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गुरुवार, 29 जून 2017

बूंद हूँ बेटी हूँ

बादलों से छूटी पानी की बूंद हूँ
हरे पत्ते से टपकती हुई बूंद हूँ,
मिलकर और से बड़ी हो  गयी
फिर टूटकर बिखरती हुई बूंद हूँ,

माँ के घड़े से ताकती हुई सी हूँ
या छलकर कमर पे सम्हली हुई,
झरने के आड़े टेढ़े रास्ते की हूँ
हूँ बावली काई पे फिसलती हुई,

मैं बूंद भी हूँ औ तेरी बेटी भी हूँ
       
       ― अश्विनी यादव

बुधवार, 21 जून 2017

योग दिवस और भारत

योगा दिवस पे करोड़ो खर्च किया गया,,,,, कोई बात नही ऐसे तो हर सरकार कुछ न कुछ उल्टा पुल्टा करती है। लेकिन भूखे पेट वाले को इस योगा से क्या ये ओ उसके लिए ढ़कोसला मात्र है। ये तो भरे पेट, मोटी तोंद लिए उन लोंगों के लिए खास है जो एक गिलास पानी भी नही ले पाते है अपने हाथ से।
मैं योगा के खिलाफ नही हूँ, मुझे पसन्द है लेकिन जब पिछली रात को पेट भरा हो, शरीर में थकान न हो, सुबह से ही शाम के लिए पैसो के बारे में सोचना न हो तब।
वैसे मोदी जी आपके जैसे  नाटकबाज आदमी कोई नही दिखा मुझे। बात से मुकरने का कोई एक लम्बा समय होता है क्षण भर में कल्टी मार लेना बहुत निंदनीय है। आप करोड़ो खर्च किये हो दुनिया आपको देख रही है लेकिन योगासन में #फोटूवासन के लिए फ़ुटेज खा रहे हो। आपने तो हद ही कर दी। वैसे भी किसान गोली खा रहे है, कभी जहर की कभी सरकारी  बन्दूक की... और आप फ़ुटेज खा ले रहे है तो क्या हुआ।
चलो खैर छोडो मेरी तरफ से भी....
       #happy_happy_योगा_डे  
     
     ― अश्विनी यादव के विचार से )

रविवार, 18 जून 2017

'पुराना बस्ता'

माँ मुझको फिर से पकड़ा दो
वहीं पुराना बस्ता मेरा,
जिसके लिए कतराता था मैं
वहीं पुराना बस्ता मेरा,
माँ मुझको............

जहां बसती थी वीणावादिनी
रंगीन अक्षरों का ढेरा,
वो लाल रंग की किनारी का
सस्ता सा बस्ता मेरा,
माँ मुझको............

सुबह उठाओ जल्दी नहलाओ
काज़ल भरा आँख पूरा,
काला जूता, नीली टाई औ
मुंह में मोती का चूरा,
माँ मुझको............

एक टिक्का माथे पे किनारे औ
बाल बना दो हल्का टेढ़ा,
एक पराठा आलू की सब्जी औ
साथ में रक्खो दो पेड़ा,
माँ मुझको.............

          अश्विनी यादव
   © सर्वाधिकार सुरक्षित

पापा तुम सा कोई नही

अपने सपने तोड़कर जीना
हमारे ख्वाब जोड़कर जीना
ये जीना भी एक जीना है
खुद को यूँ भुला कर जीना
ऐसा कोई और कहाँ होगा
हाँ पापा जैसे तुम हो,

हमारे लिए इतनी डिग्रियां
इतनी पढ़ाई इतनी किताबें
कभी बस्ता कभी फ़ीस
कभी जूता तो कभी जुराबें
ऐसे सब मिलता कहाँ होगा,
हाँ पापा जैसे तुम हो,

    ― अश्विनी यादव

मंगलवार, 13 जून 2017

मैं किसान हूँ

मर जाने दो, उबर जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,
फ़सली ज़ख्म भर जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

गहरा आघात हुआ था मुझे
बिटिया के डोली का,
डोली न सही अर्थी जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

ईश्वर का कहर भी क्या खूब
कभी बरसता नही,
कभी बाढ़ में घर बह जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

बैंक वाले, सूददार, औ सरकार
जरा समझते ही नही,
मौत से ही तसल्ली हो जाने दो
क्युंकि मैं किसान हूँ,

    ― अश्विनी यादव

शनिवार, 10 जून 2017

देश बेंच दिया

रेल बेंच दिया, दूर संचार बेच दिया
स्टेशन का भी जार जार बेंच दिया
सड़क पे सड़क बेंच रहा है पगला
फुटफाथ पे लगा संसार बेंच दिया

जहां मिला जो  मिला साफ किया
मौके पे से गांधी चरखा नाप दिया
खद्दर की  आड़ में  व्यापारी देखो
फ़क़ीरी चोला  में नोट  चांप दिया

        ― अश्विनी यादव
....देश बेंच के रख देगा इ कुर्सी के जाने से पहले।

शनिवार, 20 मई 2017

पहले जैसा हो जायेगा

सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा
न तुम्हारे आने से कुछ रुका था,
न ही अब थम जायेगा,
सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा,

न सूरज का उगना रुकेगा,
न ही चंदा का आना,
न ही रुकेगी तारों की टिमटिम,
न हवाओ का इतराना,
न रुकेगी JIO की स्पीड,
और न IPL सीजन का आना,
न roadies का fever,
न तारक मेहता SAB पर आना,
ऐ काश कुछ बदलता जिंदगी में,
पर जब तुम थे सब वैसा रह जायेगा,
सुनो, सब पहले जैसा ही हो जायेगा,

हाँ शायद इतना फर्क पड़ा है मुझ पर
अब रातों में ख़ामोशी सी है,
दिन में छाया धुंधलापन है अब,
कुछ आदतें तुम डाली ही थी,
कुछ को तुमने बदला था तब,
उनमें से कुछ तो बदलेंगी,
कुछ फिर वैसे हो जाएंगी,
कुछ तो गिर कर सम्हलेंगी,
कुछ नई भी पड़ जाएंगी,
बस इतना जीवन में बदलेगा
बाकि फिर पहले जैसा हो जायेगा,
सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा,

            ― प्रशांत त्रिपाठी