शुरू कहाँ से करूँ
मैं ये छोटी सी कहानी
वो-मैं साथ ही थे
और थोड़ी सी जवानी,
बस मैं तकता रहा
आ जाये अब आ जाये
थोड़ी सी बारिश
औ क़िस्मत जगा जाये,
आसमां में घटाएं
जरा सा ही रहम कर दें
कुछ बूंदे बरसे औ
हमें इक छाते में कर दें,
बस इत्ती सी ही
इक ही तो ख़्वाहिश है
आज वो पास है
यूँ फुंकी की नुमाइश है,
जरा बरस देगा
तेरा क्या चला जाएगा
सोच इस लम्हें में
सदियों आराम आएगा,
― अश्विनी यादव
हमें प्रयास करते रहना चाहिए ज्ञान और प्रेम बाँटने का, जिससे एक सभ्य समाज का निर्माण किया जा सके।
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रविवार, 7 जनवरी 2018
एक छाता और थोड़ी बारिश
बुधवार, 3 जनवरी 2018
ये वादा रहा तुमसे
हम ये वादा नहीं करते,
तुझे जमाने की सारी खुशियां देंगे,
पर ये वादा है तुमसे,
अपने हिस्से की सारी खुशियां देंगें,
मंजिल दूर होगी गम नही,
साथ रहो सारी दूरी तय कर लेंगें,
लड़ना हुआ जहां से भी,
तुम्हारा हाथ पकड़ ये भी कर लेंगें,
पर वादा है तुमसे.............।।
हर साज़िश हर दर्द हमसे,
होकर ही गुजरेगा ये वादा रहा,
प्यार न बदलेगा कसम से,
हर दिन ही बढेगा ये वादा रहा,
आंसू न मिल पायेगा तुमसे,
ऐ सनम हम ऐसा जतन कर देंगें,
पर यह वादा रहा तुमसे,
अपने हिस्से की सारी खुशियां देंगे,
पर ये वादा रहा तुमसे.........।।
― गुड्डू यादव
गुरुवार, 21 दिसंबर 2017
भोर हो गयी कैसे मान लूँ
भोर हो गयी कैसे मान लूँ,
अभी तक न तुम
बाथरूम में गुनगुनाई हो,
न ही गीले बाल
झटकते हुए आयी हो,
न ही ठंडी चाय पर
तुम जोंरों से चिल्लाई हो,
न रजाई खेंचकर तुम
अपना मुखड़ा दिखाई हो,
भोर हो गयी कैसे मान लूँ,
अभी तक न तुम
आईने से मुलाकात की हो,
न ही घर की चीजों से
अकेले में कोई बात की हो,
न पेपर फेंककर तुम
घर के हालात सुनाई हो,
न ही तुलसी पौधे पर
लोटे से सौगात चढ़ाई हो,
भोर हो गयी कैसे मान लूँ,
अभी तक न तुम
तुम्हारी बिंदी से मिल पायी हो,
न ही सिंदूरदान को
खाली सी मांग दिखाई हो,
न झील सी आंखों को
काजल का पहरा दिलाई हो,
न ही मोगरा फूल का
तुम गजरा आज लगाई हो,
भोर हो गयी कैसे मान लूँ,
अभी तक न तुम
अच्छा छोड़ो मैं मान लेता हूं
की भोर हो गयी,
तुम नहाते नहाते गुनगुना भी ली,
बाल झटक दिए, पेपर फेंक दिया,
चाय दे दिया, चिल्ला भी लिया,
तुम सज संवर भी ली,
किचन से भी मिल ली,
अगरबत्ती की महक भी आ गयी,
तुलसी में जल भी दे दिया,
पर अब भी कुछ अधूरा है,
तुमने बात तो सपनो में कर ली,
पर अपनी सूरत कहाँ दिखाई हो,
काश की तुम सामने होती
और वो हरकतें करती तुम
जैसा पहले करती आयी हो,
तब मान लेता भोर हो गयी
तुम आकर मुझको जगाई हो,
भोर हो गया कैसे मान लूँ.....
― अश्विनी यादव
रविवार, 17 दिसंबर 2017
विस्मृता ( Vismrita )
मेरी चाय जब भी मेज पर आती है, तो मैं उस कॉफ़ी को याद करता हूँ एक जोड़े कप में आई थी..... पिज्जा का वो एक टुकड़ा जो साथ खाया था....मुझे उसका स्वाद न याद है न उस वक्त समझ मे आया था। क्युंकि सामने एक खूबसूरत चेहरा और उसकी आंखें....जिसे मैं बातों बातों में देख ले रहा था....काहे की सामने से देख पाऊँ, इतनी हिम्मत नही हो रही थी....।।
ये जो भी समय था कुछ धुंधला हुआ सा अभी तक है मेरे जेहन में,,,,शायद यहीं है 'विस्मृता'....
