी
देर से ही सही.....!!
― अश्विनी यादव
रविवार, 7 जनवरी 2018
एक छाता और थोड़ी बारिश
शुरू कहाँ से करूँ
मैं ये छोटी सी कहानी
वो-मैं साथ ही थे
और थोड़ी सी जवानी,
बस मैं तकता रहा
आ जाये अब आ जाये
थोड़ी सी बारिश
औ क़िस्मत जगा जाये,
आसमां में घटाएं
जरा सा ही रहम कर दें
कुछ बूंदे बरसे औ
हमें इक छाते में कर दें,
बस इत्ती सी ही
इक ही तो ख़्वाहिश है
आज वो पास है
यूँ फुंकी की नुमाइश है,
जरा बरस देगा
तेरा क्या चला जाएगा
सोच इस लम्हें में
सदियों आराम आएगा,
― अश्विनी यादव
बुधवार, 3 जनवरी 2018
ये वादा रहा तुमसे
हम ये वादा नहीं करते,
तुझे जमाने की सारी खुशियां देंगे,
पर ये वादा है तुमसे,
अपने हिस्से की सारी खुशियां देंगें,
मंजिल दूर होगी गम नही,
साथ रहो सारी दूरी तय कर लेंगें,
लड़ना हुआ जहां से भी,
तुम्हारा हाथ पकड़ ये भी कर लेंगें,
पर वादा है तुमसे.............।।
हर साज़िश हर दर्द हमसे,
होकर ही गुजरेगा ये वादा रहा,
प्यार न बदलेगा कसम से,
हर दिन ही बढेगा ये वादा रहा,
आंसू न मिल पायेगा तुमसे,
ऐ सनम हम ऐसा जतन कर देंगें,
पर यह वादा रहा तुमसे,
अपने हिस्से की सारी खुशियां देंगे,
पर ये वादा रहा तुमसे.........।।
― गुड्डू यादव
गुरुवार, 21 दिसंबर 2017
भोर हो गयी कैसे मान लूँ
भोर हो गयी कैसे मान लूँ,
अभी तक न तुम
बाथरूम में गुनगुनाई हो,
न ही गीले बाल
झटकते हुए आयी हो,
न ही ठंडी चाय पर
तुम जोंरों से चिल्लाई हो,
न रजाई खेंचकर तुम
अपना मुखड़ा दिखाई हो,
भोर हो गयी कैसे मान लूँ,
अभी तक न तुम
आईने से मुलाकात की हो,
न ही घर की चीजों से
अकेले में कोई बात की हो,
न पेपर फेंककर तुम
घर के हालात सुनाई हो,
न ही तुलसी पौधे पर
लोटे से सौगात चढ़ाई हो,
भोर हो गयी कैसे मान लूँ,
अभी तक न तुम
तुम्हारी बिंदी से मिल पायी हो,
न ही सिंदूरदान को
खाली सी मांग दिखाई हो,
न झील सी आंखों को
काजल का पहरा दिलाई हो,
न ही मोगरा फूल का
तुम गजरा आज लगाई हो,
भोर हो गयी कैसे मान लूँ,
अभी तक न तुम
अच्छा छोड़ो मैं मान लेता हूं
की भोर हो गयी,
तुम नहाते नहाते गुनगुना भी ली,
बाल झटक दिए, पेपर फेंक दिया,
चाय दे दिया, चिल्ला भी लिया,
तुम सज संवर भी ली,
किचन से भी मिल ली,
अगरबत्ती की महक भी आ गयी,
तुलसी में जल भी दे दिया,
पर अब भी कुछ अधूरा है,
तुमने बात तो सपनो में कर ली,
पर अपनी सूरत कहाँ दिखाई हो,
काश की तुम सामने होती
और वो हरकतें करती तुम
जैसा पहले करती आयी हो,
तब मान लेता भोर हो गयी
तुम आकर मुझको जगाई हो,
भोर हो गया कैसे मान लूँ.....
― अश्विनी यादव