हमे तडपता छोड़ गये तुम वादा था आओगे,
मुझ अधूरे को पूरा करने का वचन निभाओगे,
रुदन करूं क्या नयन सूख गये प्रियतम मेरे,
राह तकूँ की बस तुम आओगे गले लगाओगे,
गोपियों ने छोड़ी दी पर मेरी तब आस छूटेगी,
जब आखें बंद होगी और आखिरी साँस टूटेगी,
सारे जहाँ ने कह दिया मुझसे तुम न आओगे,
मुझ व्याकुल धरा पे प्रेम मेघ न बरसाओगे,
दिल बार बार ये कहता है मुझसे आज भी,
कान्हा तुम आओगे वहीं प्रेम धुन सुनाओगे,
―अश्विनी यादव
हमें प्रयास करते रहना चाहिए ज्ञान और प्रेम बाँटने का, जिससे एक सभ्य समाज का निर्माण किया जा सके।
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शनिवार, 6 अगस्त 2016
तुम आओगे
मंगलवार, 26 जुलाई 2016
तुम बिन
मारो कोई बिष बाण प्रिये,
अब ले लो मेरे प्राण प्रिये,
तुम नही रही मेरी बनके,
कुसुमालय हुए कृपाण प्रिये,
की अब ले लो मेरे प्राण प्रिये।।
सुमरुं प्रेम नित नये गीत से,
दरश जो पाऊँ अपने मीत के,
बलिहारी करूं ज्यों रसिक बना,
कनक हुआ इस इश्क रीति से ।।
© अश्विनी यादव
शुक्रवार, 15 जुलाई 2016
मतलब के पुजारी
चलो इस बार फिर से कोई मुद्दा ही छेड़ते है,
खाली थे बैठे कब से कुछ जहर ही बोलते है,
खुश है मेरी ये गलियाँ सूनी नही पड़ी है,
दो-चार घर पे छिप के पत्थर ही फेंकते है,
चलो इस बार फिर....
नुक्कड़ वाले मियाँ जी बड़े मौज गा रहे है,
दो वक्त वाली रोटी कैसे वो खा रहे है,
इस कदर के मौसम में मेरी आन न पड़ी है,
सो लेके हम दिया फिर लूकी लगा रहे है,
चलो इस बार फिर......
वो अपने मकसद खातिर जय राम बोलते है,
खुदा नाम पे तमाशे को इश्लाम बोलते है,
कुछ तेरी कौम वाले कुछ मेरे धर्म वाले,
मतलबपरस्ती में अब इन्सान तौलते है..,
चलो इस बार फिर से....
न खुदा जानते है न राम से मिले है,
ये कुर्सी और शोहरत इस काम से मिले है,
शहर के लोगो को गर सच कभी बताता,
ये राज कैसे करते जो आराम से मिले है,,
सर्वाधिकार सुरक्षित ―अश्विनी यादव
बुधवार, 13 जुलाई 2016
इन्सान जिन्दा है
"सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा बहुत बार सुना हमने..लेकिन घाटी में ही इंसानियत के , देश के , मजहब के दो रंगो में देखा हमने...
कुछ पंक्तियाँ...
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लाख सूर्य अस्त हो जाये तो
हम चिराग जलाते रहेंगे,
अपने घर के दरवाजे पे
हिदुस्तानी लिखवाते रहेंगे,
सीख दी औलादो को यही
पत्थर, हांथो में उठाना नही,
केसर की क्यारी है हमारी
इस पर सवाल उठाना नही,
क्या मियां क्या हिन्दू भाई
सौहार्द बनाये रखना तुम,
सेना सलामी तिरंगा कहानी
लाल न कभी बिसरना तुम,
हिन्दू, हिंदी, हिन्द धरा की
माने-अलख जलाना तुम,
कभी दहशतगर्दी में पड़कर
'आतंकी' न बन जाना तुम,
हम सभी है वतन के सिपाही
सरहदे धूमिल होने न देंगे,
बुरहान, अफजल भले थे हमारे
अब कोई जाकिर होने न देंगें....!
