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मंगलवार, 20 दिसंबर 2022

आज़ाद की औलाद पर गोलियाँ

आज़ाद की औलाद पर
तुम गोलियां चलवा रहे
हाँ मगर ये ध्यान रखना
ग़र ये पलट जायेंगें फिर तो
भागने को दौड़ने को
सर छुपाने के लिए भी
ये ज़मीं भी कम पड़ जाएगी
तुम सभी के वास्ते
डायर की कायर औलादों
थोड़ा सब्र रखो तुम सब
लगता है कि इंक़लाब का
तुमको सबक नहीं मिला होगा
हर गोली के हर छर्रे का
फूटे माथे के हर कतरे का
तुमको हर्ज़ाना देना है
हर लाठी और हर गाली का
पूरा ज़ुर्माना भरना है
हक़ लेना आता है हमको
हम सब चुकता कर लेंगें ही
तू क्या तेरा बाप डरेगा
अब कॉलर को छूने से भी
उठो ओ लड़को मालिश छोड़ों
अपने दामन को भी देखो
जी हुजूरी बन्द करो बे
लड़कर अपना हिस्सा कब लोगे..

   ~ अश्विनी यादव

सोमवार, 20 मार्च 2017

हर दिन नया सा था

शाम हो रही है यार
तुम सबकी याद कसक रही है,
बुलबुला बनके
मेरे दिली सरोवर में तैर रहे है,
वो जब टहलते थे कभी कभी
'राम विलास' के चाय की चुस्की
फिर 'गुप्ता जी' के पकौड़े
चलते-चलते 'माखन भोग'
ज्यों ही पंहुचते थे जेब में
लगभग आग ही लग जाती थी,
इस उलट फेर का तमाशा
और मजेदार हो जाता था,
जब वही रास्ते 'जूनियर्स' को नमस्ते
सर यादआ जाता था,
छोटे भाइयों के लिए अपना
फर्ज अदा करते थे मिल बाँट के,
टहलते टहलते स्टेशन का भी
जायजा लेते हुए,
मन्दिर जा के प्रभु को अक्सर
याद करते थे हम...
हम अच्छे थे तब हम सच्चे थे,
अब जोड़ तोड़ गुणा गणित का
हिसाब-किताब का प्रश्न हो या
अपने रुतबे की बात आ जाये
लेकिन प्यार हमारा वही था
वहीं है शायद वहीं रहेगा...
भले स्वाद चाय से काफ़ी जैसा हो,
लेकिन आज भी तेरी फ़िक्र
किसी चूल्हे पे रखे 'दूध' जैसा है..
उबलता है, और बहने लगता है यारों....
    ―आप में से ही एक, आपका
    "अश्विनी यादव"