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बुधवार, 1 अप्रैल 2020

नज़्म

कभी कभी यह लगता है 
मैं किसी नाव के जैसा हूँ
इस बेहद बड़े समंदर में 
है इक छोटा-सा वजूद मेरा
और वजूद भी है बस इतना
कि जिस टापू से गुज़रा हूँ
हर इक पर मेरा नाम हुआ

जब कुछ लहरों को पार किया
मुझको, मेरी पहचान मिली 
बहुत सारी नावों के बीच
इक साथी सी नाव मिली
मेरे किस्से फिर ख़ूब चले
लेकिन ये बस मुझे पता था

जब मैं उन लहरों में फँसा था
कितना डूबा कितना उबरा
कितनी बार मरा भी था
मगर सुनो! पागल लहरों
वो सब मेरा अंत नहीं
पर कभी कभी लगता है कि 
मैं मर जाता तो क्या होता।
___________________
     अश्विनी यादव

मंगलवार, 31 मार्च 2020

ग़ज़ल

वो मंजिल दूर लगती जा रही है,
भले गाड़ी ये चलती जा रही है,

हँसा हूँ जोर से लज़्ज़त-ए-ग़म पर,
मिरी उम्मीद बढ़ती जा रही है,

किसी की भूख बढ़ती देखकर ही,
हमारी आँख मुँदती जा रही है,

मिरे आगे ये दुनिया रो रही है,
मिरी भी उम्र घटती जा रही है।

अभी तक मौत से झगड़ा रहा है,
वही महबूब बनती जा रही है ।

जहाँ सारा यहीं श्मशान होगा,
ये जो तलवार खिंचती जा रही है।

कि खाली हाथ से मैं क्या करूँगा,
ये ही मुझको खटकती जा रही है,

सभी त्यौहार अब मातम लगेंगें,
नई दीवार बनती जा रही है,

कहो तो क़ब्र मेरी खोद आएँ,
मिरी भी नब्ज़ रुकती जा रही है.....
____________________
 
   अश्विनी यादव

सोमवार, 27 जनवरी 2020

ग़ज़ल

_________________
जिस दिन कोई आगे बढ़कर आएगा,
तेरे मन में ख़ुद से ही डर आएगा,

तूने ये सब पहले से ही लिक्खा है,
जो आएगा लाश पे चढ़कर आएगा,

अंदर वाले अपने बाहर जाएगें,
बाहर वाला काफ़िर अंदर आएगा,

वो हँसकर सीने से लगाएगा पहले,
उसके बाद पुराना ख़ंजर आएगा,

आख़िर किसको जन्नत मिलने वाली है,
पहले इक वीराना मंजर आएगा,

सबसे पहले तुम अपना कागज लाओ,
उसके बाद हमारा नम्बर आएगा,

इक दिन संसद नाम तिरे हो जाएगा,
मेरे हिस्से जंतर -मंतर आएगा,
___________________
  @अश्विनी यादव

गुरुवार, 23 जनवरी 2020

शे'र और फ़िक्र देखिए

बात आख़िर में कही अब कैसे  हो,
मैंने हँसकर कह दिया 'अब' ठीक हूँ,
_________________शे'र (1)

बात आख़िर में कही अब कैसे  हो,
मैंने हँसकर कह दिया 'हाँ' ठीक हूँ,
_________________शे'र (2)
यहाँ दो अशआर एक जैसे हैं केवल एक शब्द के बदल जाने भर से ही दोनों के मानी यानी कि (  सिचुएशन ) परिस्थिति बदल सी गयी है कहने की......दोनों के जवाब का लहजा और फिक्र दोनों ही बदल से गए हैं।

अब देखते हैं पहले शे'र को तो किसी ने पूरी बात करने के बाद मुझसे आख़िर में हाल पूछा तो जवाब में मैंने हँसकर कहा ''अब ठीक हूँ" इसका मतलब इक तुम्हारे पूछ लेने भर से या तुमसे बात करने के बाद काफी ठीक लग रहा है। एक फ्लर्ट या राहत वाली फिक्र है इसमें।

अब दूसरे शे'र को तो एकदम वैसे ही पूछा गया लेकिन इस बार मेरे जवाब का लहजा एकदम बदला सा है...कि उसने बाद दिखाने के लिए पूछा और मैंने भी बस जवाब देने भर के लिए हामी भर दी कि "हाँ ठीक हूँ,,। इसमें एक झुँझलाहट है, गुस्सा है, बेरुखी है, ऐसा लग रहा है मानो मुझे कोई फ़र्क़ ही नही पड़ता है उसके पूछने से या मेरे जवाब देने से......

