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बुधवार, 13 जुलाई 2016

इन्सान जिन्दा है

"सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा बहुत बार सुना हमने..लेकिन घाटी में ही इंसानियत के , देश के , मजहब के दो रंगो में देखा हमने...
कुछ पंक्तियाँ...
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लाख सूर्य अस्त हो जाये तो
हम चिराग जलाते रहेंगे,
अपने घर के दरवाजे पे
हिदुस्तानी लिखवाते रहेंगे,
सीख दी औलादो को यही
पत्थर, हांथो में उठाना नही,
केसर की क्यारी है हमारी
इस पर सवाल उठाना नही,
क्या मियां क्या हिन्दू भाई
सौहार्द बनाये रखना तुम,
सेना सलामी तिरंगा कहानी
लाल न कभी बिसरना तुम,
हिन्दू, हिंदी, हिन्द धरा की
माने-अलख जलाना तुम,
कभी दहशतगर्दी में पड़कर
'आतंकी' न बन जाना तुम,
हम सभी है वतन के सिपाही
सरहदे धूमिल होने न देंगे,
बुरहान, अफजल भले थे हमारे
अब कोई जाकिर होने न देंगें....!

          ©  अश्विनी यादव

मंगलवार, 31 मई 2016

अनमोल बचपन

    
धूल में खेलकर घर आना
फिर छिपते-छिपाते अंदर जाना
माँ के प्यार की थपकी मार
सब अक्सर याद आया करता है
चंचल चितवन मन हो जाता
जब 'बचपन' याद आया करता है।
साईकिल के पुराने टायर ले
चल पडे हम सैर सपाटे पे
नजर ज्यों ही सबकी पडे हमपे
पहिया छिन जाता था हाथों से ,
इस खेल के चक्कर में मै
अक्सर पीटा जाया करता था
आखें नम हो जाती है मेरी
जब बचपन याद करता है, ।
करें बहाना बगिया जायें
बगिया से फिर नदिया जायें
सब लँगोटिया यारो के संग
धमाचौकड़ी खूब मचायें,
वो सौंधी सी मिट्टी की महक
जिसमे पूरा दिन बीता करता था
अमिट छाप देता जीवन को
जो आँखे छलकाया करता है
लगे कि कल का दिन था वो
जब बचपन याद आया करता है।
टप-टप की आवाज जो आई
तब फटे किताबों के पन्ने
घर से बाहर भागे भीगने
और अपनी नाँव तैराने को
नन्हें हाथों ने थाम्हे छन्ने
आँगन में मछली पकड़ने को,
चहचहाता खेलता कूदता
बेफिकर सा वो शरारतपन
काश! कि लौट सकता फिर
वो प्यारा जीवन मेरा "बचपन"।।
     
    कवि :- अश्विनी यादव
आज बाल दिवस के शुभावसर पर समस्त पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं।

गुरुवार, 26 मई 2016

तेरी-मेरी कहानी

नाम तेरा हम लिखते मिटाते रहे
तुझे झरोखों से देख मुस्कुराते रहे
चर्चा कालेज में थी हूँ मै आशिक तेरा
वो भाभी है तेरी हम समझाते रहे
एक तेरे चक्कर में कितने लफड़े हुए
अपने हमयार भी नजरे चुराने लगे
बस तुझे छोड़ सबको थी ये खबर
क्यूँ तेरे नाम पे लुटने-लुटाने लगे
यूँ दिलकशी में पढाई चौपट हो रही
ध्यान तेरे सिवा और कुछ भी न था
कह न पाया कभी तुमसे दिल की बात
और तुम हँसकर सबसे बतियाते रहे
मै आंवारा न होऊ सो शहर आ गया
पूरा शहर परियो की बगिया लगी
भूलने लगा तुम्हे तितलियों में रहकर
जिम्मेदारी पढाई की बढने लगी
बीच में जब भी घर आना हुआ
तुम हमे देखकर शरमाने लगे
एक साल न गुजरे तेरी शादी हो गई
आज अफसर हो हम भी कमाने लगे
फिर भी अफ़सोस है उस अधूरेपन का
जिसे ख़यालों में हम गुनगुनाते रहे
मेरे यारों को उनकी वो भाभी न मिली
जिन्हें हम "जान" कहके बुलाते रहे...

