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शुक्रवार, 27 नवंबर 2020

हे मोहन (गीत )

राधा रानी को मेरे घर भी आना होगा
संग में कान्हा जी को लेकर ही आना होगा....

आना होगा...आना होगा....

हम तो पलकें बिछाये बैठे हैं राहों में....
ख़्वाब लाखों सजाये बैठे हैं आँखों में...
ये दुनिया हमसे गिला करती वादों पर...
नाम तेरा ही लिक्खे रहती है अधरों पर..

आख़िर क्यूँ...?

इस जीवन से कब ग़म का जाना होगा..
मेरे मोहन मेरे प्यारे का आना होगा....

हाँ आना होगा.... आना होगा....

राधा रानी को मेरे घर भी आना होगा
संग में कान्हा जी को लेकर ही आना होगा...

बिन सांवरिया के मुहब्बत का मानी क्या है..
सुन मीरा को तो जानो ये कहानी क्या है..
ऐसे भला कौन रहेगा यूँ जोगन बनकर...

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

ग़ज़ल ( political)

आज तुम्हारी हरक़त पर मैं थूक रहा
या'नी समझो आदत पर मैं थूक रहा

तुझ मक्कार पे दुनिया सारी थूकी थी
ओ झूठे तिरी फ़ितरत पर मैं थूक रहा

अँधियारे में ज़बरन चीज़ जली कोई
हद है ऐसी उजलत पर मैं थूक रहा

चीख़ें, मातम, आँसू, लाठी, बेचैनी
ज़ुल्मी तेरी चाहत पर मैं थूक रहा

सर कुचलोगे तो क्या चुप हो जाऊँ मैं
हिटलर तेरी बरक़त पर मैं थूक रहा

      ~ अश्विनी यादव

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

नज़्म

तुम्हारा चेहरा ही बदला है
मेरी आँखें वही हैं
अब न तुम अच्छी लगती हो
न ही तुम्हारी आँखें
तुम्हारी ही आवाज बदली है
मेरे कान वही हैं
अब न तुम्हें सुनना अच्छा है
न ही तुम्हारी बातें
कुल मिलाकर ये समझो
मैं वैसा ही हूँ
लेकिन अब न तुम अच्छी हो
न ही तुम्हारा साथ।
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  अश्विनी यादव

बुधवार, 26 अगस्त 2020

नज़्म ( साहब की तैयारी )

साहब ने सारी तैयारी कर रक्खी,
हर इक घर पर पहरेदारी कर रक्खी,

जो बोलेगा उसको पीटा जाएगा,
कोर्ट -कचहरी रोज़ घसीटा जाएगा,

पहले तुमको थाने में बुलवाएंगें,
फिर वर्दी से मनमर्ज़ी करवाएंगें,

लेकिन साहब तुमको इतना ध्यान रहे,
कर्म सभी का हासिल है ये ज्ञान रहे,

जैसे तुम यूँ सबको आज रुलाते हो,
तुम भी रोये थे क्यों भूले जाते हो,

हाँ मा'लूम हमें हैं तुम ही दाता हो,
जेल नहीं तो मौत के भाग्य विधाता हो,

ईश्वर जाने कब तक का ये खेला है,
जाने कैसे हम सब ने ये झेला है,

रोजी रोटी का उनका इक वादा था,
पर लगता है ये सब शोर सराबा था,

जंगल में हम रहते हैं ये बोले थे,
भाषण में वो अंगारे ही घोले थे,

जात बिरादर का डंका भी पीटे थे,
यूँ समझो बस ये सब कर ही जीते थे,

इक वादे पर सौ वादा कर ऐंठे थे,
हाथों का ये खेल समझ कर बैठे थे,

उस दिन तक तो पैरों में गिर जाते थे,
हरक़त ये चमचों से भी करवाते थे,

उस मालिक को जैसे ही सत्ता सौंपी,
मझधारे में हमने थी नौका सौंपी,

उस दिन से फिर रोज़ हमें दुत्कारा है,
अब आख़िर के हक़ में वोट हमारा है,

बढ़कर आगे आओ फिर टकराने को,
उस ज़ुल्मी के मुँह पर सच कह जाने को,

देखो कितनी आग रखे हो सीने में,
बाहर ला के शामिल कर लो जीने में,

वोट से पहले गुरूर-ए-हाकिम तोड़ो जी,
बिन तोड़े यूँ कॉलर तो मत छोड़ो जी,

     ~ अश्विनी यादव

शनिवार, 11 जुलाई 2020

ग़ज़ल ( इलाहाबाद )