सच कहूँ मुझे तो ऐसी बारीकी कभी अजीब लगती थीं लेकिन अब अच्छी लगती हैं। शायरी एकदम कमाल की चीज़ है एक एक शब्द से पूरे मिजाज़ बदले जा सकते हैं। मैं अब ऐसी बातों पर आगे ध्यान जरूर दूँगा।

मैं काफी देर तक इन्हीं दोनों शब्दों में उलझा रहा फिर मैंने अपने लिए पहला वाला शे'र चुना। जिसे पोस्टर पर जगह देना ठीक समझा।

आप मुझे ऐसी बारीकियों से ज़रूर रूबरू करवायें।जो आपके समझ मे हों अभी। मुझे पता चला है कि मीर तकी मीर इस तरह की शायरी के उस्ताद शायर में से एक हैं।
शुक्रिया।❤️
________________
अश्विनी यादव

सोमवार, 6 जनवरी 2020

ग़ज़ल

लाल लहू का खेल हुआ तो कुछ का मरना वाजिब है,
जान गई आज़ादी पर तो इतना मँहगा वाजिब है,

मुल्क़ गया तो जीना कैसा हाथों को आज़ाद करो,
उस ख़ूनी, जालिम का आख़िर हमसे डरना वाजिब है,

सच की ज्योत जलाने वाले पागल में से मैं भी हूँ,
तेरा, मेरा, इसका, उसका, सबका लड़ना वाजिब है,

ज़ुल्म के आगे पत्थर था चूर हुआ हूँ अच्छा है,
अपने 'अपनों' पर सारे ख़्वाब बिखरना वाजिब है,

बन्दूक उठाकर सत्ता पर काबिज तो हो सकते हो,
ऐसे तो सबकी नज़रों में तेरा गिरना वाजिब है,

ग़र सोच रहे हम पीछे हट जाने वाले कायर हैं,
इस सीने से गोली भी आज गुजरना वाजिब है,
__________________
अश्विनी यादव

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

ग़ज़ल ( क्या कर लेगा अब)

आख़िर तू क्या कर लेगा अब,
कितने दिन बन्द रखेगा अब ,

कैद किया वो हर इक पंछी,
लेकर के जाल उड़ेगा अब,

एक न इक दिन तेरा फेंका,
पत्थर ही माथ लगेगा अब,

हम इस जंगल से परिचित हैं,
वीराना हमसे डरेगा अब,

कल शहर भरा था बातों से,
हाकिम भी ज़ुल्म करेगा अब,

हमको लड़वा कर बाँट दिया,
यानी कुछ भी न बचेगा अब,
_________________
अश्विनी यादव​​

रविवार, 22 दिसंबर 2019

तू झूठा है झूठों का क्या

यूँ ज़हर सदा उगलेगा क्या..?
अब राह नही बदलेगा क्या..?

गिरने से पहले जनता का,
तू हाथ कभी पकड़ेगा क्या..?

तू बनता है मज़लूम सदा,
सो दर्द मिरा समझेगा क्या..?

तुझसे कोई उम्मीद नही,
तू झूठा है झूठों का क्या..?

जब तू इंसान नहीं है तब,
डर ईश्वर का रक्खेगा क्या..?

चन्दन वन से इस भारत को,
तू विषधर है छोड़ेगा क्या..?

वादा झूठा, बातें झूठी,
गंगा की लाज रखेगा क्या..?

रोहित और नज़ीब कहाँ हैं ?
चीख़- पुकार सुनेगा क्या,

हिन्दू -हिन्दू रटता है तू,
कमलेश के घर पे कहेगा क्या..?

भात बिना इक मरती बिटिया,
लाशों से देश बनेगा क्या..?

तुझको क्या लगता है ज़ालिम,
सदियों तक राज चलेगा क्या..?

देश बँटा है लोग बँटे हैं,
पागलपन ही चाहेगा क्या..?

तू दुनिया से ऊपर का है,
सब लम्बी ही फेंकेगा क्या..?

इक दिन मोहब्बत का पौधा,
बाग-ए-नफ़रत में उगेगा क्या..?
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अश्विनी यादव