कवि- अश्विनी यादव

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

ये कयामत क्यूँ

एक बूँद की चाहत में तरसता रहा
शायद अंत है निकट अब लग रहा
सूखा है गला न आखोँ से नीर बहे
फटे दर्रों में जल महसूस करता रहा
पेड़ कत्थहे हुए सबकी छाया भी गई
सारी फसलें कटीली झाड़ियाँ बनी
यहाँ पे कोई तो वहाँ पे कहीं
भूख से तड़पती लाशें दिख रही
बड़ा वीभत्स था मंजर देश का
आके अकाल सब बर्बाद करता रहा
मैने भरसक किया जो कर सकता था
हारकर तमाशा मै देखता रहा
कुदरत का कहर क्यूँ इतना निर्मम
हर जगह मौत तांडव करता रही
तरसता तड़पा रहा पूरा जहान
दिल न पसीजा जरा ऊपरवाले का
आसमां का भी दामन न भीगा कहीं
मै कयामत की गुजारिश करता रहा।।
  ©®―अश्विनी यादव

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

एक हसीं सा ख्वाब है तू

सजाकर  माथ  पे बिन्दी
लगाकर आँख में काजल
रचाकर  हाथ  में  मेंहदी
पहनकर  पांव में  पायल
सुर्ख़  होंठों की लाली से
कभी  मुस्कान करती  हो
तुम्ही में खो सा जाता  हूँ
जब हँसकर बात करती हो
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चमकती नाक की नथुनी
खनकते ये हाँथ के कंगन
गाढ़ी  सी  चूनर  धानी
कसी  हुई कमर की कर्धन
मोती  माला  सजी गर्दन
बाली जुल्फों संग लटकती है
समां  थम  सा  जाता है
जब हमारी ओर तकती हो...
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    ―अश्विनी यादव

'व्यथा' ― मेरी जिन्दगी की

सारी जिन्दगी की मेहनत, किसी अपने के लिए अथक परिश्रम किया गया हो और अचानक, से
सब बिखर जाये तो……वो पीड़ा वही समझ पायेगा जिस पर उस वक्त बीत रही होती है...,
इसका दर्द ताउम्र रहता है। और उस पर व्यथित मन से ....
व्यथा - मेरी जिन्दगी
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हवा न जाने कहाँ है
पत्ते भी हिल रहे नही
कहीं हमारे जीवन में
अनहोनी का अंदेशा तो नही
अभी तक मेरे बच्चों ने
उड़ना भी सीखा नही
इन नवजातों ने घरौंदों छोड़
नील गगन देखा भी नही
क्या होगा कैसे बीतेगी
सोच रही थी एक चिड़िया
खुदा सितम करेगा हमपे भी
ये हमने कभी सोच ही नही.....
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वन में चहचाहट बनी थी
कि घिर आये काले मेघा
तरु पूरा हिलने सा लगा
तभी आया तूफानी झोंका
टूट गयी वही टहनी
जिस पर था आशियाँ बना
सब नाजुक नाजुक पन्खो से
जीने की बगावत छेड़ दिये
पर उन सबकी न एक चली
बेदर्दी ने पन्ख भी तोड़ दिये
माँ चीत्कार कर रही थी
और पूछ रही उस जालिम से
जब एक घरौंदा तूने नही बनाया
तो क्यूँ हजारों घरौंदे तोड़ दिया...
-――o९/१२/२o१५――-
©®― लेखक/कवि- अश्विनी यादव

उसके हाँथ के कंगन

'उसके हाँथ के कंगन'
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बहुत ख़ामोश लगते है
अब उसके हाँथ के कंगन,
कभी दिनभर खनकते थे
वो उसके हाँथ के कंगन,
कोई बात है जरूर
जो बताया नही उसने,
पर वो है बड़ी गुमसुम
ये बयाँनात् है कंगन,
हलचल करके हरपल में
नये साज करते थे,
किसी आँगन में सजाते थे
रोज नग्मात ये कंगन,
आज आँगन बदल रहा
बदल गये उसके कंगन,
शायद अब बदल के राग
कहीं और छेड़े सरगम,
मनमाफ़िक ना साजन
वो बांधी गयी थी जबरन,
न संवरते है न खनकते है
अब उसके हाँथ के कंगन,
वो मिठास नही दिखता
उसके बात बोली में,
वो खुलापन है गायब
उसकी हँसी-ठिठोली में,
रंगत उड़ गयी रुख से
न हाँथ हरकत करते है,
चूड़ी बन गयी सौतन
अब कंगन नही खनकते है,
विदाई वख्त हल्के से
रोये थे उसके कंगन,
जन्मों तक ये बोझ कैसे
सम्हालेंगे उसके कंगन,
कभी बापू से लगके फूटे
माँ के अँचरे में जा सिमटे,
दूर से दिखा प्रियतम
तडपकर रह गये कंगन,
सिसकते से गैर के हाँथ में
सबने रख दिए कंगन,
सपने बह रहे आँखों से
जिनसे भीग रहा कंगन,

©®―कवि/लेखक -अश्विनी यादव
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