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सोमवार, 9 अगस्त 2021

विश्व आदिवासी दिवस

जैसा कि फ़िल्मों में आदिवासियों को दिखाया जाता है ऐसा भले ही पहले हुआ करता रहा पर अब ये 21वीं सदी है जिसमें वो आपके हमारे बीच अपने सामाजिक हक़ को प्राप्त करके बड़े बड़े पदों पर हैं, परन्तु कुछ ही लोग पहुँच पाए हैं।इन लोगों की एक बड़ी आबादी आज भी अपने वजूद को तलाश रही है इस देश में। चूँकि आरक्षण तो है और उनको स्थान भी मिल जाता है परंतु जब प्राथमिक शिक्षा ही नहीं मिल पा रही है तो उच्च शिक्षा प्राप्त किये बिना उस नौकरी में मिलने वाले आरक्षण का कोई ख़ास फ़ायदा नहीं मिल पा रहा है।

      आज भी हिन्दूवादी नेताओं के लिए आदिवासी केवल उतने ही हिन्दू हैं जितनी देर तक के लिए वो अपना वोट नहीं दे देते हैं, जैसे ही वोट पड़ा उन्हें अनुसूचित जनजाति के तहत दलित समाज में से भी निम्न समझने लगते हैं जिससे एक बड़ी खाईं पैदा हो जाती है। फ़िलहाल तो कई आदिवासी नेताओं ने अपने ताक़त को पहचाना और आदिवासियों के हक़ के लिए लड़ते हुए अपनी पहचान को दर्शाते हुए न्याय कर रहे हैं। हम सब की ग़लती है कि उन्हें अपनी बराबरी की जगह पर क्यों नहीं आने दे रहे हैं।

     आज जो भी जंगल सुरक्षित हैं उसके लिए सबसे बड़े कारण हैं आदिवासी समाज के लोग। इनके कारण ही आज भी पेड़ों की संख्या बढ़ती है। असली प्रकृति के रखवाले हैं ये लोग। इन्हें न सरकार पैसे देती है न ही कोई NGO पर फिर भी इन्हें पता है कि पेड़ ही दुनिया के लिए जीवन का अमूल्य स्रोत हैं, सो ये लोग अपनी तरफ से जंगल बचाते हैं।

    आज भी जब उनके पेड़ काटे जाते हैं उनके घर जलाए जाते हैं तो आपको सोचना चाहिए कि आप लोग जिस भी कारण से ऐसा कर रहे हैं उससे कहीं बड़े कारण हैं जिसकी वजह से वो उस जंगल की रक्षा कर रहे हैं। सरकारों को अक्सर ये लोग उतने भी ज़रूरी नहीं लगते हैं कि जितने होने चाहिए शायद इसलिए ही इनके अक्सर परेशान किया जाता है। सरकार इनके हक़ बार बार छीनती है। अगर इनके साथ ऐसी नाइंसाफी होती रही टॉर न जाने कितने साल लग जाएँगें इनको सामाजिक न्याय मिल पाने में।

     हाँ वो कम पढ़े लिखे हैं,उनके कपड़े ब्रांडेड नहीं हैं, उनके पास तीर धनुष है। पर यक़ीन मानिए आप साथ दीजिये उनके तीर जल्द ही कलम बन जाएँगें।

    इस दुनिया में सबसे अधिक जल, जंगल और जीवन की सुरक्षा करने वाले लोग यानी आदिवासी समाज को आदिवासी दिवस की बहुत सारी शुभकामनाएं।

          ~   अश्विनी यादव 

सोमवार, 2 अगस्त 2021

ओलम्पिक में भारतीय खिलाड़ी और हम लोग

 हर रोज आपको दो चार लोग ये कहते हुए पोस्ट करते मिल जाएंगे 130 करोड़ की आबादी में 13 मेडल भी  नहीं आ रहे हैं. भारत खेलों में इतना पिछड़ा हुआ क्यों है ? 

 तो भाई मेडल इसलिए नहीं आते हैं क्योंकि हम बचते है खिलाड़ियों को मूलभूत सुविधाएं देने में , उन्हे उनकी वाजिब पहचान देने में . मेडल क्या ख़ाक आयेंगे ?

 तो भाई सुनो जिस लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के पास ये जिम्मेदारी थी कि वो देश की बुलंद इमारत में सशक्त नींव का पत्थर साबित होगा वो आज कल दो कौड़ी से भी गई गुजरी हरकतें करके अपना स्तर दिन ब दिन बद से बदतर  कर रहा है . 