© अश्विनी यादव
मंगलवार, 31 मई 2016
अनमोल बचपन
धूल में खेलकर घर आना
फिर छिपते-छिपाते अंदर जाना
माँ के प्यार की थपकी मार
सब अक्सर याद आया करता है
चंचल चितवन मन हो जाता
जब 'बचपन' याद आया करता है।
साईकिल के पुराने टायर ले
चल पडे हम सैर सपाटे पे
नजर ज्यों ही सबकी पडे हमपे
पहिया छिन जाता था हाथों से ,
इस खेल के चक्कर में मै
अक्सर पीटा जाया करता था
आखें नम हो जाती है मेरी
जब बचपन याद करता है, ।
करें बहाना बगिया जायें
बगिया से फिर नदिया जायें
सब लँगोटिया यारो के संग
धमाचौकड़ी खूब मचायें,
वो सौंधी सी मिट्टी की महक
जिसमे पूरा दिन बीता करता था
अमिट छाप देता जीवन को
जो आँखे छलकाया करता है
लगे कि कल का दिन था वो
जब बचपन याद आया करता है।
टप-टप की आवाज जो आई
तब फटे किताबों के पन्ने
घर से बाहर भागे भीगने
और अपनी नाँव तैराने को
नन्हें हाथों ने थाम्हे छन्ने
आँगन में मछली पकड़ने को,
चहचहाता खेलता कूदता
बेफिकर सा वो शरारतपन
काश! कि लौट सकता फिर
वो प्यारा जीवन मेरा "बचपन"।।
कवि :- अश्विनी यादव
आज बाल दिवस के शुभावसर पर समस्त पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं।
गुरुवार, 26 मई 2016
तेरी-मेरी कहानी
नाम तेरा हम लिखते मिटाते रहे
तुझे झरोखों से देख मुस्कुराते रहे
चर्चा कालेज में थी हूँ मै आशिक तेरा
वो भाभी है तेरी हम समझाते रहे
एक तेरे चक्कर में कितने लफड़े हुए
अपने हमयार भी नजरे चुराने लगे
बस तुझे छोड़ सबको थी ये खबर
क्यूँ तेरे नाम पे लुटने-लुटाने लगे
यूँ दिलकशी में पढाई चौपट हो रही
ध्यान तेरे सिवा और कुछ भी न था
कह न पाया कभी तुमसे दिल की बात
और तुम हँसकर सबसे बतियाते रहे
मै आंवारा न होऊ सो शहर आ गया
पूरा शहर परियो की बगिया लगी
भूलने लगा तुम्हे तितलियों में रहकर
जिम्मेदारी पढाई की बढने लगी
बीच में जब भी घर आना हुआ
तुम हमे देखकर शरमाने लगे
एक साल न गुजरे तेरी शादी हो गई
आज अफसर हो हम भी कमाने लगे
फिर भी अफ़सोस है उस अधूरेपन का
जिसे ख़यालों में हम गुनगुनाते रहे
मेरे यारों को उनकी वो भाभी न मिली
जिन्हें हम "जान" कहके बुलाते रहे...
कवि- अश्विनी यादव
शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016
ये कयामत क्यूँ
एक बूँद की चाहत में तरसता रहा
शायद अंत है निकट अब लग रहा
सूखा है गला न आखोँ से नीर बहे
फटे दर्रों में जल महसूस करता रहा
पेड़ कत्थहे हुए सबकी छाया भी गई
सारी फसलें कटीली झाड़ियाँ बनी
यहाँ पे कोई तो वहाँ पे कहीं
भूख से तड़पती लाशें दिख रही
बड़ा वीभत्स था मंजर देश का
आके अकाल सब बर्बाद करता रहा
मैने भरसक किया जो कर सकता था
हारकर तमाशा मै देखता रहा
कुदरत का कहर क्यूँ इतना निर्मम
हर जगह मौत तांडव करता रही
तरसता तड़पा रहा पूरा जहान
दिल न पसीजा जरा ऊपरवाले का
आसमां का भी दामन न भीगा कहीं
मै कयामत की गुजारिश करता रहा।।
©®―अश्विनी यादव