तुम आज भुलाई जा चुकी हो ये दिलाशा लगतार मैं दिलाते हुए फिर अपनी चाय की चुस्कियों पर आ टिका हूँ। हाँ मुझे अब कॉफ़ी का स्वाद अजीब लगता है....।।
कैफेटेरिया के उस सीट से प्यार कहूँ या नफ़रत पर एक दो दिन में एकाध बार उस पर बैठ ही जाता हूँ। तुम दिखती भी हो तो ये पक्का नही कर पाता हूँ कि देखूँ या न देखूँ....और देखता भी नही हूँ...पर मैं खुद भी नही जानता कि कब में उसका चेहरा मेरे आंखों से होता हूँ...दिमाग तक चला जाता है पता नही।
इस विस्मृता से मैं जल्द ही रूबरू करवाऊँगा आप सभी को....
गुरुवार, 7 दिसंबर 2017
काश की तुम मिलने आती
कोहरे की पहरेदारी थी
काश की तुम मिलने आती,
सर्द रातों की दुश्वारी थी
काश की तुम समझ पाती,
भेज ही देती किसी तरह
यादों का गर्म बिछौना तुम,
प्रेम पाश के कम्बल को
ओढ़ा दी होती मुझपर तुम,
दिन चमकना भूल गया है
क्या इसकी भी साझेदारी थी,
काश की तुम मिलने आती
फिर कोहरे की पहरेदारी थी,
शिकायत भी न है कोई
गिला न हमसे रखना तुम,
हवाओ से कहा अकेले में
वो मुझसे कभी कहना तुम,
इन सड़कों पे दीद मेरी ये
ढूंढ रहीं हैं इक पहचाने को,
वो रस्ते बदल रहा देखो
अरे मिले न मुझ दीवाने को,
कतरा कतरा रात कटी
फ़ना होने की जिम्मेवारी थी,
कोहरे की पहरेदारी थी
काश की तुम मिलने आती,
( पंक्तियाँ :― अश्विनी यादव )
सोमवार, 20 नवंबर 2017
आज बाज़ार गये थे
चटपटे चाट वाले के
तवे की खनखन,
बगल गुब्बारे वाले के
घुनघुनों की छनछन,
चूड़ी वाली चाची के
शीशों की चमक,
यादव जी के घी के
लड्डूवों की महक,
सब खरीद लायें हैं
हम बाज़ार गये थे।।
सीटियों की सी-सी
गाड़ियों का शोर,
बन्दर की खीं-खीं
नाचता इक मोर,
डमरू की डम-डम
लकड़ी का सांप,
चलते रहे थम-थम
भठ्ठियों की भाप,
सब बटोर लाये हैं,
आज बाज़ार गये थे।।
चमकता हुआ ताज
एक परी की छड़ी,
उड़ने वाला जहाज
एक छोटी सी घड़ी,
पूरा झोला भर खुशी
होंठों की मुस्कान,
तैरते हवा पर हंसी
झूले की उड़ान,
सब घर लायें हैं,
आज बाज़ार गये थे।।
प्यारी भतीजी भूमि के लिए ये दूसरी कविता ''आज बाज़ार गए थे''......
― अश्विनी यादव
बुधवार, 8 नवंबर 2017
जन्मदिवस
जब भी मेरा ख़्याल ही कर लेते हो,
मेरे अपनो, मुझसे प्यार कर लेते हो,
....... आप सभी द्वारा इतना प्यार सम्मान और अपनत्व मिला की मेरे दिल में खुशियां हिलोर ले रही है। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे इतना प्यारा परिवार इतने प्यारे दोस्त इतने प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले लोगों से ईश्वर ने मुझे रूबरू करवाया।
हर बार मैं मंदिर जा कर और बड़ों का आशीर्वाद लेकर ही अपना जन्मोत्सव मनाता था लेकिन इस बार इन सबके हमने केक भी काटा और ट्रीट भी दी।
मेरे सभी भाइयों-बहनों, मित्रों, परिवारजनों एवं शुभचिंतकों का हृदय से आभार। मेरी ईश्वर से ये कामना है कि आप सभी का साथ एवं प्रेम मुझे ताउम्र मिलता रहे।
आपका अपना :- अश्विनी यादव