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रविवार, 18 जून 2017

पापा तुम सा कोई नही

अपने सपने तोड़कर जीना
हमारे ख्वाब जोड़कर जीना
ये जीना भी एक जीना है
खुद को यूँ भुला कर जीना
ऐसा कोई और कहाँ होगा
हाँ पापा जैसे तुम हो,

हमारे लिए इतनी डिग्रियां
इतनी पढ़ाई इतनी किताबें
कभी बस्ता कभी फ़ीस
कभी जूता तो कभी जुराबें
ऐसे सब मिलता कहाँ होगा,
हाँ पापा जैसे तुम हो,

    ― अश्विनी यादव

मंगलवार, 13 जून 2017

मैं किसान हूँ

मर जाने दो, उबर जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,
फ़सली ज़ख्म भर जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

गहरा आघात हुआ था मुझे
बिटिया के डोली का,
डोली न सही अर्थी जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

ईश्वर का कहर भी क्या खूब
कभी बरसता नही,
कभी बाढ़ में घर बह जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

बैंक वाले, सूददार, औ सरकार
जरा समझते ही नही,
मौत से ही तसल्ली हो जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

    ― अश्विनी यादव

शनिवार, 10 जून 2017

देश बेंच दिया

रेल बेंच दिया, दूर संचार बेच दिया
स्टेशन का भी जार जार बेंच दिया
सड़क पे सड़क बेंच रहा है पगला
फुटफाथ पे लगा संसार बेंच दिया

जहां मिला जो  मिला साफ किया
मौके पे से गांधी चरखा नाप दिया
खद्दर की  आड़ में  व्यापारी देखो
फ़क़ीरी चोला  में नोट  चांप दिया

        ― अश्विनी यादव
....देश बेंच के रख देगा इ कुर्सी के जाने से पहले।

शनिवार, 20 मई 2017

पहले जैसा हो जायेगा

सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा
न तुम्हारे आने से कुछ रुका था,
न ही अब थम जायेगा,
सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा,

न सूरज का उगना रुकेगा,
न ही चंदा का आना,
न ही रुकेगी तारों की टिमटिम,
न हवाओ का इतराना,
न रुकेगी JIO की स्पीड,
और न IPL सीजन का आना,
न roadies का fever,
न तारक मेहता SAB पर आना,
ऐ काश कुछ बदलता जिंदगी में,
पर जब तुम थे सब वैसा रह जायेगा,
सुनो, सब पहले जैसा ही हो जायेगा,

हाँ शायद इतना फर्क पड़ा है मुझ पर
अब रातों में ख़ामोशी सी है,
दिन में छाया धुंधलापन है अब,
कुछ आदतें तुम डाली ही थी,
कुछ को तुमने बदला था तब,
उनमें से कुछ तो बदलेंगी,
कुछ फिर वैसे हो जाएंगी,
कुछ तो गिर कर सम्हलेंगी,
कुछ नई भी पड़ जाएंगी,
बस इतना जीवन में बदलेगा
बाकि फिर पहले जैसा हो जायेगा,
सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा,

            ― प्रशांत त्रिपाठी

शुक्रवार, 12 मई 2017

गांव की याद

पत्थर के शहर से दूर जा रहा
फिर याद गांव की आयी है...

बूढ़ा बरगद, छलकता पोखर
खेतों में हरियाली छाई है...

माँ बोली थी बेटा जल्दी आना
फिर ये बात याद आयी है...

       ©  अश्विनी यादव

बुधवार, 10 मई 2017

हे बुद्ध

हे बुद्ध अरे हाँ बुद्ध
सुनो गौतम हाँ तुम्ही से
मैं पूंछ रहा हूँ,
जिज्ञासा भेंट रहा हूँ,
जिस पीपल के नीचे
जिस बोधगया में तुमने
बोध किया था बौद्ध का
उसे फिर सँवारने फिर
उजाले की ओर में ले
जाने आये नही क्यूं ?
मैं पूंछ रहा हूँ,
जिज्ञासा भेंट रहा हूँ,
हाँ मुझे आज भी
आश है उस लुम्बिनी से
फिर कोई सूरज जन्मेगी
जो आ सके सारनाथ
हमे जीने की राह दिखाये
धर्म प्रेम और ज्ञान सिखाये
श्रावस्ती अब बदहाल है
उपदेश देने आये नही क्यूं ?
मैं अबोध पूंछ रहा हूँ,
बुद्ध जिज्ञासा भेंट रहा हूँ,
    नमो बुद्धाय

    ©  अश्विनी यादव

बुधवार, 3 मई 2017

तुम्ही सिखा दो

आख़िर हम क्या जाने प्यार वफ़ा,
और इसमें के हुये नुकसान नफ़ा,
हम ठहरे सीधे साधे है संसार के,
पर नाम हमारा काफ़ी है वार को,
इक तुम ही वाकिफ़ नही हो हमसे,
इक हम है जो सीख रहें है तुमसे,
चलो तुम ही सिखा दो वादे कसमें,
या आकर सिखा दो रिवाजे रस्में,
छोडो ये सब तुम से न हो पाएगा,
हमें सिखाने में ही प्यार हो जायेगा,

       ― अश्विनी यादव

      ( प्रशांत त्रिपाठी जी से प्रेरित )