रिश्ता इलाहाबाद है वादा इलाहाबाद
दिल का सुकूँ है बन चुका पूरा इलाहाबाद।

हर वक़्त का अच्छा भला सिक्का इलाहाबाद
इस वक़्त हमको है मिला शाना इलाहाबाद।

ग़मगीन होते ही मेरे छपटा लिया है यार
यूँ चाहता है मुझको ये मेरा इलाहाबाद।

इक मुख़्तसर सी याद या दिल में दबाए प्यार
हर एक शय में है मेरे ज़िन्दा इलाहाबाद।

हैं इल्म इसके पास इतना सब्त-ए-शहकार
पहली नज़र में शह्र था भाया इलाहाबाद।

जब भी कभी आँखें खुली देरी लिए अल-सुब्ह
इस बात से ही हो गया गुस्सा इलाहाबाद।

इक चाय का कुल्हड़ ज़रा सी हो जलेबी साथ
इक है इसी आदत का अब हिस्सा इलाहाबाद।

दिन भर लिखा दिन भर पढ़ा करता रहा है शाम
फिर रात में भी जागता रहता इलाहाबाद।

ये दिल कहाँ टूटा करे किससे ज़िग़र की बात
हाँ - हाँ वहीं  तो है जहाँ हारा इलाहाबाद।

लो आज मेरे पास है हासिल सभी की रात
बस इक उसी की याद में तन्हा इलाहाबाद।

इक मैं इलाहाबाद हूँ इक तुम इलाहाबाद
फिर भी अधूरा रह गया क़िस्सा इलाहाबाद।

इक फ़िक्र हमने देख ली लेकर हसीं सौग़ात,
आमद हमारी जीत का लाया इलाहाबाद।

कुछ दौर अपने ख़ुद छिपाया कुछ छिपाये दौर,
इक जज़्बनामा लिख रहा तन्हा इलाहाबाद।
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   अश्विनी यादव

गुरुवार, 18 जून 2020

कविता ( हम काले लोग )

हम मज़दूर हैं, हम काले हैं
गिरने की, जलने की, मेहनत की
आदत है हमारी,
लेकिन तुम नाज़ुक हो चुके हो
हमारा ख़ून पीते पीते..

हमारे ये हाथ तेरे
इन हथौड़ों से ज़ियादः
इन पत्थरों से ज़ियादः
मजबूत हो गए हैं
खदाने बदल गईं
कुदालें बदल गईं
लेकिन ये हमारे हाथ
नही बदले तो नही बदले....

हम जानवर तो नही थे
जो यूँ हमें तुमने बेंचा
फिर से ख़रीदा फिर से बेंचा
मैं पूछता हूँ के आख़िर क्यों..?
मेरे रंग के कारण ?
मेरी जात के कारण ?
या मेरे भाषा के कारण ?

चलो मैं फिर से पूछता हूँ
अधिकार किसने दिया ?
ऊँचा किसने बनाया ?
मैं उसी से जंग चाहता हूँ
तुम बीच में मत आना
नाज़ुक हो टूट जाओगे
जब पहाड़ तोड़ दिया
तो तुम कुछ भी नही हो....

~ अश्विनी यादव

शुक्रवार, 5 जून 2020

नज़्म ( ख़ुशनसीब कलम )

तुम आगे की सीट पर बैठी
क़िताब में उलझी हुई थी
और मैं तुम्हारे बगल से
दो सीट पीछे बैठा
तुम्हारे बालों में उलझा था
जिनसे छनकर
तुम्हारे चेहरे की रौशनी
मुझ तक आ रही थी
तुम्हारे उंगलियों के बीच फँसी
वो ख़ुशनसीब कलम
जिसे लगातार अपने होठों से
छुए जा रही थी
और इधर मैं ख़ुद को
कलम सा महसूस
कर रहा था.....
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   अश्विनी यादव