भारतीय महिला हॉकी  टीम ने आस्ट्रेलिया को हराया तो ये चक दे इंडिया की अभिनेत्री को फोन पर लेकर अपने दर्शकों का टाइम पास करवा रहे हैं.शर्म तो मगर इन नमूनों को आती नहीं होगी . अगर हॉकी खिलाड़ियों के घर परिवार वालों से ही बात के कि होती तो क्या बिगड़ जाता इनका ?

कुछ समय से यही हो रहा है असली नायकों को गायब करके हम पर फर्जी के  नायक थोपे जा रहे हैं। 

ऐसा हर क्षेत्र में हो रहा है . 

हर जगह ग्लैमर का तडका चाहिए.शायद इसीलिए कोई राजा विदेशी मेहमान के आने पर झोपड़पट्टियां दीवार के पीछे छिपा देता है . 

ये इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि हमने असली नायकों को हमेशा गुमनाम ही रखा है..और जबरदस्ती के नायक इस देश पर थोपे गए हैं.

         ~  गौरव सिंह यादव

मंगलवार, 13 जुलाई 2021

भारत भूषण पंत ( जीवनी )

भारत भूषण पंत का जन्म 3 जून 1958 को हुआ था। उनकी जिंदगी का लंबा हिस्सा बल्कि यूं कहें कि पूरी जिंदगी ही लखनऊ में बीती। उनकी जिंदगी भी दर्द से भरी हुई थी, जब वे बड़े हो रहे थे तो उन्हीं दिनों उन्होंने अपने पिता को बीमारी से जूझते हुए मौत का सफ़र तय करने का हादसा देखा। पिताजी तो चल बसे लेकिन उसके बाद ऐसा लगता रहा कि भारत भूषण पंत कहीं तिल तिल कर अपनी जिंदगी को ख़त्म करते रहे।
बाद में उनकी पत्नी उनका सहारा बनीं लेकिन उन्हें भी कैंसर हो गया और 2014 में वे भी इस दुनिया से विदा हो गयीं। पत्नी के देहांत के बाद पंत जी बिल्कुल अकेले रह गए।काॅपरेटिव की नौकरी से स्वैच्छिक सेवनिवृत्ति उन्होंने पहले ही ले ली थी। उनकी जिंदगी अकेलेपन का शिकार हो गयी।
और बीमारी के कारण 11 नवम्बर 2019 को विवेकानंद हॉस्पिटल, लखनऊ में अंतिम साँस ली।
दबिस्तान ए लखनऊ की फेहरिस्त में अगर आज़ादी के बाद शायरों को देखें तो भारत भूषण पंत का नाम बड़ी संजीदगी से लिया जाता है। ख़ास बात ये है कि बात यह है कि मुनव्वर राना,ख़ुशबीर शाद और पंत साहब इत्तेफ़ाक से तीनों ही वाली आसी साहब के शागिर्द थे। मुनव्वर साहब ख़ुद भी मानते हैं कि उनके उस्ताद भाइयों में पंत जी से बढ़िया शेर कोई नहीं कहता था।
दो दिनों की ज़िन्दगानी कुफ्र क्या इस्लाम क्या
एक दिन काबे में सजदा, बुत-परस्ती एक दिन

पंत साहब को बेचेहरगी से इस हद तक लगाव था कि उनकी मजमुआ इसी नाम से साये हुआ था । 'तन्हाइयाँ कहती हैं', 'यूँ ही चुपचाप गुज़र जा (1995), और 'कोशिश' (1988) ज़रिए उनके कलाम से वाबस्ता हुआ जा सकता है। उनके उस्ताद भाई मुनव्वर राणा का यह बयान ज़ेरे गौर है कि " भारत भूषण ने अपनी शायरी को हमेशा सिसकियों की छत्रछाया में रखा है, किसी भी लफ्ज़ को चीख नहीं बनने दिया। अपनी हर ग़ज़ल में वो अपने दुखों से खेलते दिखाई देते हैं "
दरअसल पंत जी शायरी में बहुत सी चीज़ें मिलेंगी जैसे ज़बान की मिठास, फ़िक्र का लबादा, नए मौज़ूआत, तख़लीकी अमल, नए नए इस्तिआरे, ग़ालिब और मीर के अलावा जिगर मुरादाबादी, शकेब जलाली, सलीम अहमद की मक़बूल ज़मीनों पर ग़ज़ल कहने का हुनर से लेकर और भी बहुत सारी बातें।
किताबें :- 1 बेचेहरगी
              2 तन्हाईयाँ कहती हैं
              3 कुछ मज़ामी ग़ैब से ( पब्लिश होने वाली है )
   भारत भूषण पंत ने फिल्मी दुनिया को भी अपनी कलम से नवाज़ा है। पूजा भट्ट की फिल्म "धोखा" के लिए उन्होने अपने उस्ताद भाई खुशबीर सिंह शाद के साथ मिलकर गीत लिखे हैं तो मशहूर गायिका कविता सेठ के प्राइवेट अल्बम के लिए भी गीत लिखे हैं। आने वाले दिनों में हमें उनके गीतों से सजी कुछ और फिल्में देखने को मिल सकती हैं.
   आपने बहुत सारे नाटकों के लिए भी गीत लिखे हैं।
उर्दू शाइरी के लिए सुप्रसिद्ध बेवसाइट rekhta पर भी उन्हें पढ़ा जा सकता है, [1]
https://www.rekhta.org/poets/bharat-bhushan-pant/all?lang=hi
शाइरी की एक और प्रसिद्ध बेवसाइट कविताकोश पर भी पढ़ सकते हैं, [2]
http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%B7%E0%A4%A3_%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A4

खबरों में भारत भूषण पन्त
     [3]

[4] [5] [6]




मंगलवार, 22 जून 2021

ग़ज़ल

उसने गंगा से धुलवाया था गोकुल,
कुछ यूँ उसने शुद्ध कराया था गोकुल,

कोई उसको समझाओ कि माधव ने
आँख बनाकर ख़ुद पे सजाया था गोकुल

गोकुलधाम भले ही छूटा हो लेकिन
कान्हा जी ने कब बिसराया था गोकुल

प्रियतम सह जाते हैं सारे रंज-ओ-ग़म
सबसे सच्ची प्रीत निभाया था गोकुल

प्रेम बिना है दुनिया सूनी सच मानो
चाहत में घर बार लुटाया था गोकुल

     
     ~ अश्विनी यादव

गुरुवार, 17 जून 2021

नज़्म ~ इंतज़ार में हैं

वो दिन भी जल्दी आएगा
हम इंतज़ार में हैं
इंतज़ार में हैं

हाँ उस दिन भी हम बोलेंगें
हम लड़कर सज़ा दिलवाएंगें
हिसाब हमारा बाक़ी है
हम बेकरार से हैं
इंतज़ार में हैं

आवाज उठेगी हक़ की जब
हर ज़िन्दा बुत से पूछेंगें
क्यों होने दिया ये ज़ुल्मों सितम
हम गुस्से के इज़हार में हैं
हम इंतज़ार में हैं

हर इक तमाशा ये जो है
किसने तराशा है इसको
हर उसका नक़ाब उतरेगा
ज़ब्त-ए-नफ़रत-ओ-दीवार में हैं
हम इंतज़ार में हैं

~ अश्विनी यादव

गुरुवार, 27 मई 2021

एस्मा एक्ट

योगी सरकार ने लागू किया 'एस्मा एक्ट' : अब छह महीने तक हड़ताल नहीं कर सकेंगे कर्मचारी


लखनऊ: उत्तर प्रदेश में योगी सरकार की तरफ से एक बड़ा निर्णय लिया गया है। सरकार प्रदेश में 'एस्मा एक्ट' लागू कर दिया गया है। इसके तहत अब अगले छह महीने तक कोई भी कर्मचारी प्रदेश में हड़ताल नहीं कर पाएगा।

      जहाँ एक तरफ उत्तर प्रदेश में कोरोना संक्रमण का कहर ज़ारी है और इन सब के बीच सरकारी कर्मचारियों की ओर से की जाने वाली हड़ताल पर अब प्रदेश सरकार ने अगले 6 महीने के लिए फिर से पाबंदी लगा दी है। उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से गुरुवार को एक बड़ा निर्णय लिया गया है। सरकार प्रदेश में 'एस्मा एक्ट' लेकर आई है। इसके तहत अब अगले छह महीने तक कोई भी प्रदेश में हड़ताल नहीं कर पाएगा। सरकार द्वारा लाए गए इस एक्ट को राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की भी मंजूरी मिल गई है। राज्यपाल ने भी सरकार के इस फैसले पर अपनी स्वीकृति दे दी है।


      
        आवश्यक सेवा अनुरक्षण अधिनियम 1966 के तहत यूपी सरकार की ओर से लागू किए गए एस्मा एक्ट को राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की भी मंजूरी मिल गई और गुरुवार को इसे लागू किया गया। अगले 6 माह तक किसी भी सरकारी कर्मचारी की ओर से हड़ताल नहीं की जा सकेगी। यदि किसी सरकारी कर्मचारियों की ओर से इस एक्ट के बाहर जाकर प्रदर्शन करता है तो सरकार की ओर से उन हड़तालियों को "बिना वारंट के गिरफ्तार" कर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है, साथ ही अन्य निर्णय भी सरकार द्वारा लिया जा सकता है।

      एक तरह से योगी सरकार अब और विरोध नहीं झेलना चाहती है। चूँकि कुछ ही महीने बाक़ी हैं चुनाव होने में और अभी महामारी में इतनी अव्यवस्था के बाद अब सरकार किसी भी तरह के प्रदर्शन या विरोध हों ऐसा बिल्कुल भी नहीं चाहती है। 

आइये जानते हैं कि क्या है एस्मा एक्ट?

   गौरतलब है कि, एस्मा भारतीय संसद द्वारा पारित अधिनियम है, जिसे 1968 में लागू किया गया था। संकट की घड़ी में कर्मचारियों के हड़ताल को रोकने के लिए ये कानून बनाया गया था आवश्‍यक सेवा अनुरक्षण कानून (एस्‍मा) हड़ताल को रोकने के लिये लगाया जाता है। विदित हो कि एस्‍मा लागू करने से पहले इससे प्रभावित होने वाले कर्मचारियों को किसी समाचार पत्र या अन्‍य दूसरे माध्‍यम से सूचित किया जाता है । किसी राज्य सरकार या केंद्र सरकार की तरफ से ये कानून अधिकतम छह महीने के लिए लगाया जा सकता है। इसके लागू होने के बाद अगर कोई कर्मचारी हड़ताल पर जाता है तो वह अवैध‍ और दण्‍डनीय है।

सरकारें क्यों लगाती हैं एस्मा?

  • अधिकतर सरकारें एस्मा लगाने का फैसला इसलिये करती हैं क्योंकि हड़ताल की वजह से लोगों के लिये आवश्यक सेवाओं पर बुरा असर पड़ने की आशंका होती है। आसान भाषा में कहा जाए तो आवश्‍यक सेवा अनुरक्षण कानून यानी एस्मा वह कानून है, जो अनिवार्य सेवाओं को बनाए रखने के लिये लागू किया जाता है।
  • इसके तहत जिस सेवा पर एस्मा लगाया जाता है, उससे संबंधित कर्मचारी हड़ताल नहीं कर सकते, अन्यथा हड़तालियों को छह माह तक की कैद या आर्थिक दंड अथवा दोनों हो सकते हैं।

क्या फ़ायदा है सरकारों को एस्मा से ?

 राज्य सरकारों के पास एक ऐसा तरीका है जिससे वह जब चाहे कर्मचारियों के आंदोलन को कुचल सकती है, विशेषकर हड़तालों पर प्रतिबंध लगा सकती है और बिना वारंट के कर्मचारी नेताओं को गिरफ्तार कर सकती है। एस्मा लागू होने के बाद यदि कर्मचारी हड़ताल में शामिल होता है तो यह अवैध एवं दंडनीय माना जाता है।


  •      देखा जाए तो एस्मा एक केंद्रीय कानून है जिसे 1968 में लागू किया गया था, लेकिन राज्य सरकारें इस कानून को लागू करने के लिये स्वतंत्र हैं। कुछ परिवर्तन कर कई राज्य सरकारों ने स्वयं का एस्मा कानून भी बना लिया है और ज़रूरत पर उपयोग भी करते हैं।

बुधवार, 26 मई 2021

नज़्म ( राजा का हुक़्म )

राजा ने ये हुक़्म दिया है
बोलोगे तो मौत सज़ा है

मरघट पर क्यूँ भीड़ लगी है
चुप रहना सब नींद लगी है

बस चुप हो जाओ चीख़ो मत
है जीभ सलामत बोलो मत

दफ़्न हुए हैं जो भी तेरे
हैं जो बाक़ी वो भी तेरे

उन पर हाथी चलवा देगा
सबको यूँ ही मरवा देगा

चुपकर एकदम चुप ही हो जा
वरना वो ज़ालिम सुन लेगा

मैं भी चुप हूँ तू चुप हो जा
तू है ही नहीं यूँ चुप हो जा

पहले सबको मर जाने दो
हर वोटर को तर जाने दो

देखो ये सबकी मेहनत है
सबके हिस्से सौ लानत है

मौत चुने थे बटन दबाकर
शेर के मुँह पर ख़ून लगाकर

आदमख़ोर भला क्या खाए
आदम खाये जहाँ भी पाए

लाश जला कर क्या पाओगे
राख वहीं पर पहराओगे

    – अश्विनी यादव