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बुधवार, 6 सितंबर 2017

बगिया गए थे

थोड़ी सी धूप

थोड़ी सी ख़ुश्बू

हम चुरा लाये हैं 

आज बगिया गए थे,

गुलमोहर के फूल  

कुछ कुतरे से फल

हम उठा लाये हैं

आज बगिया गए थे,

कोयल की कूक

मोरनी की पीहू

हम सुना लाये हैं

आज बगिया गए थे,

मुस्कुराती घासें

बावली सी तितली

हम दिखा लाये है

आज बगिया गए थे।।

   
 ~ अश्विनी यादव

मंगलवार, 31 मई 2016

अनमोल बचपन

    
धूल में खेलकर घर आना
फिर छिपते-छिपाते अंदर जाना
माँ के प्यार की थपकी मार
सब अक्सर याद आया करता है
चंचल चितवन मन हो जाता
जब 'बचपन' याद आया करता है।
साईकिल के पुराने टायर ले
चल पडे हम सैर सपाटे पे
नजर ज्यों ही सबकी पडे हमपे
पहिया छिन जाता था हाथों से ,
इस खेल के चक्कर में मै
अक्सर पीटा जाया करता था
आखें नम हो जाती है मेरी
जब बचपन याद करता है, ।
करें बहाना बगिया जायें
बगिया से फिर नदिया जायें
सब लँगोटिया यारो के संग
धमाचौकड़ी खूब मचायें,
वो सौंधी सी मिट्टी की महक
जिसमे पूरा दिन बीता करता था
अमिट छाप देता जीवन को
जो आँखे छलकाया करता है
लगे कि कल का दिन था वो
जब बचपन याद आया करता है।
टप-टप की आवाज जो आई
तब फटे किताबों के पन्ने
घर से बाहर भागे भीगने
और अपनी नाँव तैराने को
नन्हें हाथों ने थाम्हे छन्ने
आँगन में मछली पकड़ने को,
चहचहाता खेलता कूदता
बेफिकर सा वो शरारतपन
काश! कि लौट सकता फिर
वो प्यारा जीवन मेरा "बचपन"।।
     
    कवि :- अश्विनी यादव
आज बाल दिवस के शुभावसर पर समस्त पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं।